The Token System – Chapter 663
तहसील के आँगन में पहुँचा तो धूप चढ़ आई थी। बरामदे की छाँव में बंसी, हरीश चंद्र और शेखर बाबू पहले से खड़े थे। शेखर बाबू के हाथ में मोटी फ़ाइल थी, चश्मा नाक पर फिसला हुआ।
“अंदर चल,” शेखर बाबू ने कहा। “नायब तहसीलदार बैठे हैं।”
“एक मिनट।” मैंने रणविजय को देखा। वह किनारे पर, पीपल की छाँव में खड़ा था। अकेला। हाथ जेब में, आँखें ज़मीन पर।
मैं उसके पास गया। वह मुझे देखकर सीधा खड़ा हो गया, जैसे स्कूल का बच्चा मास्टर को देखकर।
“तूने चाबी दी थी,” मैंने कहा। “उससे क्या निकला?”
“रजिस्टर की कॉपी।” उसकी आवाज़ सूखी थी। “पर उसमें चौथी हिस्सेदार का नाम नहीं है। हरि सिंह ने उसे स्याही से काट दिया था। उस जगह पर सिर्फ़ एक धब्बा है।”
“धब्बा?”
“काला धब्बा। पर काटने से पहले जो लिखा था, वो उभरा हुआ है। अगर काग़ज़ को रोशनी में पकड़ो, तो पढ़ सकते हो।”
“क्या लिखा है?”
रणविजय ने अपनी जेब से मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला। उसने मेरी तरफ़ बढ़ाया।
“गिरधारी देवी। पर उसके नीचे एक और नाम है। बेटी का नाम।”
मैंने काग़ज़ खोला। उभरी हुई लिखाई धूप में साफ़ दिख रही थी। गिरधारी देवी के नीचे एक छोटा नाम था — सरोज।
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
“सरोज?” मैंने कहा। “ये तो…”
“तेरी माँ।” रणविजय ने मेरी आँखों में देखा। “तेरी माँ गिरधारी देवी की बेटी है। मन्नू, तेरी माँ चौथी हिस्सेदार की बेटी है।”
मैं कुछ देर खड़ा रहा। धूप सिर पर लग रही थी, पर लग रही थी जैसे किसी और के सिर पर।
“माँ को पता है?”
“शायद नहीं।” रणविजय ने काग़ज़ वापस लिया। “गिरधारी देवी ने बेटी को बचाने के लिए उसे किसी और के हाथ में दे दिया था। तेरे नाना के हाथ में। और ख़ुद नाम बदलकर बसवा चली गई।”
“तो मेरी माँ हवेली की हिस्सेदार है।”
“तेरी माँ नहीं।” रणविजय की आवाज़ भारी हो गई। “तू है। गिरधारी देवी की नातिन। तेरा हिस्सा है — उस हवेली में।”
मैंने काग़ज़ उसके हाथ से लिया और मुड़कर शेखर बाबू की तरफ़ बढ़ा।
“शेखर बाबू।” मैंने काग़ज़ उनके हाथ में दिया। “ये भी अर्ज़ी में लगाओ।”
शेखर बाबू ने पढ़ा। उनका चश्मा फिर फिसला, पर इस बार उन्होंने उसे ठीक नहीं किया।
“ये तो… ये तो सब बदल देता है,” उन्होंने धीरे से कहा।
“कैसे?”
“अगर तेरी माँ गिरधारी देवी की बेटी है, तो हवेली पर तेरा दावा पहले से ही बनता है — बिना कौशल्या के नाम के भी। और भवानी का पूरा केस ढह जाता है।” शेखर बाबू ने फ़ाइल खोली। “पर एक दिक्कत है। भवानी कहेगा — गिरधारी देवी मरी हुई है। मरे हुए की गवाही कौन देगा?”
“मैं देऊँगा।” मैंने पीला लिफ़ाफ़ा जेब से निकाला। “अगर इसमें वो चीज़ है जो मैं सोच रहा हूँ, तो गिरधारी देवी ज़िंदा है और ख़ुद बोलेगी।”
उसी वक़्त आँगन के गेट पर गाड़ी रुकी। सफ़ेद जीप। उसमें से भवानी उतरा — सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद टोपी, और साथ में दो आदमी।
हरीश चंद्र मेरे पास आए।
“ये वक़्त नहीं है लड़ने का,” उन्होंने धीरे से कहा। “ये वक़्त है काग़ज़ दिखाने का। अंदर चल।”
हम अंदर गए। नायब तहसीलदार की मेज़ पर फ़ाइलें बिछी थीं। बगल में सुनवाई की बेंच थी, जहाँ चार लोग बैठे थे।
भवानी भी अंदर आया। वह सीधा मेज़ के सामने आकर खड़ा हो गया, जैसे उसे कोई रोक ही नहीं सकता।
“नायब साहब,” उसने कहा। “ये अर्ज़ी नहीं चलनी चाहिए। ये आदमी हवेली पर झूठा दावा कर रहा है।”
नायब तहसीलदार ने शेखर बाबू की तरफ़ देखा।
“अभियुक्त कुछ कहना चाहते हैं?”
