The Token System656 / 1154

The Token System – Chapter 656

7 min read November 6, 2026

मैंने सोहन का कंधा पकड़ा। “तू अब सुरक्षित है।”

सोहन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था। उसने पर्ची सीने से लगाई। “मेरा नाम,” वह फुसफुसाया। “मेरा नाम है सोहन। मोहन का बेटा।”

“हाँ,” मैंने कहा। “और जब तक यह पर्ची तेरे पास है, कोई इसे छीन नहीं सकता।”

भवानी ने हम सबको देखा। उसकी आँखें सिकुड़ीं। फिर उसने एक गहरी साँस ली और अपने आदमी से कहा — “गाड़ी निकाल।”

गाड़ी पीछे हटी। भवानी गाड़ी में बैठा। खिड़की से उसने हमें देखा — मुझे, सोहन को, अमर को। अमर ने उसकी तरफ़ देखा ही नहीं। भवानी की उँगलियाँ काँप रही थीं। गाड़ी चली गई।

मैंने लंबी साँस ली। बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।

“तिजोरी में और भी था,” बंसी ने धीरे से कहा

॥

बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहा — तिजोरी में और भी था। मैं पलटा ही था कि होम के गेट पर भवानी की सफ़ेद गाड़ी फिर रुकी। उसने काँच उतारा और अपने आदमी को इशारा किया। दो आदमी दौड़कर सोहन की तरफ़ बढ़े।

“सोहन यहीं रहेगा,” भवानी ने कहा। “मेरे होम का मरीज़ है। काग़ज़ मेरे पास, इलाज मेरे पास।”

इंस्पेक्टर ने मोटी लाठी ज़मीन पर टिकाई और कुछ कहने ही वाला था कि पीछे से एक गाड़ी आई। छोटी गाड़ी, तेज़। उसमें से सुमन उतरी। उसके हाथ में एक मुड़ा हुआ काग़ज़ था और चेहरे पर वो भाव था जो ड्यूटी में होता है — मज़ाक बिलकुल नहीं।

“इंस्पेक्टर साहब,” सुमन ने कहा। “मैंने थाने फ़ोन कर दिया है। दूसरी बात — सोहन को सरकारी अस्पताल में भर्ती करने का आदेश मेरे पास है।” उसने काग़ज़ इंस्पेक्टर की तरफ़ बढ़ाया। “यह चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर की मुहर लगी कॉपी है। मरीज़ का नाम रजिस्टर में दर्ज है — सोहन, मोहन का बेटा। वार्ड तीन।”

भवानी का चेहरा कड़ा हुआ। “यह मेरा मरीज़ है,” उसने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर हर शब्द ईंट की तरह रखा हुआ।

“तेरा मरीज़ था,” सुमन ने कहा। “जिसका नाम तेरे काग़ज़ में नहीं, वो तेरा मरीज़ नहीं हो सकता। मेडिकल का नियम है — नाम बिना, भर्ती बिना।”

इंस्पेक्टर ने सुमन का काग़ज़ पढ़ा, फिर भवानी की तरफ़ देखा। “अस्पताल ले जाओ इसे। डॉक्टर साहब, तुम ही ले जाओ। मेरा आदमी साथ आएगा।”

भवानी ने अपने आदमियों को हाथ से रोका। वह सोहन की तरफ़ बढ़ा, बस एक क़दम। “सोहन, तू ठीक नहीं है। तेरा इलाज मेरे यहाँ चल रहा था। सोच ले।”

सोहन ने सुमन का हाथ पकड़ लिया। “मुझे सरकारी अस्पताल जाना है।”

भवानी रुका। उसने अपना कोट ठीक किया, जेब से रूमाल निकालकर माथा पोंछा। फिर वह हमारे पास से गुज़रा। मेरे कान के पास रुका। इतना धीरे बोला कि बस मैं सुनूँ।

“तेरी बहन की शादी की तारीख़ तय हो गई — अगले महीने।” वह मुस्कुराया। “देखते हैं तू उस तक पहुँचता है या नहीं।”

मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। बंसी ने मेरी बाँह पकड़ ली।

भवानी गाड़ी में बैठा। गाड़ी पीछे हटी और धूल उड़ाती चली गई। इंस्पेक्टर ने अपने सिपाही को बुलाया।

“तुम दोनों,” उसने हमारी तरफ़ देखा, “कल सुबह नौ बजे थाने आना। बयान दर्ज होंगे।” फिर सुमन से — “डॉक्टर साहब, मरीज़ तुम्हारे ज़िम्मे। मैं अभी पीछे आता हूँ।”

सोहन को गाड़ी में बिठाया गया। वह इतना कमज़ोर था कि उसके पैर सीढ़ी पर ही लड़खड़ा गए। मैंने और बंसी ने उसे सहारा दिया। सुमन ने उसकी नाड़ी देखी और मुँह बनाया।

“पानी की कमी,” उसने कहा। “और यह शरीर चार साल से खड़ा नहीं हुआ। मज़े की बात यह है कि इसकी हड्डियाँ बची हुई हैं। इसे यहाँ रोज़ खाना मिलता था।”

“कैद में भी खाना?” बंसी ने कहा।

“कैद में भी हिसाब,” सुमन ने कहा। “जिसे ज़िंदा चाहिए, उसे खिलाना पड़ता है।”

अस्पताल पहुँचकर सोहन को वार्ड तीन में भर्ती किया गया। सुमन ने नर्स को ड्रिप लगाने को कहा और खुद रजिस्टर भरने बैठी। मैं दरवाज़े के पास खड़ा था। सोहन की आँखें बंद थीं। ड्रिप शुरू हुई तो उसके होंठ हिले।

“रजिस्टर…”

मैं पास गया। “क्या?”

