The Token System – Chapter 45
रीना दरवाज़े पर खड़ी थी। “मन्नू, वो काग़ज़… भवानी ने कहा था, तेरे बाप का नाम है। अस्पताल में मुझे तेरी आवाज़ सुनकर सब समझ आया। पर बाप का नाम?”
“रीना, पहले टोकन।”
मैंने जेब से टोकन निकाला। वो अब ठंडा था। उस पर नई लकीर उभर रही थी, धीरे-धीरे, पुरानी मिट रही थी।
“तीन में से एक काम पूरा।”
मैंने उसे करीब से देखा। “एक?” मैंने रीना की तरफ़ देखा। “तीन काम थे? मुझे तो दो पता थे — सुनीता का नाम, छोटू की सुरक्षा।”
“तीसरा क्या होगा,” रीना ने कहा।
“पता नहीं। पहले ये बता — जो काग़ज़ राजेंद्र के पास है, उसमें बाप का नाम कहाँ लिखा है? मैंने सब देखा, एक-एक काग़ज़।”
रीना न आई, दीवार से टिक गई। “तूने काकी के काग़ज़ देखे? जो हवेली की दीवार से निकले थे?”
“नहीं। वो मेरी पोटली में हैं। वो राजेंद्र के थैले में नहीं गए।”
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। “तूने उन्हें कभी पूरा खोलकर देखा ही नहीं?”
“मैंने एक बार कोना पलटकर देखा था — लालाजी के हिस्से का सबूत। बाकी अभी नहीं।”
रीना ने सीने से पोटली उतारकर मेज़ पर रखी। “तो खोल। अभी। देख — कहीं तेरे बाप का नाम लिखा है उनमें।”
मैंने पोटली खोली। काग़ज़ अब भी वैसे ही थे — पीले, मुड़े, कोर पर लिखाई जैसे वक़्त के साथ उभरी हो। मैंने एक-एक करके पलटना शुरू किया।
पहला — हवेली के एक हिस्से का गिरवी का काग़ज़। लालाजी के पिता का हक़। देख चुका था।
दूसरा — ज़मीन का एक पुराना काग़ज़, जिस पर तीन अंगूठे थे। काकी के हिसाब का।
तीसरा — एक हल्का सा काग़ज़, जो पहली नज़र में इस्तेमाल का नहीं लगा। उसके ऊपर कोने पर एक लकीर में लिखा था — “हिसाब का हिस्सा: माली।” नीचे कोई नाम नहीं, बस एक मुहर।
फिर, सबसे अंदर, एक और काग़ज़ जो पहले नहीं दिखा था, क्योंकि वो मुड़कर तीन परतों में बंद था। मैंने उसे खोला।
उस पर एक ही लाइन थी, किसी पुरानी स्याही में, काँपते हाथ की लिखाई में —
“कन्हैया माली की गवाही दर्ज हो।”
मेरे हाथ रुक गए।
रीना ने काग़ज़ देखा, फिर मेरी तरफ़। “कन्हैया — ये तो…”
“पापा का नाम था,” मैंने कहा।
बाहर माँ की चप्पल की आवाज़ आई। वो दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ में दूध का गिलास। उनकी आँखें उसी काग़ज़ पर टिकी थीं।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
माँ अंदर आईं, गिलास मेज़ पर रखा, और मेरी तरफ़ बढ़ीं। उन्होंने काग़ज़ मेरे हाथ से लिया, उसे करीब से देखा — जैसे उम्र के किसी कोने से उभरती याद को पहचान रही हों।
“ये वो काग़ज़ है,” उन्होंने कहा। आवाज़ सपाट।
“कौन सा?”
“जो तेरे पापा ने हवेली के माली की हैसियत से लिखा था। उसने सुना था — एक रात, हवेली के तहखाने में हरि सिंह ने सेठ गोवर्धनदास के काग़ज़ छिपाए। वो गवाह बन गया। अगले ही महीने उसका काम छूट गया। फिर बीमार पड़ा। फिर…”
वो रुक गईं। गिलास उठाया, पानी पिया।
“तो पापा ने हवेली के काग़ज़ में गवाही दर्ज कराई थी?” रीना ने कहा।
“काग़ज़ में नहीं, किसी के मन में,” माँ ने कहा। “पर उस रात हवेली में जो हुआ, उसका एक हिस्सा काग़ज़ पर उतर आया। हरि सिंह ने ये काग़ज़ भवानी के पास रखे थे। भवानी ने इसे अलग रखवाया — क्योंकि इसमें हरि सिंह के हाथ की लिखाई नहीं, बल्कि उनका दबाव है जो बता रहा है कि पापा ने कुछ देखा था।”
“और वो काग़ज़ आज रात जलने वाला है — यानी वो भवानी के पास है?” रीना ने पूछा।
माँ ने सिर हिलाया। “जो भवानी ने रात हवेली में कहा — कि तेरे बाप का नाम उसके पास वाले काग़ज़ में है — वो यही है।”
मैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा, उसे करीब से देखा। “ये पापा की लिखाई है? इसमें कहीं उनका अंगूठा है?”