मैं खड़ा हुआ। मेरी जेब में लिफ़ाफ़ा था, और मेरे हाथ में काग़ज़।
“मैं कहना चाहता हूँ,” मैंने कहा, “कि भवानी हवेली पर दावा कर रहा है, जबकि उसका दादा हरि सिंह ने मेरी नानी का नाम काग़ज़ से मिटाया था। और मेरी नानी आज भी ज़िंदा हैं।”
भवानी हँसा। ज़ोर से। आँगन तक आवाज़ गई।
“नानी?” उसने कहा। “सुना तुमने? अब ये नानी की कहानी ले आया। नायब साहब, इसके पास कोई सबूत है?”
“सबूत है।” मैंने लिफ़ाफ़ा जेब से निकाला और मेज़ पर रख दिया। “ये मेरी नानी ने भेजा है। बसवा से।”
भवानी की हँसी एकदम रुक गई। उसका रंग उतर गया, जैसे किसी ने चेहरे से पानी फेर दिया हो।
“बसवा?” उसने कहा। आवाज़ धीमी थी।
“हाँ। गिरधारी देवी। सत्तर से ऊपर।” मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। “और उसने कहा था — इस आँगन में, तेरे सामने खोलना।”
लिफ़ाफ़े में एक काग़ज़ था, जर्जर, मुड़ा हुआ। और एक छोटी सी टेप-रिकॉर्डर की क़िस्म की गोली — नहीं, एक पुराना कैसेट। और एक परची पर लिखा था — ‘सुनाना।’
मैंने नायब तहसीलदार की तरफ़ देखा। उन्होंने सिर हिलाया।
“चलाओ।”
शेखर बाबू ने अपना पुराना टेप-रिकॉर्डर मेज़ पर रखा — वह हमेशा अपने बैग में रखते थे, कहते थे ‘अदालत में आवाज़ काग़ज़ से तेज़ चलती है।’ कैसेट डाली गई।
पहले कुछ फुफकार हुई। फिर एक बूढ़ी औरत की आवाज़ आई, धीमी, काँपती, पर साफ़।
“मैं गिरधारी देवी हूँ। हरि सिंह की बहन। हवेली की चौथी हिस्सेदार। मेरा नाम काग़ज़ से मिटाया गया, पर मैं मरी नहीं। मैं बसवा में हूँ, और ये बोल रही हूँ कि हवेली में जो मेरा हिस्सा है, वो मेरी बेटी सरोज का है, और सरोज के बाद उसके बेटे मन्नू का।”
आँगन में सन्नाटा। सच में सन्नाटा।
भवानी ने एक कदम आगे बढ़ाया।
“ये आवाज़ नक़ली है!” उसने कहा। “कोई भी औरत बैठकर बोल सकती है!”
“तो गिरधारी देवी को यहाँ बुलाओ,” मैंने कहा। “उसका पता मेरे पास है। तीन घंटे का रास्ता है। गाड़ी भेजो।”
भवानी रुक गया। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
नायब तहसीलदार ने कलम उठाई।
“अर्ज़ी मंज़ूर,” उन्होंने कहा। “गिरधारी देवी की गवाही के लिए तारीख़ दी जाएगी। और हवेली पर स्थगन आदेश जारी होता है — जब तक सुनवाई पूरी न हो, हवेली की एक ईंट भी नहीं हिलेगी।”
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो पहले नहीं था — डर। फिर वह मुड़ा और बाहर चला गया। उसके आदमी पीछे-पीछे।
मैं बाहर निकला। आँगन में धूप अब ढल रही थी। रणविजय पीपल के नीचे अब भी खड़ा था। मैं उसके पास गया।
“तेरी चाबी रख,” मैंने कहा। “और सुन — तेरा बेटा।”
वह मेरी तरफ़ देखने लगा, आँखें फटी हुई।
“अगर सुनवाई जीत गए,” मैंने कहा, “तो तेरा बेटा उस होम से बाहर आएगा। मेरा वादा है।”
रणविजय की आँखें भर आईं। उसने कुछ कहने की कोशिश की, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने सिर्फ़ मेरा हाथ पकड़ा और दबाया।
तभी मेरा फ़ोन बजा। रीना।
“भाई—” उसकी आवाज़ काँप रही थी। “भवानी ख़ुद घर आया है। माँ से बात कर रहा है। और माँ… माँ रो रही है।”
मेरा खून जम गया।
“क्या कह रहा है?”
“पता नहीं। दरवाज़ा बंद है। पर भाई, माँ की आवाज़ आ रही है — वो कह रही है ‘तूने मेरी माँ को कहाँ छिपाया?’”
फ़ोन कट गया।
मैं भागा। गाड़ी की तरफ़। पैर ज़मीन पर टिक नहीं रहे थे।
तभी हरीश चंद्र ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी पकड़ मज़बूत थी, जैसे किसी खूँटे की।
“रुक।”
“हरीश चंद्र, माँ—”
“सुन।” उन्होंने मेरी तरफ़ घूमकर कहा। “भवानी ने स्थगन आदेश सुना। वो अब घर इसलिए गया है कि तुझे यहाँ से खींचकर ले जाए। और अगर तू अभी भागा, तो यह अर्ज़ी आज अदालत में दर्ज नहीं होगी।” उन्होंने शेखर बाबू की तरफ़ इशारा किया, जो दस्तख़त के लिए काग़ज़ लेकर खड़े थे। “यह अर्ज़ी अगर आज अदालत में नहीं गई, तो भवानी कल तक हवेली की दीवार गिरवा देगा — और रजिस्टर हमेशा के लिए मिट्टी में मिल जाएगा।”
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