The Token System – Chapter 659
मैं हँसा। हँसी में कुछ फँसा हुआ था।
रीना बाहर आई, हाथ में मिठाई की तश्तरी। “माँ,” उसने कहा, “ये वापस कर दें? या —”
“रख दे,” माँ ने कहा। “किसी दिन किसी काम आएगी।”
दोपहर में बंसी आया। उसने मिठाई का डिब्बा उठाया, ढक्कन खोला, एक लड्डू निकाला और खाने लगा। “अच्छी मिठाई है,” उसने कहा। “रिश्तेदार की तरफ़ से ही बदले की मिठाई।”
“बंसी।”
“सुन।” उसने लड्डू आधा छोड़ दिया। “जगन्नाथ लाल की बात में एक जगह दम है। भवानी ने आज तहसील में कोई अर्ज़ी डाली है। मैंने चपरासी से पूछा — अर्ज़ी का नंबर एक सौ बारह है। कब्ज़े की अर्ज़ी है। सुनवाई कल साढ़े दस बजे।”
“साढ़े दस? और मेरी बात ग्यारह बजे।”
“इसलिए तो कह रहा हूँ।” बंसी ने डिब्बा बंद किया। “हमें साढ़े नौ बजे पहुँचना होगा।”
मैं चूल्हे के पास गया। माँ वहाँ नहीं थी। रीना बैठी थी, आटा छान रही थी।
“रीना,” मैंने कहा। “मुझे सच बता। तुझे आकाश पसंद आया?”
उसने छननी नीचे रखी। “परखा नहीं।”
“क्यों नहीं?”
“क्योंकि आज तक तूने जो किया, वो सब भवानी के ख़िलाफ़ किया। और आकाश भवानी के रिश्ते में है। मुझे तेरे फ़ैसले का इंतज़ार है।”
“मेरा फ़ैसला?”
“तेरा। भवानी को हरानా या ना हराना।” उसने आटा मुट्ठी में भरा। “मैं तेरे साथ हूँ। आकाश के साथ नहीं। जब तू उसे साफ़ कर दे, तब मैं अपना फ़ैसला करूँगी।”
मैंने रीना के सामने घुटने के बल बैठकर उसका हाथ पकड़ा। “अगर आज रात भवानी ने तुझे उठा लिया —”
“तो?” उसने मेरी आँखों में देखा। “तू क्या करेगा?”
“दुकान जलाऊँगा। घर जलाऊँगा। पर छोड़ूँगा नहीं।”
वह हँसी। मेरे माथे पर आटे वाली उँगली लगाई। “बस यही जवाब चाहिए था।”
शाम को सुमन आई। उसके हाथ में एक पीली फाइल थी। “सोहन के काग़ज़ों में कुछ मिला,” उसने कहा। “उसकी कोठरी कहानी — वो सच है। मैंने अस्पताल के पुराने रजिस्टर निकाले। भवानी के होम की तरफ़ से दो और मरीज़ आए थे, जिनके नाम काटकर ‘लापता’ लिखा था। दोनों की उमर चालीस के आसपास। एक सोहन की तरह चार साल, दूसरा दो साल।”
“नाम?”
“एक का नाम रामदीन का पुराना मुंशी। दूसरे का —” उसने पन्ना पलटा — “किशनचंद।”
मैं खड़ा हो गया। “मेरे पापा का नाम?”
“पापा का नहीं। किशनचंद नाम के दो लोग हो सकते हैं।” उसने फाइल बंद की। “पर तारीख़ मिलती नहीं। यह वाला किशनचंद आठ साल पहले गायब हुआ। और तेरे पापा भी आठ साल पहले।”
मैं बैठ गया। “सुमन, ये क्या कह रही हो?”
“मैं कुछ नहीं कह रही।” उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ सरकाया। “मैं बस इतना कह रही हूँ — कल तेरे आँगन में जो खुलने वाला है, उससे कुछ और खुल सकता है। तैयार रह।”
रात आई। मैं आँगन में बैठा था। रीना ने चाय दी। माँ चारपाई पर बैठी थी, कोई कपड़ा सिल रही थी।
“कल तू जाएगी?” मैंने पूछा। माँ ने सुई नीचे रखी। “क्यों जाऊँ?”
“तेरे नाम की बात है।”
“तेरे नाम की भी है।” उसने चश्मा उतारा। “মैं वहीं रहूँगी जहाँ से तेरे पास फ़ोन आ सके। अगर समस्या हुई, तो बंसी को फ़ोन कर।”
“माँ —”
“सो जा।” उसने सुई उठाई। “कल तेरे पास बात है, मेरे पास सुई।”
रात के ग्यारह बजे गली में कोई गाड़ी रुकी। दरवाज़ा खुला। फिर गाड़ी चली गई। मैं उठकर गया। दरवाज़े के नीचे कोई चीज़ नहीं। मैं आँगन में आया — और देखा, तुलसी के पौधे के नीचे एक लिफ़ाफ़ा पड़ा है। खोला। स्याही नई थी। लिखा था — “अट्ठाईस हज़ार — सोहन के खेत की कीमत। दे दो, तो आँगन ज़िंदा है। नहीं तो, आँगन में जो खड़ा है, वो मुर्दा है।”
मैंने लिफ़ाफ़ा रीना को दिया। उसने पढ़ा, ऊपर देखा। “यह भवानी का काग़ज़ नहीं है।”
“कैसे पता?”
