The Token System660 / 1154

The Token System – Chapter 660

6 min read November 6, 2026

तभी दुकान के बाहर छाया हिली। शटर के नीचे से एक जोड़ी जूते दिखे — साफ़, चमकते, मोटे तले के। शटर उठाया गया और अंदर आया एक आदमी। उम्र पचास के आसपास, काला कुर्ता, हाथ में लाल रुमाल। हम दोनों को देखकर मुस्कुराया, जैसे रास्ता भूलकर आया हो।

“ठाकुर साहब ने कहा है,” उसने बिना भूमिका के शुरू किया, “अदालत में पैर रखा तो रीना की शादी का रिश्ता किसी और को दे देंगे। काग़ज़ जला देंगे। और तेरी नौकरी भी हवा में लटक जाएगी।”

बंसी ने चाय उठाई। “तू बैठेगा या खड़ा-खड़ा ही पूरी बात बोलेगा?”

आदमी ने उसे देखा, फिर मुझे।

“ठाकुर साहब ने ये इसलिए कहा है क्योंकि वो तेरी भलाई चाहते हैं। तू उनके ख़िलाफ़ खड़ा है, पर वो चाहते हैं कि तू सीधे रास्ते पर आ जाए।”

मैं उठा। मेरी कुर्सी पीछे खिसकी और चटकी।

“तेरे ठाकुर साहब को बोल — मेरी बहन का रिश्ता उनके हाथ में नहीं, मेरे हाथ में है। और अगर उनमें दम है, तो अदालत में आकर बोलें — ‘मैंने धमकी दी थी।’ उस दिन मैं उनकी शक्ल देखूँगा।”

आदमी की मुस्कान गिर गई।

“तू सोच ले। कल सुबह के बाद कोई मौक़ा नहीं मिलेगा।”

“मौक़ा तो तेरे ठाकुर के पास भी नहीं बचा।” मैंने काग़ज़ उठाया। “जा।”

आदमी गया। शटर नीचे गिरा। फिर गाड़ी का दरवाज़ा खुला और बंद हुआ। बंसी ने बल्ब की तरफ़ देखा।

“अब?”

“अब दस्तख़त।” मैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा। “कलम दे।”

बंसी ने जेब से कलम निकाली और मेरी तरफ़ बढ़ाई। मैंने उसी जगह दस्तख़त किया जहाँ हरीश चंद्र ने निशान लगाया था — और कलम रखते वक़्त मेरा हाथ काँपा नहीं।

“अब कल सुबह तहसील में रणविजय आएगा या नहीं,” बंसी ने कहा, “यही सबसे बड़ा सवाल है। बाकी सब काग़ज़ है। गवाह नहीं।”

मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा। तभी मेरा मोबाइल बजा। स्क्रीन पर अनजान नंबर। मैंने उठाया। सामने से आवाज़ आई — भारी, थकी हुई, जैसे कोई बहुत देर से बोल रहा हो।

“मनोहर?”

“हाँ। कौन?”

“रणविजय। मैं आऊँगा।” एक पल रुका। पीछे कहीं बच्चे के साँस लेने की मशीन की आवाज़ थी। “पर पहले मेरे बेटे को भवानी के होम से निकालो। वरना मेरी गवाही किसी काम की नहीं। मेरा बच्चा वहीं है, मशीन पर। बोल — तू निकालेगा?”

मैंने बंसी की तरफ़ देखा। वो मेरी आँखों में देख रहा था।

“निकालूँगा,” मैंने कहा।

“कैसे? वहाँ भवानी के आदमी हैं।”

“वो मेरा काम है। तेरा काम — सुबह साढ़े नौ बजे तहसील के आँगन में खड़ा होना।”

“और अगर बच्चा निकला नहीं, तो मैं नहीं आऊँगा।”

“आएगा।” मैंने कहा। “क्योंकि अगर तू नहीं आया, तो तेरा बेटा सारी उम्र भवानी के होम में रहेगा — बस मशीन पर नहीं, काग़ज़ों में।”

सामने सन्नाटा रहा। फिर एक लंबी साँस। फिर आवाज़ आई — “सुबह चार बजे फ़ोन करना। बता दूँगा कि बच्चा किस कमरे में है।”

फ़ोन कटा।

बंसी ने गिलास उठाया। “अब?”

“अब घर जाकर सोने का वक़्त नहीं है।” मैंने दुकान का शटर उठाया। “पहले अस्पताल। सुमन से बात। फिर भवानी के होम।”

“और वो नींद जो तूने सुबह के लिए बचाई थी?”

“वो कल रात के लिए बचा लेंगे।”

अस्पताल की इमरजेंसी में रात का वक़्त और भी भारी लगता है। सुमन कोट के ऊपर स्वेटर पहने बैठी थी और काग़ज़ों पर पेन चला रही थी। मैंने दरवाज़ा खोला तो उसने सिर उठाया।

“रात के ग्यारह बजे?” उसने पेन रखा। “कुछ हुआ?”

“हुआ।” मैंने बैठकर सारी बात कही — अर्ज़ी, भवानी की धमकी, रणविजय का फ़ोन। सुमन सब सुनती रही, बीच में एक बार भी नहीं टोका।

“तू कह रहा है कि रणविजय का बेटा भवानी के होम में है?”

