The Token System – Chapter 727
मैं और बंसी उस तरफ़ गए। जेनेरेटर वाले कमरे का दरवाज़ा खुला था, अंदर से वो हल्की धातु की बदबू आ रही थी जो पुराने अस्पतालों में होती है। शेखर बाबू बैठे थे — घुटनों पर फ़ाइलें, चश्मा टेढ़ा, हाथ काँप रहे थे।
“बाबू,” मैंने कहा, और दरवाज़ा पीछे से बंद कर दिया। “मेरे सिर पर वार हुआ। तेरे भतीजे ने किया।”
शेखर बाबू का चेहरा सूखा पड़ गया। हाथ जुड़ गए, ऐसे जैसे किसी बच्चे को प्रार्थना सिखाई हो।
“मैंने नहीं कहा था, मनोहर जी,” वो बोले। “मैंने नहीं कहा था। भवानी साहब ने कहा था — डरा दो, मारो मत। बस डरा दो।”
“तो मारने वाला कौन था?”
“वो… वो लाठी वाला।”
“कौन लाठी वाला?” मैंने कहा।
“रामदीन जी। भवानी साहब का पुराना नौकर।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने आँखों से उसे चुप रहने को कहा।
“रामदीन ने मेरे भतीजे को बुलाया,” शेखर बाबू ने कहा, हाथ मलते हुए। “कहा — भवानी का हुक्म है, इसका सिर ठीक कर दो।”
“और भवानी साहब ने कहा था?”
“सिर्फ़ डराने को। भगवान कसम, सिर्फ़ डराने को।”
“तो भवानी और रामदीन, दोनों के दो हुक्म थे?” मैंने पूछा। “तेरे भतीजे के कानों में दो आवाज़ें पड़ीं, और उसने बड़ी आवाज़ मानी?”
शेखर बाबू ने सिर नीचे झुका लिया। फिर धीरे से बोले, “रामदीन उससे निपट नहीं रहा था। वो वहाँ भवानी साहब का आदमी बनकर नहीं आया था। वो कुछ और ढूँढ रहा था, और मेरे भतीजे ने उसे वहाँ देख लिया था।”
कमरे में सन्नाटा था। जेनेरेटर की ज़ंजीर बाहर किसी लोहे पर खटखटा रही थी।
“क्या ढूँढ रहा था?”
“मुझे नहीं पता,” शेखर बाबू ने कहा। “पर जब मैं वहाँ पहुँचा, वो तुम्हारी फ़ाइल छान रहा था। मैंने देखा — वही फ़ाइल जिसमें नाम कटा हुआ है।”
मेरी जेब में रखा टोकन हल्का-सा गरम हुआ। हल्का — इतना हल्का कि मैंने इसे महसूस करके भी नज़रअंदाज़ कर दिया।
“बाबू,” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मेरे कानों में बदली हुई लगी। “अब मेरे पास दो रास्ते हैं। एक — तू अदालत में गवाही दे। दूसरा — मैं पुलिस रिपोर्ट लिखवा दूँ। जिसमें मेरा सिर, तेरा भतीजा, और भवानी का नाम, तीनों एक काग़ज़ पर आ जाएँगे।”
शेखर बाबू रो पड़े। असली आँसू, बूढ़े आदमी के, जो अपनी इज़्ज़त बचाने में उम्र काट चुका हो। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया।
“मेरी बेटी की शादी है, मनोहर जी। तीन हफ़्ते बाद। मेरा नाम मत लगवाना।”
“गवाही देगा?”
“दूँगा,” वो बोले। “पर पहले अपनी बेटी की शादी करवा दो। एक झटके में करवा दो। मुझे भवानी के बिना, भवानी के होम के बिना, शादी करनी है।”
मैंने सोचा। तीन हफ़्ते। टोकन ने कभी इतना वक़्त नहीं दिया। पर मैंने कहा, “दो दिन।”
“दो दिन?” बंसी ने मेरी तरफ़ चौंककर देखा।
“दो दिन,” मैंने दोहराया। “मैं शादी की तारीख़ दो दिन में निकलवाऊँगा — और तेरी बेटी की शादी उसी दिन होगी, तेरे घर से, तेरे पैसे से, भवानी के किसी काग़ज़ के बिना। समझ गया?”
शेखर बाबू ने धीरे से सिर हिलाया, फिर रूमाल से आँखें पोंछीं।
“और रामदीन?” मैंने कहा।
“वो मुझसे नहीं बोलता,” शेखर बाबू ने कहा। “वो सिर्फ़ भवानी साहब से बोलता है। और आज सुबह तीन बजे मेरे दरवाज़े पर आया था, यही पूछने — तुम्हारी फ़ाइल में क्या लिखा था। मैंने कहा, कुछ नहीं। वो हँसा और चला गया।”
“उसने क्या पहना था?”
“लाठी।”
“वही लाठी?”
“वही। पर आज वो लाठी हिल रही थी। हाथ काँप रहा था उसका। मैंने पहले कभी नहीं देखा उसे काँपते।”
मैं बाहर आया, सूरज सिर पर था। बंसी मेरे पीछे-पीछे आया।
“रामदीन दोनों तरफ़ खेल रहा है,” बंसी ने कहा। “एक हाथ भवानी के काग़ज़ संभाल रहा है, दूसरे हाथ से हमें उसके सामने ला रहा है।”
“नहीं,” मैंने कहा। “वो खेल नहीं रहा। वो अपना हिसाब खेल रहा है। भवानी का हिसाब नहीं।”
“मतलब?”
