The Token System – Chapter 688
अदालत के आँगन में तीन ताले और एक तिजोरी रखी थी, और जज का आदेश था — एक-एक करके खुलेंगे, सब रिकॉर्ड पर लिया जाएगा। मैंने रामदीन की चाबी जेब से निकाली तो हथेली पसीज गई। बंसी ने अपने ससुर वाली चाबी मुँठ में दबाई हुई थी। और तीसरी चाबी का कोई पता नहीं था।
तभी भवानी आगे बढ़ा। सीधा तिजोरी पर हाथ डाला।
"ये मेरी तिजोरी है। मेरे दादा की। इसे कोई नहीं खोलेगा।"
जज ने कलम मेज़ पर रखी। "ठाकुर साहब, आप अदालत में खड़े हैं। ये तिजोरी अब अदालत के कब्ज़े में है। अपनी जगह पर वापस जाइए।"
भवानी हिला नहीं। पीछे से दो आदमी आँगन में घुस आए — सफ़ेद कुर्ते, मोटी कलाई, दोनों की कमर पर डंडे। एक ने तिजोरी का कोना पकड़ा।
"बाहर करो इन्हें," जज ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो किसी अदालत में कम सुनाई देती है। "अभी।"
पुलिस दो कदम में पहुँची। भवानी के आदमियों को खींचकर बाहर किया गया। एक ने भीतर जाते वक़्त भवानी की तरफ़ देखा, और भवानी ने उसे आँख से ही कुछ कहा। फिर भवानी अपनी जगह पर लौटा — पर बैठा नहीं, खड़ा रहा।
"पहला ताला," जज ने कहा।
मैं आगे बढ़ा। रामदीन की चाबी — ज़ंग लगी, बड़ी, तीन दाँते। मैंने ताले में डाली और घुमाया। कच… कच… और एक कड़क के साथ ताला खुल गया, जैसे बहुत सालों की ज़िद टूटी हो।
पहरेदार ने ढक्कन उठाया। अंदर से तीन चीज़ें निकलीं — एक पुरानी खाता-बही, जिसकी जिल्द भूरी और किनारे घिसे हुए थे; एक सीलबंद लिफ़ाफ़ा, जिस पर लाल मोम की मुहर थी; और एक तस्वीर, जो उलटी पड़ी थी।
तस्वीर पलटी तो आँगन में सन्नाटा छा गया। तस्वीर में दो आदमी थे — दोनों युवा, दोनों के हाथ में मुहर, और दोनों हँस रहे थे। एक मेरे दादा थे — मैंने उन्हें सिर्फ़ एक बार देखा था, माँ की पुरानी तस्वीर में। और दूसरा… ठाकुर हरि सिंह। मुझे उनका चेहरा पहचानना नहीं आता था, पर हरीश चंद्र ने धीमे से कहा — "ये हरि सिंह हैं। युवा हरि सिंह।"
भवानी ने तस्वीर देखी और उसका चेहरा पीला पड़ गया। वो एक कदम पीछे हटा। फिर बोला — और उसकी आवाज़ पहली बार पतली निकली।
"ये तस्वीर मेरे घर से कभी बाहर नहीं गई थी।"
"अब बाहर है," हरीश चंद्र ने कहा।
मैंने तस्वीर को करीब किया। दादा की जेब की तरफ़ नज़र गई — कुर्ते के सीने के नीचे, दाएँ तरफ़। वहाँ कुछ उभरा हुआ था। एक गोल, चमकीला कोना — टोकन जैसा ही।
"दादा की जेब में," मैंने बंसी को धीरे से कहा।
बंसी ने झाँका। उसकी नज़र तेज़ थी। "हाँ। और देख — हरि सिंह की जेब खाली है।"
हरीश चंद्र ने तस्वीर मेरे हाथ से ली, जज की मेज़ की तरफ़ बढ़ी और उसे सबूत के तौर पर रखवाया। पहरेदार ने पर्ची काटी। जज ने तस्वीर पर नज़र दौड़ाई।
"अगली सुनवाई," जज ने कहा, "इसी आँगन में, परसों सुबह दस बजे। तब तक ये तिजोरी और इसका हर सामान अदालत के कब्ज़े में रहेगा। कोई इसे छुएगा — सीधा सीधा मामला।"
परसों। दो दिन।
लोग उठने लगे। भवानी भी मुड़ा, पर जाते-जाते उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा। दो सेकंड भी नहीं, पर उन दो सेकंड में उसकी आँखों में जो था, वो ग़ुस्सा नहीं था। वो डर था।
भीड़ पतली होने लगी। मैं आँगन के बाहर बढ़ा तो शेखर बाबू मेरे पास आए। उनका चश्मा फिर नाक पर फिसल आया था। उन्होंने मेरा कोहनी पकड़ा और मुझे खंभे की तरफ़ खींचा।
"सुन।"
"कहिए।"
"तीसरा ताला," शेखर बाबू ने रुककर मेरी तरफ़ देखा, "उसकी चाबी किसी के पास नहीं थी, है ना?"
