The Token System – Chapter 29
उसने मेरी तरफ़ देखा। "मेरी बेटी का रिश्ता इसी आदमी ने तुड़वाया था। वो अब अपने ससुराल में खुश है, पर मेरा दिल आज भी भारी है।" उसने दीवार की तरफ़ देखा। "जा।"
मैंने मकान की सीढ़ियाँ चढ़ीं। दरवाज़ा खुला था। अंदर मौसी बैठी थी, हाथ में चाकू। मुझे देखकर उठी।
"कौन?"
"शेखर बाबू ने भेजा।"
"सबूत?"
"अंगूठे वाला काग़ज़। उसका नाम उसमें है। वो सुरक्षित है।"
वो एक पल रुकी। फिर कमरे की तरफ़ आवाज़ दी — "बिटिया।"
लड़की निकली। उमर बीस के आसपास, दुबली, आँखें लाल।
"पापा कहाँ हैं?"
"सुरक्षित हैं। पर तू यहाँ नहीं रह सकती। नीचे जीप नहीं है, पैदल जाना होगा। नाली के रास्ते।"
"कहाँ जाना है?"
"मेरे घर। रामगंज। काकी के घर। वहाँ लालाजी की पहुँच नहीं है।"
उसने मौसी की तरफ़ देखा। मौसी ने सिर हिलाया।
हम नीचे उतरे। पहलवान आदमी गली के मुँह पर बोल रहा था, आवाज़ नहीं पकड़ में आ रही थी। मैंने लड़की का हाथ पकड़ा और नाली के सहारे पीछे की गली में मुड़ा।
काकी गली के मोड़ पर बेंच पर बैठी थी, लाठी गोद में, छोटू साथ खड़ा।
"आ गई," काकी ने कहा। "अच्छा किया। अब सीधे घर, रीना के पास।"
"तू कैसे आई?"
"मैंने कहा था न।" उसने लाठी उठाई। "जा। मैं यहीं बैठी हूँ। कोई पूछेगा तो कहूँगी — बहू का इंतज़ार कर रही हूँ।"
मैंने लड़की को रीना के पास छोड़ा और पलटा। रास्ते में बंसी का फ़ोन आया।
"रसीद मिल गई?"
"अभी तहसील गया नहीं।"
"जा। लालाजी दफ़्तर बंद करवा रहा है जल्दी। कह रहा है क्लर्क बीमार है।"
मैंने गाड़ी पकड़ी और तहसील पहुँचा। गेट पर राजेंद्र खड़ा था।
"तू यहाँ?"
"बंसी ने बुलाया। कहा, तेरी रसीद अटक रही है।"
अंदर गया तो क्लर्क की कुर्सी खाली थी, काउंटर पर पीली फ़ाइलों का ढेर। लालाजी बगल के कमरे से निकले।
"अरे, मन्नू। तू अब भी आया?"
"रसीद चाहिए।"
"रसीद? काग़ज़ तो कल जमा हो गया था। रसीद तो उसी दिन बन जाती है। पर क्लर्क साहब आज नहीं आए। कल आ।"
"कल?"
"हाँ, कल।" वो चलने लगे।
"लालाजी।"
"हाँ?"
"कल तक रसीद नहीं मिली, तो मैं ऊपर तक बात ले जाऊँगा। और वो बात भवानी के दफ़्तर तक जाएगी, तेरी चेयर तक।"
लालाजी का चेहरा वैसा ही पीला पड़ा जैसा कल पड़ा था। उन्होंने क्लर्क को फ़ोन किया। दस मिनट में क्लर्क आया, हाथ में चाय का गिलास। रसीद पर मुहर लगी, हस्ताक्षर हुए। मैंने रसीद जेब में रखी और बाहर निकला।
राजेंद्र ने कहा, "अच्छा किया। अब काकी को दे दे।"
"तू मेरे साथ चल।"
"क्यों?"
"क्योंकि शाम को मुझे एक और जगह जाना है, और वहाँ तेरी वर्दी काम आएगी।"
वो हँसा। "तू मुझे किराए पर रखे है क्या?"
"हाँ। चाय पर।"
रात आठ बजे मैं दवा वाले बूढ़े की दुकान पर पहुँचा। दुकान बंद थी। मैंने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से आवाज़ आई — "कौन?"
"मन्नू। लड़की सुरक्षित है।"
दरवाज़ा खुला। बूढ़े ने मेरा चेहरा देखा, फिर पीछे खड़ा राजेंद्र देखा। उसकी आँखें भर आईं।
"सच?"
"रामगंज। काकी के घर। रीना के पास। कल सुबह तक वहीं रहेगी। तेरी भांजी को बोल दे, वो भी वहीं आ जाए।"
"और उसके पीछे वाले?"
"पीछे वाले खाली हाथ लौटेंगे। पहलवान आदमी उन्हें गली के मुँह पर रोके है।"
बूढ़े ने मेरा हाथ पकड़ा। "तेरे पैसे।"
"पैसे?"
"बारह सौ। बचे हुए। मैंने सोचा था, तू लौटाएगा।" उसने जेब से नोट निकाले।
"नहीं।"
"ले।"
"नहीं। ये लड़की की कीमत नहीं है। ये तेरे भरोसे की कीमत है।" मैं मुड़ा।
राजेंद्र बाहर आया। "अब कहाँ?"
"अस्पताल। छोटू की माँ को दवा देनी है।"
रास्ते में मैंने टोकन जेब से निकाला। वो ठंडा था।
राजेंद्र ने देखा। "ये क्या है?"