“मतलब — जब वो अपना हिसाब खेलता है, तो हम दोनों उसके हिसाब में किरदार हैं। और उसके हिसाब में जो किरदार है, वो हमारा काम का है।”
बंसी ने सिर खुजाया। “तू अपने हिसाब में कभी नहीं खोता?”
“कभी-कभी,” मैंने कहा। “पर आज नहीं।”
घर पहुँचा तो माँ चूल्हे के पास बैठी थी। मेरे सिर पर पट्टी देखकर उसने चूल्हा छोड़ा, पानी गरम किया, कोई पुराना कपड़ा फाड़ा।
“बैठ,” उसने कहा।
मैं बैठ गया। उसके हाथ ठंडे थे, पर पट्टी बाँधते वक़्त काँप नहीं रहे थे — जैसे उम्र भर यही काम किया हो।
“तेरे दादा के साथ भी ऐसा ही हुआ था,” माँ ने कहा, बिना रुके। “सिर पर पट्टी। फिर चुप्पी। सालों की चुप्पी।”
“मैं चुप नहीं रहूँगा,” मैंने कहा।
वो रुकी। मेरे सिर पर हाथ रखा, फिर हटा लिया।
“चुप्पी उसके हाथ में नहीं थी,” उसने कहा। “चुप्पी उसके हिसाब में थी। जो हिसाब दूसरों के सिर पर जाता है, वो आदमी ख़ुद चुप हो जाता है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“तू क्या कह रही है?”
“जो बोल रही हूँ,” वो उठ गई। “एक बात — रामदीन से आज अकेले मत मिलना।”
“तू उसे जानती है?”
“मैंने यही नहीं कहा।”
“तो क्यों?”
“क्योंकि जो आदमी अपनी लाठी से दूसरे का सिर फोड़े और फिर माफ़ी का काग़ज़ छोड़े — वो माफ़ी नहीं दे रहा होता। वो तेरे हाथ में एक काग़ज़ रखकर तेरे ही हाथ लिखवा रहा होता है।”
मुझे रात का वो काग़ज़ याद आया — मेरी ही लिखाई में, जो मैंने कभी नहीं लिखी थी। “माफ़।”
“तू रुक,” माँ ने कहा, और अपने पल्लू के नीचे से एक छोटा, टूटा ताला निकाला। “ये तेरे पापा की मेज़ के दराज़ का है। दराज़ बंद नहीं है — ताला लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ी कभी। पर अंदर जो है, वो सिर्फ़ उसी दिन खोलेगा जिस दिन हमारा कोई नाम वापस मिलेगा।”
“तो आज क्यों दिया?”
“क्योंकि टोकन पर ‘पहला पत्थर’ उभरा है,” उसने कहा। “और पहला पत्थर हमारे घर का है, तेरे पापा की मेज़ का।”
वो चूल्हे पर गई। मैंने ताला जेब में रखा। बंसी दरवाज़े पर खड़ा था, हाथ में चाय का गिलास।
“अब?” उसने पूछा।
“अब सिर्फ़ एक काम है,” मैंने कहा। “शेखर बाबू की बेटी की शादी की तारीख़ निकलवानी है। दो दिन में।”
“दो दिन में शादी?” बंसी हँसा। “भाई, तू हिसाब तो अच्छा रखता है, शादी का नहीं।”
“तो तू रख,” मैंने कहा। “तेरे ससुर का काग़ज़, तेरे घर का हिसाब, तू ही जानता है कि शादी कहाँ से खड़ी होती है।”
बंसी रुक गया। फिर गिलास नीचे रखा, कमर पर हाथ टिकाया।
“एक शर्त पर,” उसने कहा।
“बोल।”
“तू हिसाब में उलझा रहेगा, मैं शादी में। अगर दो दिन में शादी नहीं हुई, तो तेरी रीना की शादी मैं कराऊँगा — भवानी के लड़के से नहीं, मेरे हिसाब से।”
“देखा जाएगा,” मैंने कहा।
तभी पिंटू दौड़ता हुआ आया। साँस नहीं थी, गाल लाल, और आँखों में वो चमक जो बड़ी ख़बर से पहले आती है।
“भाई,” वो हाँफते हुए बोला। “चाचा की दुकान के बाहर एक खाली सफ़ेद गाड़ी खड़ी है।”
“कौन?”
“चाचा जल्दी से तुझे बुला रहे हैं। कह रहे हैं — कुछ ऐसा मिला है जो तेरे पापा के हाथ का है।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी का चेहरा सफ़ेद। वो चाय का गिलास भूल गया, चप्पल पहनने भूल गया, बस दौड़ पड़ा।
मैं उसके पीछे था। गली के मोड़ पर सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी — वो गाड़ी, जिसमें बूढ़ा आया था, जो रोज़ आता था और चला जाता था। आज दरवाज़ा खुला था, और अंदर कोई नहीं था। बोनट पर उँगली से धूल हटाकर कुछ बना था — छोटा-सा घर, और उसके नीचे एक लकीर।
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