“वो ख़ुद बोला।”

सुमन ने कुर्सी पीछे सरकाई। “अगर बच्चा वहाँ है और मशीन पर है, तो उसे निकालना आसान नहीं। भवानी के होम में रात को पहरा रहता है। रसोई के पीछे वाला कमरा — वहाँ तीन आदमी हैं।”

“तू अंदर गई थी?”

“मैंने सोहन को निकालते वक़्त देखा था।” उसने अलमारी से कोई काग़ज़ निकाला। “ये पिछले दरवाज़े का नक्शा है। रसोई के बाद एक गलियारा है, और उस गलियारे के आख़िर में लोहे का दरवाज़ा — वहीं बच्चे रखे जाते हैं। चाबी मेनेजर के पास है।”

“तो हमें मेनेजर चाहिए।”

“मेनेजर रात में वहाँ नहीं रहता।” सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। “पर उसकी मेज़ का दराज़ खुला रहता है। श्यामू बता सकता है — वो तीन साल वहाँ काम कर चुका है।”

मैंने फ़ोन निकाला। श्यामू ने दो बार में उठाया।

“मन्नू?”

“श्यामू, भवानी के होम में रसोई के पीछे वाला गलियारा — उसका दरवाज़ा कैसे खुलता है?”

सामने साँस की आवाज़ आई। “मेनेजर की मेज़ के बाएँ दराज़ में एक छोटी चाबी रहती है। पर मन्नू, रात में वहाँ चार आदमी होते हैं। तीन गलियारे में, एक बाहर गेट पर।”

“और अंदर जाने का कोई दूसरा रास्ता?”

“पानी की टंकी के पीछे एक रोशनदान है। बच्चों के कमरे की छत की तरफ़। पर वो बहुत ऊँचा है।”

बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “सीढ़ी?”

“सीढ़ी हमारे पास नहीं।”

“सीढ़ी भवानी के होम में ही रखी है,” श्यामू ने फ़ोन पर कहा। “पिछली दीवार के साथ। लोहे की।”

मैंने फ़ोन रखा। सुमन उठ चुकी थी और अपनी जेब में हाथ डाल रही थी।

“तू साथ चलेगी?” मैंने पूछा।

“मैं नहीं चलूँगी।” उसने एक छोटी मुड़ी पर्ची मेरी तरफ़ बढ़ाई। “मैं यहाँ रहूँगी, ताकि अगर तू फँसा तो तेरा फ़ोन मेरे पास आए। पर मेरे पास एक चीज़ है — मरीज़ों के इलाज की पर्चियाँ। अगर तूने बच्चे को निकाला और भवानी ने तुझ पर इल्ज़ाम लगाया, तो ये काग़ज़ साबित करेंगे कि बच्चा मरीज़ था और इलाज से रोका गया।”

“भवानी एक इल्ज़ाम और लगाएगा। चोरी का।”

“तो चोरी का काग़ज़ भी रखना।” सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। “पर मन्नू, यह सब बिना ख़ून होगा। मुझे फ़ोन करना जैसे ही बच्चा बाहर आए।”

रात के बारह बजे मैं, बंसी और श्यामू भवानी के होम की पिछली गली में खड़े थे। होम की दीवारें काली दिख रही थीं और ऊपर एक-दो खिड़कियों में पीली रोशनी थी। पिछली दीवार के साथ लोहे की सीढ़ी सचमुच रखी थी — जंग लगी, टेढ़ी, पर खड़ी थी।

हमने सीढ़ी उठाई। बंसी ने नीचे पकड़ा, मैं ऊपर चढ़ा। रोशनदान की सलाखें ज़ंग खाई थीं। मैंने श्यामू की दी हुई पेचकस जेब से निकाली और दो पेच खोले। सलाख झुकी और अंदर जगह बनी।

मैं अंदर उतरा। पैर पहले मेज़ पर पड़े, फिर फ़र्श पर। कमरे में दो चारपाइयाँ थीं। एक पर बच्चा लेटा था — पतला, नीला, मशीन के साथ। और दूसरी पर कोई और बैठा था, जो मेरी आहट से उठ बैठा।

“कौन?” — सुमन के होम की कोई नर्स थी, जिसकी सफ़ेद टोपी फ़र्श पर गिरी थी। “तुम कौन हो?”

“मैं बच्चे को लेने आया हूँ।”

“भवानी साहब ने कहा है —”

“भवानी साहब कल सुबह जेल में होंगे।” मैंने अपना काग़ज़ उठाया। “अगर तू आज रात चुप रही, तो तेरा नाम किसी काग़ज़ में नहीं आएगा। अगर शोर किया, तो तेरा नाम पहले आएगा।”

वह औरत मेज़ के पीछे बैठी रही। बोली कुछ नहीं।

मैंने बच्चे की चारपाई पकड़ी। “बंसी! रोशनदान!”

बंसी ने सीढ़ी दीवार से टिकाई। मैंने बच्चे को कंबल में लपेटा और छत के सहारे रोशनदान तक उठाया। बंसी ने ऊपर से पकड़ा। बच्चा ज़रा सा कराहा, फिर चुप हो गया।

तभी गलियारे में पैरों की आवाज़ आई।

“बंसी, खींच!” मैंने कहा और पलटा। गलियारे के आख़िर में दो आदमियों की छाया दिखी।

मैं चारपाई के पीछे खड़ा था। पहला आदमी दरवाज़े पर आया — काला कुर्ता, हाथ में लाठी। उसने मुझे देखा, फिर खाली चारपाई देखी।

“बच्चा कहाँ है?”

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