माँ ने गिलास पकड़ा। “उनकी लिखाई नहीं है। ये भवानी के दादा की लिखाई है — हरि सिंह की। पर नीचे जो मुहर है, वो पापा ने लगाई थी। वो मुहर पापा के पास रात भर रही थी। और सुबह वो बीमार पड़े।”
मैंने अपनी पोटली में बाक़ी काग़ज़ रखे। राजेंद्र को फ़ोन करना था। भवानी के पास वाला काग़ज़ आज रात जलने वाला है — पर भवानी तो हवेली से जा चुका था। जलाने वाला कौन होगा?
“भवानी ने कहा, वो मर चुका है,” मैंने कहा।
“वो मरा नहीं,” माँ ने कहा। “वो हवेली की तीसरी दीवार में है — वो दीवार जो सबसे पीछे है। पुराने हिसाब की दीवार। जिसे देखने के लिए किसी की नज़र नहीं जाती। भवानी वहीं काग़ज़ छिपाता है।”
“उसने मुझे क्यों बताया — ‘तेरे बाप का नाम है’?”
“क्योंकि वो समझता है तू उन काग़ज़ों को जलाने से रोकने के लिए आएगा। और जब तू आएगा, तो तेरे साथ वो सारे काग़ज़ होंगे — जो उसके पास हैं। वो तुझे उनके बदले अपने काग़ज़ दे देगा।”
रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी। रीना ने मेरी आँखों में देखा।
“तो भवानी ने आज रात एक जाल बिछाया था — हवेली में — और वो हमें फँसाने में कामयाब नहीं हुआ। अब उसके पास दूसरा जाल है।”
मैंने टोकन जेब में वापस रखा। “या तीसरा काम यही है — वो काग़ज़ बचाना जिसमें पापा का नाम है।”
इतने में दरवाज़े पर दस्तक हुई। बंसी था। उसकी कलाई अब भी सूजी थी, पर वो हँस रहा था।
“सुन,” उसने कहा, “मैंने चाय की दुकान पर बैठे-बैठे सुना — भवानी ने आज रात कोई काग़ज़ जलाने का बंदोबस्त किया है। किसी को भेजा है।”
“किसको?”
“पता नहीं। पर जगह बताते हैं — हवेली का तीसरा दरवाज़ा।”
मैंने टोकन को जेब से निकाला। वो फिर से गुनगुना हो रहा था। उस पर पुरानी लकीर के नीचे, नई लकीर उभर रही थी — “तीसरा काम: वो काग़ज़, जिस पर पापा का नाम है।”
मैंने टोकन जेब में रखा और जूते पहने।
रीना ने मेरी कलाई पकड़ी। “मन्नू, हवेली जाने से पहले — ये काग़ज़ जो अभी हमारे पास है — इसे राजेंद्र को देना।”
“हाँ, दे दूँगा। पर पहले वो काग़ज़ बचाने हैं जो भवानी के आदमी जला रहे हैं। अगर वो जल गए, तो भवानी कहेगा — ‘मेरे पास कुछ नहीं था।’ और पापा का नाम सिर्फ़ उसके मुँह की बात रह जाएगा।”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। “तू जानता है, हवेली में कितने आदमी होंगे?”
“नहीं।”
“तो फिर?”
“माँ, आज रात टोकन ने तीसरा काम दिया है। और टोकन कभी बेकार काम नहीं देता।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। “तेरी कलाई?”
“इस कलाई ने कल तेरा काम किया था। आज भी करेगी।”
“तो फिर चल। रास्ते में राजेंद्र को बताते चलेंगे।”
दरवाज़े से निकलते वक़्त रीना ने पीछे से कहा — “मन्नू।”
मैं रुका।
“माँ ठीक कह रही हैं। हवेली में जो भी हो, अकेले मत घुसना। बंसी साथ है, राजेंद्र साथ आएगा। और मैं भी।”
“रीना…”
“तेरी कलाई पकड़कर मैं तुझे हवेली के दरवाज़े पर रोक नहीं सकती। पर हाँ, तेरे साथ रहकर तुझे आगे बढ़ने से भी नहीं रोक सकती। बस ये बता — वो काग़ज़ जिन पर पापा का नाम है, अगर जल गए, तो क्या भवानी को हमेशा के लिए फ़र्क़ नहीं पड़ेगा?”
“पड़ेगा,” मैंने कहा। “क्योंकि हमें पता है कि वो काग़ज़ किस चीज़ के बारे में थे। हम गवाह हैं। पर अदालत को ज़ुबान से ज़्यादा काग़ज़ पर भरोसा है।”
मैंने दरवाज़ा खोला। बाहर रात ठंडी थी, और दूर, शहर के पुराने हिस्से में, हवेली की तरफ़ एक कोना अंधेरे में जल रहा था — या जलने वाला था। मैंने टोकन जेब में दबाया और सीढ़ियाँ उतरने लगा।
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