The Token System – Chapter 725
"यह क्या है?" उन्होंने कहा। "यह मरीज़ मेरे वार्ड में कैसे?"
"यह हमारा मरीज़ है," लंबे मूँछों वाला आदमी बोला। सफ़ेद कुर्ता, मोटा शरीर, हाथ में पीली अँगूठी। वही, जो बाहर खड़ा था। "भवानी साहब के होम में इसका बेड खाली है। हम इसे ले जा रहे हैं।"
"किसने कहा?"
"साहब ने।"
मैंने उसे धक्का दिया। नहीं, धक्का नहीं — मैं उसके और स्ट्रेचर के बीच आ गया, दीवार की तरह। मेरे हाथ में स्ट्रेचर की रॉड थी और मुँह से खून टपक रहा था।
"यह बच्चा यहीं रहेगा।"
आदमी हँसा। "तू कौन है बे?"
"मैं यहाँ नौकरी करता हूँ," मैंने कहा। "और यह अस्पताल सरकारी है। यहाँ मरीज़ साहब के हुक्म से नहीं, डॉक्टर के हुक्म से जाता है।"
"हट!" उसने मेरे कंधे पर हाथ रखकर धकेला। सिर में चक्कर आया, घुटने झुके, पर मैंने स्ट्रेचर पकड़ लिया — दोनों हाथों से, ऐसे जैसे कोई नदी में डूब रहा हो और डंडा मिल जाए।
"मैं नहीं हटूँगा," मैंने कहा।
तभी एक औरत दौड़कर आई — बच्चे की माँ। उसके पैर नंगे थे, साड़ी का पल्लू फटा था, और चेहरे पर वो डर था जो सिर्फ़ उन्हीं के चेहरे पर होता है जिन्होंने अपना बच्चा एक बार खोने के बाद पाया हो और फिर खोने का डर देखा हो।
उसने मेरा हाथ पकड़ा — दोनों हाथों से, गीली हथेलियों से।
"बाबू," वो रो रही थी, "इन्होंने कहा था कि यहाँ इलाज नहीं होता। कहा था — तेरे बच्चे का नाम काग़ज़ पर लिखा है, होम में जाएगा। मैंने कहा, यहाँ ले चलो, ये लोग नहीं माने। फिर ये तुम्हारे पास आए—"
"किसने कहा?" मैंने पूछा। "किसने कहा कि यहाँ इलाज नहीं होता?"
"वो… वो सफ़ेद कुर्ते वाले। पीतल का टुकड़ा दिखाया था। बोला — इसी में तुम्हारे बच्चे का नाम लिखा है।"
मेरी जेब में टोकन था। ठंडा। पर उस वक़्त उसने मुझे जलाया — बिना गरम हुए, जैसे मेरा ही खून उसे छू रहा हो।
सुमन स्ट्रेचर के पास आई और बच्चे की नाड़ी देखी, फिर आँख की पुतली देखी, फिर एक ही साँस में बोली —
"ओटी खाली करो। दो यूनिट खून। बच्चे का ब्लड ग्रुप क्या है?"
नर्स भागी। लंबे मूँछों वाला आदमी बीच में आया।
"मैडम, भवानी साहब का—"
"भवानी साहब का हुक्म मेरे ओटी के दरवाज़े पर नहीं चलता," सुमन ने कहा। उसकी आवाज़ वैसी थी जैसी उस दिन थी जब उसने कहा था — मरीज़ पहले, काग़ज़ बाद में। "यह मरीज़ मेरा है। एक इंच भी कोई इसे नहीं ले जाएगा। अब तुम लोग बाहर जाओ, वरना मैं सुरक्षा बुलाऊँगी और तुम्हारी गाड़ी का नंबर थाने में लिखवाऊँगी।"
"मैडम—"
"बाहर।"
आदमी ने मेरी तरफ़ देखा। मैं खून से लथपथ खड़ा था, स्ट्रेचर पकड़े हुए, और मुस्कुरा रहा था — शायद इसलिए कि डर के बाद जो राहत आती है, उसका कोई और चेहरा नहीं होता।
"चल," उसने अपने साथी से कहा। "चल यहाँ से। मगर सुन ले मनोहर — भवानी साहब तुझे नहीं छोड़ेंगे।"
वो गए। दरवाज़ा उनके पीछे बंद हुआ। और मैं स्ट्रेचर के सहारे ही बैठ गया, फ़र्श पर, क्योंकि अब टाँगें साथ नहीं दे रही थीं।
सुमन ने मुझे देखा — एक पल भर — और फिर ओटी की तरफ़ बढ़ गई। दरवाज़े पर रुककर उसने पीछे मुड़कर कहा —
"मन्नू।"
"हाँ।"
"तू ऐसा क्यों करता है?"
मैंने जवाब नहीं दिया। वो चली गई।
बाहर बरामदे में बंसी और रघुवीर आ चुके थे। बंसी की साँस फूली हुई थी, माथे पर पसीना, हाथ में चाय का गिलास — कहाँ से उठाकर लाया, पता नहीं।
"अरे भाई!" वो मेरे पास बैठ गया। "तू यहाँ कैसे? मैंने सुना सिर फूटा है?"
"फूटा नहीं," मैंने कहा। "बस फटा है।"
"हँस क्यों रहा है बे?"