"नहीं है।"
"पर ताला आज खुलेगा," शेखर बाबू ने धीमे से कहा। "क्योंकि उसका मालिक आज इसी आँगन में बैठा है।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। आँगन में जो लोग बचे थे — कुछ वकील, दो रिपोर्टर, मेरी तरफ़ की बेंच पर बंसी और रघुवीर, पीछे माँ और गिरधारी देवी, एक कोने में बसंती, और सबसे आगे की बेंच पर…
"…रामदीन?"
नहीं। रामदीन तो मेरे साथ खड़ा था। सबसे आगे की बेंच पर एक और आदमी बैठा था — साठ से ऊपर, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में लाठी। वो वही बूढ़ा था जिससे गाड़ी स्टार्ट होते ही हमारा सामना हुआ था — जिसकी लाठी पर टोकन जैसा निशान था।
"वो कौन है?" मैंने पूछा।
"मुझे भी नहीं पता," शेखर बाबू ने कहा। "पर वो कल सुबह से तहसील के बाहर बैठा था, और आज सुबह जब मैं आया, वो पहले से यहाँ था। सबसे आगे।"
मैं उसकी तरफ़ बढ़ा। दो कदम चला था कि बंसी ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"रुक। अभी नहीं। भवानी का आदमी बाहर खड़ा है। उसे देख लेगा तो उसे भी पता चल जाएगा कि हम उसे ढूँढ रहे हैं।"
बंसी सही था। मैं रुक गया। पर उस बूढ़े ने मुझे देख लिया था। और उसने धीरे से सिर हिलाया — एक बार, ऊपर से नीचे — शायद पहचान का इशारा, शायद चेतावनी।
हम बाहर निकले। सड़क पर धूप तेज़ थी। माँ गिरधारी देवी का हाथ पकड़े चल रही थीं, और गिरधारी देवी के कदम भारी थे — पचास साल बाद वो अपने ही शहर की अदालत में अपना हिसाब सुन रही थीं।
रघुवीर मेरे साथ चल रहे थे। उन्होंने लाठी ज़मीन पर टिकाई और धीरे बोले, "तूने तस्वीर में जो देखा — दादा की जेब में — वो टोकन था।"
"हाँ।"
"मतलब दादा के पास टोकन उस वक़्त भी था, जब हरि सिंह ज़िंदा था और हवेली उनके कब्ज़े में थी।"
"मतलब?"
"मतलब ये कि हरि सिंह जानता था कि टोकन क्या है। और उसने दादा से टोकन छीनने की कोशिश कभी नहीं की — क्योंकि उसे पता था कि टोकन छीना नहीं जाता, छीने से सिर्फ़ हिसाब बढ़ता है।"
मैंने सोचा। हवेली की दीवार में दो खाँचे थे। दो टोकन निकले थे। एक मेरे पास, एक भवानी के पास। और अब अदालत की तिजोरी में भी एक टोकन था — वो जो नींव के संदूक से मिला था, बिना अंक वाला, भारी, सपाट।
"तीन टोकन," मैंने कहा। "हवेली की दीवार, नींव का संदूक, और भवानी के पास।"
रघुवीर ने मेरी तरफ़ देखा। "और चौथा?"
"चौथा कहाँ से आया?"
"चौथा वही है जो अभी भी किसी और की जेब में है," रघुवीर ने कहा। "और मुझे लगता है वो तेरे ही आँगन में खड़ा था — उस बूढ़े की लाठी पर जो निशान था।"
घर पहुँचे तो सूरज ढल रहा था। बंसी ने चाय की केतली चढ़ाई और सब बैठ गए। शेखर बाबू ने अदालत से लाई काग़ज़ों की पोटली मेज़ पर रखी और उसमें से पहली बही निकाली — वो जो अदालत ने आँगन में तिजोरी से निकलवाई थी, की कॉपी।
"इस बही में," शेखर बाबू ने कहा, "हरि सिंह की लिखाई है। और एक जगह उसने बड़ी साफ़ लिखा है — 'मेरा बेटा मरा नहीं है। वो बसवा में है।'"
हरीश चंद्र ने चश्मा पोंछा। "तो भवानी के भाई की बात सही थी।"
"हाँ। और उसके नीचे एक लाइन है — 'उसे हवेली से दूर रखना। हवेली का हिसाब उसके हाथ में नहीं जाना चाहिए।'"
गिरधारी देवी ने अचानक सिर उठाया। "हरि सिंह ने अपने ही बेटे को हवेली से दूर रखा?"
"लिखा तो यही है," शेखर बाबू ने कहा। "वजह भी लिखी है — 'वो टोकन छू लेता है, और टोकन उसे छूने देता है। मैंने उसकी उँगली पर जला हुआ निशान देखा है।'"
मेरी जेब में टोकन ठंडा पड़ गया — अचानक, एक झटके में। मैंने हाथ डाला। वो सामान्य हो गया था।
"रामदीन काका," मैंने कहा। "ये बूढ़ा जो अदालत में सबसे आगे बैठा था…"
रामदीन ने चाय का कप रख दिया। "वो बूढ़ा," रामदीन ने धीमे से कहा, "मेरे गाँव का नहीं है। पर मैंने उसे एक बार देखा है — बीस साल पहले। वो उसी रात हवेली के पास खड़ा था जिस रात पापा गए थे।"
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