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The Token System – Chapter 7

7 min read November 6, 2026

शेखर बाबू ने चश्मा उतारा। रूमाल से पोंछा। वापस लगाया। "मनोहर, अच्छे से सुन लो। वो काग़ज़ जो तुम्हारे पास है — उसे वापस लौटा दो। जहाँ मिला था वहाँ।"

रक्त सूखा।

"काग़ज़?"

"तुम समझ गए हो।" उन्होंने अपनी फ़ाइल पर उँगली रखी। "चश्मे वाले ने फ़ोन किया था। उसने बताया तुम्हारे पास क्या है। मनोहर, ये अस्पताल है। यहाँ ऐसी चीज़ों की जगह नहीं। अगर रिकॉर्ड कमरे में कुछ मिलता है, तो मैं ज़िम्मेदार ठहरूँगा। ऊपर से मेरी नौकरी जाएगी।"

"आपको कहीं और जगह मिल गई है।" मैंने कहा।

"क्या कहा?"

"आपने फ़ाइल से पहले फ़ोन उठाया।" मैंने कहा। "अगर सिर्फ़ नौकरी की बात होती तो ठाकुर के आदमी आपको फ़ोन नहीं करते। वो आपको पहले से जानते हैं।"

शेखर बाबू का चेहरा पीला पड़ गया। फिर लाल।

"बाहर जाओ।"

"माँ का रिकॉर्ड?"

"आदेश लेकर आओ।" उन्होंने आवाज़ ऊँची की। "आज नहीं।"

मैं उठा। दरवाज़े तक गया। रुका। "शेखर बाबू, एक बात। रिकॉर्ड कमरे की चाबी कहाँ रहती है?"

उन्होंने सिर उठाया। "क्यों?"

"बस पूछ रहा हूँ।"

"नौकरी सँभालो, मनोहर।" उन्होंने फ़ाइल की तरफ़ लौटकर कहा। "बातें कम करो।"

बाहर निकलकर मैंने फ़ोन निकाला। रीना का नंबर। इस बार उठा।

"भैया?"

"रीना। तू ठीक है?"

"हूँ। बुआ के घर पर हूँ। माँ सो रही है।"

"रीना, किसी को कुछ मत बताना। दरवाज़ा खोलना मत।"

"भैया, तू ठीक है?"

"मैं ठीक हूँ।" फिर मैंने कहा। "रीना, एक बात पूछनी है।"

"पूछ।"

"दादा के बारे में कभी कुछ सुना है? ऐसा कुछ… हवेली वाला?"

रीना एक पल चुप रही। "माँ ने कभी नहीं बताया। पर एक बार दादा की अलमारी में एक पुरानी फोटो देखी थी। हवेली के सामने खड़ी दो लोग। दादा और एक आदमी। पीछे लिखा था — 'हम दो, हिसाब बराबर।'"

मेरा हाथ काँपा।

"वो फोटो कहाँ है?"

"माँ की अलमारी में। ऊपर वाले खाने में।"

"रीना, तू उसे देख सकती है?"

"माँ सो रही है।"

"कल।"

"भैया, क्या हो रहा है?"

"रीना, कुछ नहीं।"

"भैया।" उसकी आवाज़ में खीज थी। "मैं तेरी बहन हूँ। मुझे बेवकूफ़ मत बना।"

"बता दूँगा। जब सही वक़्त होगा।"

मैंने फ़ोन काटा। सीढ़ियों से ऊपर गया। छत पर जाने का रास्ता। दरवाज़ा खुला था। मैं छत पर गया। दोपहर की चाय अब भी बरतन में पड़ी थी, वैसी ही, वैसे ही ठंडी। मैंने उसे नहीं गरमाया।

शाम को मैं घर पहुँचा। माँ और रीना अभी बुआ के घर थे। मैं अकेला। मकान सूना था। मैंने दरवाज़ा बंद किया। अंदर गया। जेब में हाथ डाला, काग़ज़ निकाला। मेज़ पर रखा। काग़ज़ के नीचे उँगली सरकाई। उँगली को कुछ मोटा छुआ।

मैंने काग़ज़ उठाया। काग़ज़ के नीचे, जेब में, एक मोटा बंडल था। नोटों का। मैंने निकाला। गिना। बीस नोट, सौ-सौ के। दो हज़ार रुपये।

मैं सुबह अस्पताल गया था। जेब खाली थी। मेरे पास तीस रुपये थे, वो भी औरत के सामने रख आया। तो ये दो हज़ार कहाँ से?

टोकन जेब से निकाला। ठंडा था। काग़ज़ की तरफ़ नहीं। मेरी तरफ़। उस पर कुछ उभरा।

मैंने पढ़ा।

"बाकी: दो सौ।"

फिर नीचे।

"छोटू की माँ: बुख़ार। दवा।"

मैं बैठ गया। हाथ में नोट। टोकन। और काग़ज़।

मैंने एक नोट उठाया। उसे सूँघा। कोई गंध नहीं। मैंने सब नोट मेज़ पर रखे। मैं बंडल को छोड़कर पीछे हटा।

फिर मैंने देखा — बंडल के नीचे एक छोटी परची थी। काग़ज़ की, काग़ज़ जैसी ही पीली, पर नई। उस पर लिखा था, मेरे ही हाथ से — "छोटू की माँ को देना। तीन सौ में से। दो सौ। बाकी सौ।"

मैंने परची पलटी। पीछे कुछ नहीं। स्याही ताज़ी नहीं थी, पर मेरी पहचान की थी। मैंने ऐसा कोई काग़ज़ नहीं लिखा। फिर भी ये मेरी लिखाई में था।

खिड़की से बाहर देखा। गली में सफ़ेद जीप नहीं थी। बंसी की दुकान पर ताला खुल गया था, चाय की भाप उठ रही थी। दूर किसी की रेडियो बज रही थी।

मैंने नोट बंडल फिर से गिना। दो हजार। दो सौ का हिसाब। शेष — एक हज़ार आठ सौ। छोटू की माँ के लिए। पर टोकन कह रहा था छोटू की माँ के लिए सिर्फ़ दो सौ। बाकी का क्या?