सोहन ने आँखें खोलने की कोशिश की। आधी खुलीं। “दीवार… मैंने देखा था।” उसकी आवाज़ कर्कश थी, गले से आती हुई। “होम की दीवार। पीछे वाली कोठरी। ईंट… ईंट के पीछे से आवाज़ आती थी।”

“कैसी आवाज़?” मैंने पूछा।

“रोने की।” उसने आँखें बंद कर लीं। “मैंने भवानी को कहा था। उसने कहा — तू अपना काम कर।”

सुमन ने मेरा कंधा छुआ। “अभी नहीं। इसको होश आने में वक़्त लगेगा। चार साल का बुख़ार एक घंटे में नहीं उतरता।”

मैं वार्ड के बाहर आया। बंसी बेंच पर बैठा था, हाथ में भवानी की गाड़ी से उठाया काग़ज़ घुमा रहा था। वह मेरी तरफ़ देखकर बोला।

“तिजोरी की दूसरी रजिस्टर मैंने खोलकर देखी। उसमें पन्ने सात के बाद सब खाली।” उसने काग़ज़ जेब में रखा। “पर फाइल में एक पर्ची थी — किसी की लिखाई में — ‘जो ईंट के पीछे है, वो किसी का नहीं।’”

“मतलब?”

“मतलब, भवानी को भी पता है कि उसकी दीवार के पीछे कुछ है। और वो उसे खुद नहीं छू सकता।”

मैं घर लौटा तो शाम हो रही थी। आँगन में चाय की भाप उठ रही थी। रीना चूल्हे के पास बैठी थी, पीठ मेरी तरफ़ थी। माँ चारपाई पर बैठी थी और उसका चेहरा मेरी तरफ़ उठा।

“आ गया,” माँ ने कहा।

रीना मुड़ी। उसके हाथ में चाय की केतली थी। उसने मुझे सिर से पाँव तक देखा। मेरा कोट फटा था, घुटने पर धूल थी, हाथ पर खरोंच।

“नहा ले,” रीना ने कहा। “फिर बात करेंगे।”

“पहले एक बात,” मैंने कहा। “भवानी ने धमकी दी है। शादी की तारीख़ अगले महीने है — तेरे लिए। उसने कहा, देखते हैं तू उस तक पहुँचता है या नहीं।”

रीना ने केतली चूल्हे पर रखी। चाय का कप उठाया, मेरी तरफ़ बढ़ाया। “पी।”

“रीना —”

“पी,” उसने कहा। “धमकी सुबह आई थी। मैंने सुना।”

मैं रुक गया। “किसने बताया?”

“रामावत जी का फ़ोन आया था,” रीना ने कहा। “उन्होंने कहा — बेटा, हम तो आज शाम आ रहे हैं। पर एक बात है।” उसने चाय का कप मेरी तरफ़ और बढ़ाया। “मैंने कहा — बात रखिए। उन्होंने कहा, लड़के की नौकरी और लड़की — दोनों एक ही शहर में हैं, ठीक है ना? मैंने कहा — ठीक है। फिर उन्होंने कहा, बस एक तकलीफ़ है। किसी ने उन्हें काग़ज़ दिखाया है कि हमारे परिवार पर ज़मीन का दावा है।”

“भवानी का काम,” मैंने कहा।

“मैंने उनसे कहा,” रीना ने कप मेरे हाथ में पकड़ाया, “कि आज शाम आइए, दावे वाला काग़ज़ भी लेकर आइए। और मैंने यह भी कहा — अगर हमारे परिवार में कोई काग़ज़ की गड़बड़ कर रहा है, तो उसका सामना मेरा भाई करेगा।”

माँ ने चारपाई से कहा, “मैंने कहा था — रीना को कुछ मत बताओ। वो अपने दम पर जवाब दे देती है।”

मैंने चाय पी। गला जल गया, पर अच्छा लगा। “आज शाम,” मैंने कहा। “ठीक है।”

“पहले नहा,” रीना ने कहा। “और जूते बदल। आज लड़के वाले आ रहे हैं, कोई लड़ाई नहीं। बातचीत होगी।”

मैं कमरे में गया। पानी डाला। कपड़े बदले। जब जूते पहन रहा था तो जेब में हाथ गया। टोकन जेब में था, पर वह ठंडा नहीं था। गरम था। तेज़ गरम, जैसे चाय के गिलास पर हाथ रख दिया हो।

और फिर कान में आवाज़ आई। एक शब्द नहीं। एक अंक। साफ़, ठंडी आवाज़ में।

“अट्ठाईस हज़ार।”

मेरे हाथ से जूता गिर गया।

मैं चारपाई पर बैठ गया। टोकन निकाला। उस पर कोई लकीर नहीं थी, कोई शब्द नहीं। बस पीतल। पर मेरी उँगली जल रही थी। मैंने उसे वापस जेब में डाला और आँगन में आया।

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