The Token System58 / 1154

The Token System – Chapter 58

7 min read November 6, 2026

"माँ, क्या है वो कमरे में?"

माँ ने घड़ी मेरी हथेली पर रख दी। "जो पापा डरकर छुपा गए थे। और जो भवानी डरकर बेचना चाहता है।"

दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई। इस बार कोई और था — एक औरत, पचास के आसपास, सिर पर दुपट्टा। हाथ में सफ़ेद लिफ़ाफ़ा।

"मैं बसवा से आई हूँ," उसने कहा। "सुनीता की बहन हूँ।"

॥

दरवाज़े पर खड़ी औरत ने लिफ़ाफ़ा दोनों हाथों से आगे किया। रीना ने बीच में हाथ रखकर लिफ़ाफ़ा रोक लिया।

"पहले अंदर आओ, बैठो," रीना ने कहा। "लिफ़ाफ़ा बाद में।"

"बात ज़रूरी है," औरत ने कहा। "सुनीता मेरी बहन थी। रात को मरी, नर्सिंग होम के रजिस्टर में नाम लिखा था। मुझे लोगों ने बताया कि तुमने रजिस्टर छीनकर राजेंद्र को दिया।"

"मैंने छीना नहीं," मैंने कहा। "मेनेजर ने ख़ुद दिया।"

"मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता किसने दिया।" उसने लिफ़ाफ़ा फिर बढ़ाया। "इसमें मेरी बहन के काग़ज़ हैं — जो उसने मुझे डाक से भेजे थे। उसमें लिखा है कि भवानी के नर्सिंग होम में क्या होता है।"

माँ ने पीछे से कहा, "अंदर आ जाओ, बहन। दरवाज़े पर खड़े-खड़े पूरी गली सुन रही है।"

औरत अंदर आई। उसका नाम कमलेश था। उसने लिफ़ाफ़ा खोला — अंदर चार पुरानी पर्चियाँ और एक फटा रजिस्टर की नक़ल थी। रीना ने पर्चियाँ पढ़नी शुरू कीं, और उसका चेहरा बदलने लगा।

"यहाँ लिखा है," रीना ने कहा, "कि भवानी के होम में मरीज़ों को दवा देने के बदले उनके परिवार से ज़मीन के काग़ज़ लिए जाते हैं।"

"सिर्फ़ काग़ज़ नहीं," कमलेश ने कहा। "जो नहीं देता, उसका मरीज़ तीन दिन में 'बाहर भेज दिया जाता है।' रजिस्टर में इसी तरह लिखा रहता है।"

तभी दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई। बंसी खुद आया था, साँस फूली हुई।

"लालाजी का आदमी फिर आया था," बंसी ने कहा। "कह रहा है — लालाजी ने साफ़ लफ़्ज़ों में कह दिया है, अगर मन्नू काग़ज़ नहीं लौटाता तो रिश्ता वापस।"

रीना ने पर्चियाँ मेज़ पर रख दीं और खड़ी हो गई।

"तो वापस हो जाए," उसने कहा।

कमरे में सन्नाटा छा गया — पर वो सन्नाटा नहीं, सिर्फ़ रुकना था। मैंने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, वो पहले बोल पड़ी।

"मन्नू, तू कल भी भवानी के सामने झुका था, आज भी झुक रहा है। पहले धमकी दी, फिर रिश्ता, फिर पर्ची, अब लालाजी। अगर मेरी शादी के लिए तू एक काग़ज़ लौटाएगा, तो कल को वो कहेगा — बहन को बचाने के लिए अपनी गवाही वापस ले। फिर कहेगा — इस शहर से निकल जा।"

"रीना—"

"मैं उस घर में नहीं जाऊँगी जहाँ मेरे भाई को झुकना पड़े।" उसने मेज़ पर हाथ रखा। "मुझे शादी की जल्दी नहीं है। जल्दी तो तुझे है — ये मेरी शादी नहीं, तेरा अपना हिसाब है।"

कमलेश ने धीरे से कहा, "बहन, इतनी जल्दी में फ़ैसला मत करो।"

"फ़ैसला जल्दी में नहीं," रीना ने कहा। "तीन दिन से बड़ी हो रही हूँ।"

माँ चूल्हे के पास से उठीं, आईं, और सीधे मेरी तरफ़ देखा।

"मन्नू, अब लड़की की बात सुनी जाएगी।" उन्होंने कपड़े से हाथ पोंछे। "मैंने भी एक बार किसी के कहे से अपना हिसाब छुपाया था, और देख क्या हुआ।"

"माँ, तू उसकी तरफ़ है?"

"मैं सच की तरफ़ हूँ, और आजकल सच रीना के मुँह से बोल रहा है।" वो बैठ गईं। "काग़ज़ वापस नहीं होगा। शादी टूटे तो टूटे।"

रीना ने माँ की तरफ़ देखा और उसकी आँखों में पानी आ गया, पर उसने आँचल से पोंछ दिया। फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ी।

"मन्नू, मैं तुझसे एक झूठ बोल रही थी। तीन हफ़्ते से। जो रिश्ता आया है, वो लालाजी का ख़ुद का लड़का अंकित नहीं है। लालाजी का भतीजा है, जो उनकी ज़मीन का काम देखता है। अंकित के बारे में लोगों ने जोड़ दिया था।"

"तो तूने अंकित का नाम क्यों—"

