The Token System – Chapter 59
"अब बातें नहीं," मैंने कहा। "बंसी, स्ट्रेचर।"
बंसी ने बगल के कमरे से स्ट्रेचर खींचा। हमने औरत को उठाया। वो बेहोश थी, साँस चल रही थी — बस।
"सुनीता, तू पीछे-पीछे आ," मैंने कहा। "और ये काग़ज़ अपनी जेब में रख ले।"
शेखर गेट पर गार्ड से बातें कर रहे थे। हमने पीछे के दरवाज़े से स्ट्रेचर बाहर निकाला। रात की ठंडी हवा में औरत काँपी। बंसी ने अपनी जैकेट उस पर डाल दी।
हम गली के मोड़ तक पहुँचे ही थे कि सामने तेज़ रोशनी आई — एक गाड़ी आकर रुकी। दरवाज़ा खुला और भवानी उतरा। उसके पीछे दो आदमी।
सुनीता पीछे हट गई। बंसी ने स्ट्रेचर के हैंडल कसकर पकड़े।
भवानी ने औरत को देखा, फिर मुझे। उसके चेहरे पर ग़ुस्सा नहीं था — कुछ और था, जिसका नाम मैं नहीं जानता था।
"मरीज़ ले जा," उसने कहा। "मैं नहीं रोकूँगा। अस्पताल तक रास्ता साफ़ है।"
मैंने कुछ नहीं कहा। वो एक कदम आगे आया।
"पर पहले मेरा एक सवाल का जवाब दे — तू मेरे बेटे को अपने घर में क्यों रखे है?"
"विक्रम ख़ुद आया था," मैंने कहा।
"वो चौदह साल मेरा बेटा रहा।" भवानी ने हाथ जेब में डाला। "मैंने उसे स्कूल भेजा, साइकिल दी, नाम कराया। और तू — तू तीन दिन में उसे अपना बना लिया।"
"तूने उसे टुकड़ा दिया था," मैंने कहा। "आधा टोकन। ताकि हिसाब उस पर बैठे। ये तेरी बापगिरी है?"
भवानी की आँखें सिकुड़ीं। "उसने तुझे ये भी बता दिया?"
"उसकी माँ ने बताया।" मैंने स्ट्रेचर के आगे आकर खड़ा हो गया। "भवानी, तेरे बेटे का हिसाब तेरे से भारी है, और वो तुझे छोड़कर नहीं, तुझसे लड़कर साफ़ होगा।"
भवानी ने दो सेकंड मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपने आदमियों को इशारा किया — पीछे हट जाओ।
"मरीज़ जाने दे," उसने कहा। "मैं मरीज़ के पीछे नहीं पड़ता।"
गाड़ी का रास्ता साफ़ हुआ। हमने स्ट्रेचर अंदर रखा। सुनीता पीछे बैठी। भवानी खिड़की के पास आया।
"मनोहर, कल सुबह दस बजे हवेली में तलाशी है। मैं वहाँ होऊँगा।" उसने खिड़की पर हाथ रखा। "तू भी आ। और वो कमरा खोलना जिसका दरवाज़ा किसी दीवार में नहीं है।" वो मुस्कुराया — पहली बार ऐसा मुस्कुराया जो ग़ुस्से जैसा था। "देखते हैं, उस कमरे में किसका नाम निकलता है।"
गाड़ी चली। बंसी ने पीछे मुड़कर देखा। "ये क्या था?"
"पहली बार," मैंने कहा, "उसने मुझसे कुछ माँगा है।" मैंने औरत की नाड़ी देखी। "चल, सुमन को जल्दी पहुँचना है।"
अस्पताल पहुँचे तो सुमन इमरजेंसी के दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने स्ट्रेचर देखते ही टीम को इशारा किया।
"देर नहीं हुई," उसने कहा। "पर एक बात सुन।" उसने मेरा हाथ पकड़कर अलग लिया। "शेखर ने फ़ोन पर बताया — भवानी ने होम का रजिस्टर रात में बदलने की कोशिश की। मेनेजर डर गया और उसने असली रजिस्टर की एक कॉपी अपने पास रख ली है।"
"तो वो कॉपी लेनी होगी।"
"वो कॉपी हमें नहीं मिलेगी," सुमन ने कहा। "पर एक और बात — भवानी का होम कल सुबह हवेली की तलाशी के वक़्त खाली रहेगा। सारे आदमी वहाँ होंगे। मेनेजर उसी वक़्त डरकर भागेगा।"
"तो?"
"तो उससे पहले मुझे उस काग़ज़ की एक फ़ोटो चाहिए जो उसने छुपाया है। और वो फ़ोटो मुझे तभी मिलेगी जब मैं ख़ुद होम में जाऊँ।" सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "कल सुबह मैं तेरे साथ चलूँगी। हवेली में।"
"सुमन—"
"मैं डॉक्टर हूँ, मनोहर। मेरा काम मरीज़ बचाना है, और इस शहर में सबसे ज़्यादा मरीज़ उसी होम में मर रहे हैं।" उसने स्टेथोस्कोप जेब में रखा। "कल दस बजे मैं हवेली के गेट पर मिलूँगी।"
वो अंदर चली गई। बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"सुन, एक बात," बंसी ने कहा। "आज रात तेरे घर पर रीना ने काग़ज़ राजेंद्र को दिए, और वो भी तेरे बिना।"
"पता है।"
"और भवानी ने जो कहा — 'देखते हैं किसका नाम निकलता है' — वो ख़ाली धमकी नहीं है। उसे भी पता है कि उस बंद कमरे में क्या है।"
"तो कल सुबह हवेली में दोनों होंगे," मैंने कहा।
"दोनों नहीं," बंसी ने कहा। "तीन।" उसने जेब से एक पुरानी चीज़ निकाली — एक चमकीली पर्ची, जिस पर मेरी ही लिखाई थी — "काग़ज़ लौटाने की शर्त मंज़ूर नहीं।" फिर उसने नीचे छोटे अक्षरों में पढ़ा — "अंकित।"
"ये क्या है?"
