The Token System – Chapter 689
"बीस साल पहले," हरीश चंद्र ने कहा। "और वो ज़िंदा है।"
"ज़िंदा है और अदालत में बैठा था।"
बंसी ने कप मेज़ पर पटका। "मैं उससे बात करूँगा।"
"नहीं," मैंने कहा। "वो खुद मेरी तरफ़ देखकर सिर हिलाया था। वो मुझसे बात करेगा, बस मौक़ा चाहिए।"
तभी दरवाज़े पर खटखटा हुआ। बंसी उठा। बाहर एक लड़का था — सोलह-सत्रह साल का, साइकिल पर, हाथ में मुड़ा काग़ज़।
"मनोहर भाई हैं?"
"हूँ।"
लड़के ने काग़ज़ पकड़ाया और साइकिल पर चढ़कर भाग गया। मैंने खोला। एक लाइन थी — बस एक लाइन, सीधी स्याही में।
"तीसरी चाबी मेरे पास है। पर वो अदालत के ताले की नहीं, उस बूढ़े के घर के ताले की है। उसे ढूँढना हो तो कल सुबह सात बजे, पुराने कुएँ के पास। अकेले।"
मैंने काग़ज़ माँ को दिया। उन्होंने पढ़ा और हरीश चंद्र को दे दिया।
"ये पर्ची," हरीश चंद्र ने कहा, "किसी बड़े आदमी की लिखाई है। देखो, अक्षर बड़े हैं, फ़ासले में हैं। ये आदमी बहुत कम लिखता है।"
"या बहुत कम लोगों को लिखता है," रघुवीर ने कहा।
मैंने पर्ची फिर पढ़ी। पुराने कुएँ के पास। कौन सा कुआँ? हवेली के पीछे वाला तो ईंटों से ढका था। बसवा वाला सूखा था। और शहर में एक और कुआँ था — जो अब पुराने बाज़ार के बीच पाट दिया गया है।
"कल सात बजे," बंसी ने कहा। "मैं साथ चलूँगा।"
"पर्ची कहती है अकेले।"
"पर्ची चाहे कुछ कहे," बंसी ने चाय खत्म की, "अकेले तो तू तब भी नहीं जाएगा जब मैं मर जाऊँ।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँख में वो सवाल था जो वो हमेशा चुपचाप पूछती हैं। मैंने उनका हाथ थामा।
"माँ, अब मैं वही करूँगा जो सही है। पर एक बात पूछनी है — तुमने कभी मुझे बताया नहीं कि दादा की मौत के बाद हवेली की चीज़ें कहाँ गईं।"
माँ ने हाथ खींच लिया। "तू पूछ रहा है कि मैंने कुछ छिपाया?"
"मैं पूछ रहा हूँ कि तुमने कुछ बचाया।"
माँ ने आँखें बंद कीं। फिर उठकर अंदर गईं और एक छोटा पीतल का डिब्बा ले आईं — वही जो उन्होंने उस रात मुझे दिया था, जिसमें पापा की पर्ची थी।
"ये डिब्बा तेरे दादा का था," माँ ने कहा। "इसमें जो पर्ची थी, वो तो तूने पढ़ ली। पर डिब्बे के ढक्कन की अंदरूनी तह में एक और काग़ज़ है। मैंने कभी खोला नहीं। डर लगा।"
मैंने डिब्बा लिया, ढक्कन उलटा किया। भीतर की तह पर एक काग़ज़ चिपका था — पीला, मुड़ा, स्याही से लिखा।
"मेरे बेटे कन्हैया के हाथ। मैं जानता हूँ कि मेरा हिसाब पूरा नहीं होगा। इसलिए ये टोकन का हिस्सा — मेरे बेटे के पास है। वो इसे कभी नहीं खोलेगा। और जो मेरा पोता होगा, वो इसे खोलेगा — तभी जब वो पूरा हिसाब लिख चुका हो।"
मैंने काग़ज़ नीचे रखा। हाथ काँप रहे थे।
दादा की पहली पर्ची की कहानी पूरी थी।
"दो दिन," हरीश चंद्र ने कहा। "अगली सुनवाई से पहले वो बूढ़ा मिलना चाहता है। और मुझे लगता है वो तीसरे टोकन का सच जानता है — वो टोकन जो नींव के संदूक में था, और जिसका कोई अंक नहीं था।"
रात को जब सब सो गए, मैं छत पर गया। शहर की रोशनी दूर तक फैली थी। जेब में टोकन फिर हल्का गरम हुआ — बहुत हल्का, बस एक पल के लिए — और फिर ठंडा हो गया। मैंने निकालकर देखा। उस पर कोई शब्द नहीं था।
सिर्फ़ एक निशान था, जो पहले नहीं था — एक छोटी सी लकीर, कोने के निशान के ठीक नीचे।
और मुझे पता था कि जब टोकन पर लकीर उभरे, तो मतलब हिसाब खुद बोलने लगा है।
अगली सुबह सात बजे का वादा था, और मुझे लगा था कि वो सबसे बड़ी बात है। पर जब मैं सुबह पाँच बजे उठा, तो दरवाज़े के नीचे से एक और काग़ज़ सरका हुआ था। उस पर सिर्फ़ चार शब्द थे, टेढ़ी-मेढ़ी लिखाई में —
"वो आज नहीं आएगा।"
मैंने काग़ज़ बंसी को दिया। उसने पढ़ा और सीधे जूते पहनने लगा।
"कहाँ जा रहा है?"