“भवानी को इतनी हिंदी नहीं आती।” उसने लिफ़ाफ़ा मुझे लौटाया। “इसको कोई लिखकर देने वाला है। कोई पढ़ा-लिखा।”
मैंने जगह देखी, सुबह की धूप में मुँह छिपाने की जगह। फिर मैंने टोकन जेब में छुआ — वह गरम था। गरम, पर हल्की। समय से पहले। अट्ठाईस हज़ार अभी मेरे खाते में नहीं आया था।
“रीना,” मैंने कहा। “तू कल आँगन में मेरे पीछे खड़ी रहेगी। जब सब खत्म हो जाए, तब तू वहाँ से हटेगी।”
“और अगर तू खुद न हटा?”
“तो तू मेरी जगह खड़ी होगी।”
वह हँसी। “यही तो दिक्कत है। बातें तेरी, और निभाना मेरा।” उसने लिफ़ाफ़ा जेब में रखा। “कल चाय जल्दी पीना। आँगन में देर नहीं होनी चाहिए।”
वह सोने चली गई। मैं आँगन में खड़ा रहा। तुलसी के पौधे के नीचे मिट्टी में जूते का निशान था — छोटा। किसी बच्चे का। या किसी औरत का।
माँ चारपाई पर करवट ले रही थी। मैं दरवाज़े की तरफ़ देखता रहा। गली खाली थी। पर जब हवा चलती थी, तो दूर किसी छत पर कोई परदा फड़फड़ाता था। और मुझे लगता था, जैसे कोई सुन रहा है — मैं कब सोता हूँ, कब उठता हूँ।
मैंने टोकन निकाला। वह गरम था। मैंने उसे मिट्टी पर रख दिया। एक पल। राख जैसी गरमी। फिर लौटाकर जेब में रखा।
कल साढ़े नौ बजे। तहसील का आँगन। भवानी का काग़ज़। मेरा काग़ज़। और वह आदमी जो राख को काग़ज़ बनाने का दावा कर रहा था।
मैंने आँगन में देखा। उस कोने में, जहाँ रीना ने पहली बार मुझे अपनी शादी के लिए रोते देखा था, अब मिठाई का डिब्बा खाली पड़ा था। माँ ने कहा था — रख दे, किसी दिन काम आएगी।
मैंने उसे उठाया। ढक्कन खोला। खाली। पर नीचे, डिब्बे के तल पर, एक पीली पर्ची चिपकी थी। छोटी, मुड़ी हुई। मैंने सावधानी से निकाला। स्याही काली थी। लिखा था — “अगर तू सच का काग़ज़ लेकर आया, तो आँगन में ग्यारह बजे के बाद कोई नहीं रुकेगा। पर अगर तू सिर्फ़ बातें लाया, तो रीना का रिश्ता किसी और को होगा। — जो तेरे सच को नहीं मानता।”
मैंने पर्ची जेब में रखी। बंद डिब्बा आँगन के कोने में रख दिया।
और मैंने तय किया — कल साढ़े नौ बजे के पहले, मुझे वह काग़ज़ चाहिए जो भवानी के हाथ में है। क्योंकि अगर भवानी ने मिठाई भेजी है, तो मिठाई के साथ एक और चीज़ भी भेजी होगी।
॥
रात के ग्यारह बज चुके थे। बंसी की दुकान का शटर आधा गिरा था, और उसके नीचे की रोशनी में मैं वो काग़ज़ पढ़ रहा था जो हरीश चंद्र ने भेजा था — अदालत में दीवार खोलने की अर्ज़ी। काग़ज़ पर मुहर अभी सूखी भी नहीं थी।
“तूने दस्तख़त किए?” बंसी ने पीछे से चाय का गिलास रखा।
“नहीं। सोच रहा हूँ।”
“सोच क्या रहा है, भाई? दीवार खुलेगी तो सच बाहर आएगा। तू यही तो चाहता था।”
“चार दिन पहले चाहता था। अब जब काग़ज़ आया है, तो डर लग रहा है।”
बंसी ने मेरे सामने कुर्सी खींची और बैठ गया। उसकी चाय उतनी ही गरम थी जितनी उसकी बातें।
“तेरे पापा ने इसी दीवार को बचाने के लिए… अब बोल नहीं रहा, क्योंकि तेरे पास काग़ज़ है। अब तू उसी दीवार को बंद रखना चाहता है?”
“मैं दीवार नहीं, बहन को बचाना चाहता हूँ।”
“दोनों एक ही चीज़ हैं, मन्नू। जो आदमी तेरी बहन की शादी को हथियार बनाता है, वो कल किसी और की बहन को भी बनाएगा। तू डर गया, तो यही रास्ता रह जाएगा।”
मैंने काग़ज़ उठाया। नीचे हरीश चंद्र की लिखाई में एक लाइन थी — “साढ़े नौ से पहले। देर होने पर सुनवाई टलेगी।”
“तू सीधा भवानी की धमकी पर चल रहा है,” बंसी ने कहा। “शादी टूटेगी तो?”
“शादी नहीं टूटेगी।” मैंने गिलास उठाया। “पर अगर मैं डर गया, तो भवानी हर घर की शादी ऐसे ही बंधक बनाता रहेगा। रीना की शादी अगर उसके हाथ में है, तो फिर ये शहर उसका है।”
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