"क्योंकि वो रिश्ता भी अच्छा नहीं था। उस भतीजे की माँ भवानी की चचेरी बहन है।" रीना ने सीधा मुझे देखा। "मुझे भवानी के परिवार में जाना ही नहीं था। मैंने तेरे डर से नहीं बताया कि मैंने ख़ुद पहले ही मना कर दिया था।"

मैं कुर्सी पर बैठ गया। "इतने दिन—"

"इतने दिन तू भवानी से लड़ रहा था, और मैं तेरे पीछे तेरा बोझ बन रही थी।" उसने कमलेश की तरफ़ देखा। "दिखाओ मरीज़ों के काग़ज़।"

कमलेश ने पर्चियाँ फैला दीं। रीना ने उँगली रखकर पढ़ा — "सुनीता, बसवा, बुख़ार, तीन दिन बाद बाहर भेजा।" उसने सिर उठाया।

"मन्नू, आज रात ये काग़ज़ राजेंद्र को देना है। पूरे।"

"इसका वक़्त आएगा," मैंने कहा।

"वक़्त कल सुबह हवेली की तलाशी पर आएगा," रीना ने कहा। "तब तक ये काग़ज़ भवानी के दफ़्तर से गायब हो जाएँगे — जैसे रजिस्टर को गायब करने की कोशिश की थी। मैं ख़ुद राजेंद्र के पास जाऊँगी और पूरी बात बताऊँगी।"

मैं उठा। "तू—"

"मैं स्कूल की मैडम हूँ, मन्नू। पढ़ी-लिखी हूँ। मुझे थाने में बोलने का डर नहीं। डर तुझे है कि कहीं मैं तेरे काम में आ न जाऊँ।"

माँ उठकर रीना के पास गईं और उसका सिर सहलाया। "अब ये घर भी तेरे जैसा सोचेगा।"

उसी वक़्त मेरा फ़ोन बजा। स्क्रीन पर नाम चमका — डॉक्टर सुमन। रात के नौ बज चुके थे।

"मनोहर, मेरे पास एक औरत आई है — जो नर्सिंग होम से अभी-अभी भागकर आई। उसकी बहन की हालत भवानी के होम में बिगड़ रही है। मुझे उसे सरकारी अस्पताल लाना है, पर भवानी के आदमी गेट पर खड़े हैं, किसी को निकलने नहीं दे रहे।"

"कौन है वो औरत?"

"नाम बता रही है — सुनीता।"

मेरे हाथ से फ़ोन फिसलने लगा। "सुनीता?"

"हाँ, बसवा की।" सुमन ने कहा। "वो मरे हुए लोगों की सूची में थी। ज़िंदा है, पर उसकी बहन को वहाँ रखा है और वो अब नहीं उठ रही। मुझे अंदर जाना है। क्या तू आ सकता है?"

"दस मिनट," मैंने कहा।

कमलेश ने फ़ोन की आवाज़ सुनी और खड़ी हो गई। "सुनीता? मेरी बहन सुनीता? ज़िंदा?"

"सुमन के पास है," मैंने कहा। "कमलेश, तू यहीं रुक। रीना तुझे राजेंद्र के पास ले जाएगी।"

"नहीं, मैं भी चलूँगी—"

"अगर तू वहाँ दिखी, तो भवानी के आदमी तुझे भी पकड़ लेंगे।" मैंने जूते पहने। "रीना, काग़ज़ लेकर थाने। राजेंद्र से कहना सुबह की तलाशी से पहले मरीज़ों की सूची भी सील करे।"

बंसी मेरे साथ निकला। गली के मोड़ पर उसने कहा, "सुनीता तो मरी हुई थी, भाई।"

"नहीं मरी।" मैंने ऑटो रोका। "होम में मरी लिखी गई थी। यही तो भवानी का सबसे बड़ा हिसाब है — ज़िंदा लोगों को काग़ज़ों में मार देना।"

नर्सिंग होम पहुँचे तो गेट पर सिर्फ़ एक गार्ड बैठा था। हम पीछे की तरफ़ से घुसे। पिछले दरवाज़े के बाहर अंधेरा था, पर एक सफ़ेद कोट वाला आदमी खड़ा था — शेखर बाबू।

"शेखर बाबू?" मैंने कहा।

"चुप," उसने कहा, और पीछे मुड़कर देखा। "मैंने सुमन को फ़ोन किया था। मैं अब इस होम के हिसाब में नहीं हूँ।" उसने मेरी कलाई पकड़ी। "अंदर तीन मरीज़ हैं। सुनीता की बहन की हालत सबसे बुरी। उसे पीछे के दरवाज़े से निकालो, वरना सुबह तक देर हो जाएगी।"

बंसी ने कहा, "कमरा कौन सा?"

"तीसरी मंज़िल का बंद कमरा।" शेखर ने चाबी थमाई। "मैं गेट पर गार्ड को बातों में उलझाए रखता हूँ। पंद्रह मिनट से ज़्यादा नहीं।"

हम सीढ़ियाँ चढ़े। तीसरी मंज़िल का दरवाज़ा खोला। अंदर एक खाट पर औरत लेटी थी, चेहरा पीला, आँखें बंद। पास में एक कुर्सी पर सुनीता बैठी थी — दुबली, फटी साड़ी, हाथ जोड़े हुए।

"तुम मनोहर हो?" उसने मेरी तरफ़ देखा। "मेरी बहन बसवा में नहीं है, यहाँ है। मैंने सोचा था ये मर गई। रजिस्टर में मेरा नाम मरा लिखा था।"

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