"लालाजी ने आधी रात को लड़के के हाथ से भिजवाया।" बंसी ने पर्ची मेरी हथेली पर रखी। "कह रहे हैं — भवानी से नहीं, तुझसे लड़ेंगे। पर कल हवेली में वो भी होंगे।"
मैंने पर्ची मोड़कर जेब में रखी। ठीक टोकन के ऊपर।
और टोकन — जो तीन दिन से चुप था — अचानक हल्का गरम हुआ, बस एक पल के लिए, जैसे किसी ने दूर से आवाज़ दी हो और फिर चुप कर दी हो।
मैंने जेब से बाहर हाथ निकाला। बंसी को कुछ नहीं बताया। घर की तरफ़ चले। गली में रोशनी कम थी और सामने, दूर, रामगंज की छतों के पीछे से हवेली की आधी गिरी मीनार दिख रही थी, जैसे कोई उँगली उठाकर बुला रहा हो।
॥
“देखते हैं, उस कमरे में किसका नाम निकलता है।”
भवानी की गाड़ी अभी मुड़ी भी नहीं थी कि मैंने स्ट्रेचर के पास खड़े बंसी की तरफ़ देखा। उसका मुँह खुला था, जैसे कोई सवाल पूछना चाहता हो और शब्द ही न मिल रहे हों।
“अंदर चल,” मैंने कहा। “सुमन को औरत दिखानी है।”
“पहले ये बता,” बंसी ने मेरा रास्ता रोका। “उसने तुझसे कमरा खोलने को कहा। भवानी ने। ख़ुद। तू समझ रहा है इसका मतलब?”
“मतलब साफ़ है। वो चाहता है कि कमरा तलाशी से पहले खुले — और उसमें जो निकले, वो उसके हाथ में हो।”
“और हम?”
“हम पहले पहुँचेंगे।”
अंदर सुमन ने औरत को स्ट्रेचर से उठाकर बेड पर लिटाया। नर्सें चारों तरफ़ दौड़ रही थीं। सुमन ने काग़ज़ लिए बिना, सिर्फ़ हाथ से काम किया — नाड़ी, आँख, साँस। फिर पीछे मुड़ी।
“देर नहीं हुई, पर बाल-बाल बची।” उसने दस्ताने उतारे। “अब सुन। भवानी ने गाड़ी रोककर तुझे जो कहा — वो सिर्फ़ धमकी नहीं थी, वो सूचना थी।”
“कैसी सूचना?”
“वो जानता है कि उस बंद कमरे में उसके नाम का काग़ज़ है। इसीलिए वो तलाशी में ख़ुद मौजूद रहना चाहता है। अगर वहाँ ख़ुद होगा, तो पहला हाथ उसका होगा।” सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। “कल सुबह दस बजे से पहले हमें उस कमरे में होना है।”
“तू हवेली चलेगी?”
“मैंने कहा था ना।” उसने स्टेथोस्कोप जेब में डाला। “अब निकलो, मुझे मरीज़ देखनी है।”
हम बाहर निकले। सुबह की रोशनी अस्पताल के पीले गलियारे में आ रही थी। बंसी ने मेरी बाँह पकड़ी।
“देख, वो अभी गया नहीं।”
गेट के बाहर भवानी की सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। वो खिड़की के पास बैठा था, आँखें सामने, मानो किसी का इंतज़ार कर रहा हो।
“मैं जाता हूँ,” मैंने कहा।
“मन्नू—”
“वो इंतज़ार कर रहा है। और अगर मैं नहीं गया, तो वो फिर किसी और के ज़रिए बुलाएगा।”
मैंने गेट पार किया। भवानी ने खिड़की नीचे की। उसके चेहरे पर वही शांति थी जो गुस्से से ज़्यादा डरावनी लगती थी।
“तूने अंदर भेज दिया,” उसने कहा।
“मरीज़ का इलाज ज़रूरी था।”
“मरीज़ मेरा आदमी है, मनोहर। उसके काग़ज़ मेरे पास हैं। उसे मैंने भेजा था। और तूने उसे छीन लिया।”
“भवानी सिंह, वो औरत मरी थी। इलाज के बिना। तेरे काग़ज़ उसकी साँस नहीं लौटा सकते।”
भवानी ने खिड़की का शीशा और नीचे किया। उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
“सुन। कल सुबह हवेली में जो कमरा खुलेगा, उसका काग़ज़ मैंने रात में अपने वकील को दे दिया है। नकल करवा ली है। असली काग़ज़ अब बेकार हैं।”
“अच्छा?”
“सोच ले। तू कल जो भी निकालेगा, उसका कोई मतलब नहीं होगा। मेरे वकील के पास पहले से सब कुछ होगा।”
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