"क्योंकि बच्चा बच गया है," मैंने कहा। "मुझे नहीं पता कैसे, पर बच जाएगा।"
रघुवीर मेरे सामने बैठा। उसकी आँखें लाल थीं। उसने मेरा हाथ पकड़ा और दबाया — कुछ नहीं बोला। बस दबाया।
डेढ़ घंटा बैठे रहे। मेरी पट्टी बदलवाई गई। सिर पर जलन थी, आँखों के आगे धुँधलापन, पर खून बहना रुक गया।
तभी ओटी का दरवाज़ा खुला। सुमन बाहर आई, मास्क नीचे खींचा, माथे पर पसीने की बूँदें।
बंसी खड़ा हुआ। मैं भी उठा — दीवार का सहारा लेकर।
सुमन ने मास्क उतारा और पहली बार मुस्कुराई — थोड़ी-सी, दो सेकंड के लिए, फिर वापस गंभीर।
"बच गया," उसने कहा।
बंसी ने ताली बजाई। रघुवीर ने आँखें बंद कर लीं।
"पर," सुमन ने कहा, और मेरी तरफ़ देखा, "दो घंटे पहले आ जाता तो और अच्छा होता। जो रास्ते में देर करवाते हैं न — वो डॉक्टर नहीं होते, मन्नू। वो लोग सिर्फ़ काग़ज़ के पीछे भागते हैं।"
मैंने सिर हिलाया। कुछ नहीं बोला।
तभी बच्चे की माँ ओटी के दरवाज़े से बाहर आई, और मुझे देखकर सीधे मेरे पैरों पर गिर पड़ी — माथा फ़र्श पर।
"बाबू, तुम्हारी वजह से—"
मैंने उसे कंधों से पकड़कर उठाया — पूरी ताकत से, और मेरे हाथ काँप रहे थे।
"मत करो," मैंने कहा। "मैं यहाँ नौकरी करता हूँ। यही मेरा काम है। तुम जाकर बच्चे के पास बैठो। वो अब ठीक है, तुम्हें देखेगा तो और ठीक होगा।"
वो उठी। फिर रुकी, और उसने धीरे से कहा —
"जो आदमी मुझे रोक रहा था… उसके हाथ में एक पीतल की चीज़ थी। और उस पर कोई नाम लिखा था। मैंने पढ़ा नहीं, पर वो बोला — 'इसी में तेरे बच्चे का नाम है।' और मुझे लगा मेरे बच्चे का नाम किसी और के हाथ में है।"
मेरी जेब में टोकन ठंडा था। मैंने उसे छुआ — चुप था।
सुमन ने मेरी कुहनी पकड़ी और कोने में ले गई, जहाँ बंसी और रघुवीर नहीं थे, सिर्फ़ एक बंद खिड़की और दीवार पर लगा पुराना पोस्टर।
"तेरे सिर पर किसने वार किया?" उसने पूछा।
"रामदीन," मैंने कहा। "मुझे लगता है। या फिर वही लाठी वाला। रैक के पीछे अंधेरा था—"
"रुक," उसने कहा। "रामदीन नहीं। अगर रामदीन होता तो वार पीछे से होता और तू अब तक नहीं उठता। उसके हाथ में ताकत है, पर वो सिर्फ़ डराता है। यह वार किसी डरने वाले का था — जल्दबाज़ी में, ग़ुस्से में।"
"तो कौन?"
सुमन ने अपनी कोट की जेब से कुछ निकाला। मुझे दिया — और मेरी हथेली पर गिरा। छोटा-सा पीतल का टुकड़ा, कोना जैसा, जिस पर एक निशान खुदा था — दो लकीरें और एक बिंदु, पर उलटा।
"जब मैं रैक के पास पहुँची," उसने कहा, "वो भाग रहा था — तेरे सिर पर वार करके। सीढ़ी पर पैर फिसला, गिरा, और उसकी जेब से यह गिरा। मैंने देखा — सफ़ेद कुर्ता था, पर तेरे भवानी वाले आदमी नहीं, क्योंकि उसके जूते काले थे। नीचे से आया था, ऊपर नहीं।"
मैंने टुकड़े को उलटकर देखा। निशान उलटा था — उसी तरह उलटा जैसे रामदीन ने रिकॉर्ड कमरे की दीवार पर छोड़ा था। मेरी जेब से टोकन निकाला — पर वो ठंडा था, चुप, कोई नई लकीर नहीं।
"सुमन," मैंने कहा। "यह टुकड़ा मुझे दे रही है?"
"हाँ।"
"क्यों?"
उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो डॉक्टर की आँखों में तब आती है जब वो अपने मरीज़ से कुछ छिपा रही हो।
"क्योंकि," उसने धीरे कहा, "मैंने उस आदमी का चेहरा नहीं देखा, पर मैंने उसकी कलाई देखी। उस पर एक पुराना ज़ख्म था — जला हुआ, गोल, टोकन जैसा। और मुझे वो ज़ख्म पहले कहीं देखा हुआ लगा।"
"कहाँ?"
"पता नहीं," उसने कहा। "पर जब तक पता न चले, यह टुकड़ा तेरे पास रहेगा। मेरे पास नहीं।"
मैंने टुकड़ा जेब में रखा। टोकन के बगल में। और टोकन ने उसे छुआ भी नहीं, गरम भी नहीं हुआ।
बंसी ने कोने से आवाज़ दी — "मन्नू! इधर आ!"
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