मैंने टोकन वापस जेब में डाला। "कुछ नहीं। पुरानी चीज़ है।"
अस्पताल पहुँचा तो रात नौ बज चुके थे। इमरजेंसी के बाहर भीड़ थी। मैंने भीड़ को चीरा। छोटू मेरी तरफ़ दौड़ा, आँखें चौड़ी, आवाज़ फटी हुई।
"चाचा! चाचा!"
"क्या हुआ?"
"छोटू, साँस ले।"
"माँ को — ठाकुर के नर्सिंग होम वाले उठाकर ले जा रहे हैं।"
मेरा हाथ अपने आप जेब की तरफ़ गया। टोकन ठंडा ही था। मैंने छोटू के कंधे पकड़े।
"कहाँ?"
"पीछे के फाटक से। स्ट्रेचर पर डालकर। बोल रहे थे — फ़ाइल में गड़बड़ है, इलाज की ज़रूरत है।"
मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। "चल।"
॥
छोटू के हाथ में दवा का डिब्बा दबाया और उसके कंधे पकड़कर इमरजेंसी के दरवाज़े की तरफ़ धकेला। “इसे पकड़े रह। किसी को मत देना। मैं आता हूँ।”
“चाचा, माँ —”
“मैं आता हूँ।”
मैं भीड़ में घुसा। इमरजेंसी के बाहर व्हीलचेयर, स्ट्रेचर, खून से सनी पट्टियाँ, एक औरत बच्चे को गोद में लिए रो रही थी। मैंने किसी को धक्का नहीं दिया, बस रास्ता बनाता गया — “भाई, ज़रा — भाई साहब —”
पीछे के गलियारे में पहुँचा तो सफ़ेद कपड़े वाले दो आदमी स्ट्रेचर खींच रहे थे। स्ट्रेचर पर छोटू की माँ — आँखें आधी बंद, होंठ सूखे, हाथ लटका हुआ। एक आदमी आगे था, एक पीछे। पीछे वाला काली शर्ट में था। वो वही था जिसने सुबह अस्पताल के गेट पर मुझे रोका था।
“रुको।”
दोनों रुके नहीं।
“अरे, रुको बोल रहा हूँ!”
काली शर्ट वाले ने पलटकर देखा, पहचाना, और होंठ सिकोड़ लिए। “तू? तू हर जगह क्यों घुसता है?”
“इसको कहाँ ले जा रहे हो?”
“इलाज के लिए।”
“यहाँ इलाज नहीं होता?”
“यहाँ मशीन खराब है। हमारे नर्सिंग होम में सुविधा है।”
मैं स्ट्रेचर के आगे खड़ा हो गया। “मशीन खराब है तो डॉक्टर बताएगी।”
“डॉक्टर को कौन पूछ रहा है?”
“मैं पूछ रहा हूँ।”
पीछे से आवाज़ आई — “मैं पूछ रही हूँ।”
डॉक्टर सुमन गलियारे के मोड़ से आ रही थी। स्टेथोस्कोप गले में, हाथ में फ़ाइल, चेहरे पर वो भाव जो ड्यूटी के बारहवें घंटे में आता है। उसने स्ट्रेचर के आगे आकर खड़ी होकर कहा, “मरीज़ मेरी ज़िम्मेदारी में है। कोई इसे यहाँ से नहीं ले जा सकता।”
काली शर्ट वाले ने जेब से एक काग़ज़ निकाला। मोड़ा हुआ, मुहर लगा हुआ। “मैडम, मरीज़ के परिवार की मर्ज़ी है। ये लीजिए, अंगूठा लगा है।”
डॉक्टर सुमन ने काग़ज़ लिया, देखा। “इस पर तारीख़ कल की है।”
“तो?”
“तो ये पहले से तैयार था। मरीज़ कल से यहाँ भर्ती है, कल इसने अंगूठा कब लगाया?”
“मैडम, आप इतना मत सोचिए —”
“मैं सोचूँगी नहीं तो कौन सोचेगा? तू?”
स्ट्रेचर पर औरत ने करवट ली। आँखें खोलीं। आवाज़ काँप रही थी। “मैंने… मैंने कुछ नहीं लिखा। मुझे… मुझे कुछ पिलाया। नींद आ गई। फिर… उँगली पर कुछ लगा।”
काली शर्ट वाले ने कदम आगे बढ़ाया। “मैडम, ये बुख़ार में बड़बड़ा रही है।”
मैंने उसके हाथ से काग़ज़ खींचा। वो चिढ़ा — “अरे!”
मैंने काग़ज़ खोला। नीचे अंगूठे का निशान — काला, टेढ़ा, जैसे किसी ने हाथ पकड़कर दबाया हो। ऊपर लिखा था — मरीज़ को अपनी मर्ज़ी से भवानी नर्सिंग होम में भेजा जा रहा है। और नीचे तारीख़। मैंने उँगली उस तारीख़ पर रखी।
“ये तारीख़ कल की है। औरत कल से यहाँ है। इसका मतलब ये काग़ज़ अस्पताल पहुँचने से पहले बना था।”
काली शर्ट वाला मेरे करीब आया। “तेरे से कौन पूछ रहा है?”
“मरीज़ से पूछ रहा हूँ।”
उसने मेरा कंधा पकड़ा। पीछे से राजेंद्र आया — वर्दी में, टोपी सीधी — और उसने कहा, “हाथ हटा।”
काली शर्ट वाले का हाथ अपने आप ढीला पड़ गया।
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