मैं सो नहीं पाया। रात भर बैठा रहा। सुबह चार बजे, पौ फटने से पहले, मैं काग़ज़, टोकन और नोट अपनी जेब में रखकर खेत्री के लिए निकल पड़ा।

रास्ते में एक बात मेरे दिमाग़ में घूम रही थी। दो हजार। मैंने गिना। छोटू की माँ के लिए दो सौ। बाकी एक हज़ार आठ सौ। और टोकन पर लिखा था — "बाकी: दो सौ।"

मतलब जो बाकी है, वो दो सौ है। बाकी पूरा हो चुका। तो फिर एक हज़ार आठ सौ किसका?

एक ऑटो रोका। खेत्री से पहले वाला मोड़। मैं उतर गया। झुग्गी में घुसा। छोटू की माँ दरवाज़े पर नहीं थी। झोपड़ी का दरवाज़ा खुला था। अंदर अंधेरा। मैंने आवाज़ दी।

कोई नहीं बोला।

मैं कंबल उठाने के लिए झुका। कंबल के नीचे एक फटा हुआ तकिया। उसके नीचे एक फोटो। पुरानी। नहीं, ज्यादा पुरानी नहीं। साल-दो साल पहले की।

फोटो में छोटू की माँ थी। उसके साथ एक औरत थी — बहुत बूढ़ी, झुर्रियों वाली। और उनके पीछे एक झोपड़ी के पास, धुंधला सा, दूर खड़ा एक आदमी।

मैंने फोटो करीब किया।

वो आदमी मेरे दादा थे।

॥

फोटो हाथ में थी और मेरे पैर जैसे ज़मीन पर नहीं थे। दादा। वही दादा जिनके सामान से यह टोकन निकला। वही दादा जिनके बारे में माँ कहती थी — बस एक दिन हवेली की तरफ़ देखकर रोए थे। मैंने फोटो को करीब लाया, आँखें सिकोड़ीं। दादा की शर्ट वही मटमैली, हाथ में कुछ पकड़े हुए। क्या पकड़े हुए?

मैंने फोटो पलटी। पीछे स्याही से कुछ लिखा था, फीका। मैंने आँखें मलीं। दो शब्द थे, बस। "हम दो।" और नीचे, छोटा सा, "हिसाब बराबर।"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। यह वही लाइन थी जो रीना ने बताई थी — माँ की अलमारी वाली फोटो के पीछे भी यही लिखा था। तो यह एक ही लिखाई थी। दादा की।

मैं झोपड़ी में खड़ा था, साँस लेना भूलकर। बाहर कुत्ता भौंका। मैं चौंका। फोटो जेब में डाली और झोपड़ी से बाहर आया।

सामने एक औरत खड़ी थी। तीस के आसपास, सिर पर दुपट्टा, हाथ में पानी का बर्तन।

"तुम कौन हो?" उसने पूछा। आवाज़ में डर था, पर पीछे हटी नहीं।

"मन्नू। अस्पताल से। छोटू को भर्ती किया था मैंने।"

उसका चेहरा थोड़ा नरम हुआ। "तुम वो हो जो बच्चा लेकर भागे थे?"

"हाँ। छोटू की माँ कहाँ है?"

उसने बर्तन नीचे रखा। "वो पुलिस थाने गई थी कल। शाम को लौटी। फिर सुबह-सुबह फिर से गई। कह रही थी — काग़ज़ वाले बाबू ने बुलाया है।"

"कौन काग़ज़ वाले बाबू?"

"अस्पताल के। जो फ़ाइल लिए घूमते हैं। चश्मे वाले।"

मेरे पेट में गिरह पड़ गई। शेखर बाबू। तो वह औरत को भी बुला रहा था। क्यों?

"वो कब लौटेगी?"

"नहीं पता। तुम्हें कुछ देना था?"

मैंने जेब में हाथ डाला। नोट थे, दो हज़ार। मैंने दो सौ निकाले, फिर सोचा, और एक हजार भी निकाले।

"ये उसे देना।" मैंने पैसे उसके हाथ में रखे। "बच्चे की दवा के लिए। बताना मन्नू भैया ने दिए।"

औरत ने पैसे गिने नहीं। बस दुपट्टे में बाँध लिए। "वो औरत बहुत परेशान है। सुबह से कुछ नहीं खाया उसने। काग़ज़ वाले बाबू ने डरा दिया था — कह रहा था, बच्चे को ठाकुर के नर्सिंग होम भेजने पड़ेंगे, वरना काग़ज़ नहीं बनेंगे।"

मेरी मुट्ठी भिंच गई।

"दीदी, एक बात पूछूँ? ये झोपड़ी किसकी है? किसने बनाई?"

"यह तो बहुत पुरानी है। काकी बताती थीं, पहले यहाँ एक माली रहता था। हवेली का।"

"माली?"

"हाँ, हवेली की ज़मीन पर झुग्गी बसी थी। पहले यहाँ कच्चे घर थे। वो माली सबको ज़मीन दिखाता था, पैसा नहीं लेता था। बस कहता था — हिसाब बराबर रखना।"

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