"कुएँ पर। देखने कौन आया, कौन नहीं।"
"और अगर वहाँ कोई और हो?"
बंसी ने जूते का फ़ीता कसा। "तो मैं भी किसी और की तरह मिलूँगा। तू पीछे से आ, दूर से। अगर मैं हाथ उठाऊँ, तो तू वापस मुड़ जाना।"
हम निकले। सड़कें खाली थीं, सिर्फ़ दूध वालों की साइकिलें और एक-दो मंदिर के घंटे। पुराने बाज़ार के मोड़ पर बंसी रुका और मेरी तरफ़ देखे बिना बोला, "मन्नू, तेरे पापा जब गए थे, तब तू कितने साल का था?"
"आठ।"
"याद है उनकी आवाज़?"
"कुछ नहीं। बस इतना कि वो हँसते थे और हँसते वक़्त आँखें बंद हो जाती थीं।"
बंसी ने कुछ नहीं कहा। हम आगे बढ़े।
पुराना कुआँ बाज़ार के पीछे एक टूटी दीवार से घिरा था। ऊपर लोहे की जाली, जंग खाई हुई। मैं दूर खड़ा रहा, एक खोखले पेड़ की आड़ में। बंसी कुएँ के पास गया और दीवार पर टेक लगाकर खड़ा हो गया, जैसे कोई दिन मज़दूरी पर आया हो।
छह बजकर पैंतालीस। सन्नाटा।
सात बजे। कोई नहीं आया।
सात बजकर दस। फिर पंद्रह। बंसी ने एक बार पीछे मुड़कर मेरी तरफ़ देखा। मैंने कंधा उचकाया।
तभी जाली के उस पार, कुएँ के भीतर से एक आवाज़ आई। बहुत धीमी, गीली, जैसे कोई बरसों से बंद कमरे में बोल रहा हो।
"तुम दोनों आ गए। अच्छा किया।"
बंसी सीधा खड़ा हो गया। मैं दौड़कर पास आया।
कुएँ की जाली के अंदर, एक-डेढ़ हाथ नीचे, एक सीढ़ी पर बैठा आदमी था। सफ़ेद दाढ़ी, कंधों तक बाल, आँखें एकदम साफ़ — जैसे कोई बूढ़ा न हो, बस समय ने उसे कुछ ज़्यादा दिया हो।
"आपने पर्ची भेजी थी?" मैंने पूछा।
"मैंने नहीं। मेरे आदमी ने।" उसने जाली की छड़ पकड़ी। "मैं खुद ज़्यादा दिन नहीं चल सकता। इसलिए बाहर नहीं आया।"
"आप कौन हैं?"
"मेरा नाम रामदीन की किताब में कहीं नहीं है। भवानी की किताब में है, पर काटा हुआ।" उसने खाँसी रोकी। "बीस साल मैं उसी दिन के बाद से कुएँ-कुओं में रहा हूँ। जिस दिन हवेली की नींव खोदी गई थी।"
बंसी ने मेरी कलाई दबाई। वो समझ रहा था जो मैं नहीं समझ रहा था।
"वो संदूक," रघुवीर जैसा शब्द बंसी के मुँह से निकला, "आपने देखा था?"
"मैंने निकाला था," बूढ़े ने कहा। "और फिर वापस रख दिया। क्योंकि जब मैंने खोला, तो अंदर सिर्फ़ एक टोकन था — नंबर नहीं, नाम नहीं, बस एक टोकन। और उसके नीचे एक पर्ची थी — चार नाम। हरि सिंह, रामदीन, मेरा, और चौथा।"
"चौथा कौन?" मैंने पूछा।
बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँख में कुछ ऐसा था जो मैंने किसी में नहीं देखा था — डर नहीं, लाज।
"चौथा नाम मैंने खुद काटा था। चाकू से। पर्ची से। क्योंकि चौथा नाम मेरा था।"
कुछ पल कुएँ के भीतर से हवा आती रही।
"हम चार नहीं थे," बूढ़े ने कहा। "पाँच थे। पाँचवाँ वो था जिसने हमें रोका था — मन्नू का दादा। और दादा ने बाँट की किताब लिखनी शुरू की थी, ताकि सब कुछ काग़ज़ पर रहे। भवानी के दादा हरि सिंह ने उसे सबसे पहले चोरी से निकाला। और मैंने — मैंने चुप रहने की कीमत ली। दो बीघा ज़मीन।"
बंसी ने जाली हिलाई। "आपने अपने साथी को बेच दिया?"
"मैंने अपनी चुप्पी बेची थी," बूढ़े ने कहा। "वो ज़्यादा महँगी साबित हुई।"
"अब क्या चाहते हो?" मैंने पूछा।
"मैं तीसरा ताला खोलना चाहता हूँ। पर मेरे हाथ में चाबी नहीं है। मेरे पास सिर्फ़ ये है।" उसने जाली के बीच से एक छोटा पीतल का टुकड़ा बढ़ाया — टोकन जैसा, पर आधा, जैसे किसी ने बीच से तोड़ा हो।
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