The Token System – Chapter 28
"वो दाम पैसे में नहीं नापा जाता। वो तुझे कहेगा — एक छोटा काम कर। तू भूल जाएगा कि कौन सा। और फिर एक दिन वो काम तेरे गले पड़ेगा।" बंसी ने करछुल उठाया। "मैंने वही किया था। आज तक निकाल नहीं पाया।"
"तो रास्ता?"
"बाज़ार की तरफ़ जा। चीज़ें वहाँ सस्ती मिलती हैं, पर बात करनी पड़ती है।"
मैं चल पड़ा। बस में बैठकर बाज़ार के मोड़ पर उतरा। दवाओं की तीन दुकानें, एक के बाद एक। पहली में आदमी ने मुँह बनाया — सरकारी है, महीना लगेगा। दूसरी में सिर्फ़ सूखा जवाब — स्टॉक में नहीं। तीसरी में बोर्ड टूटा था, फिर भी अंदर खुला था।
अंदर अंधेरा था, एक पंखा धीरे घूम रहा था। काउंटर पर लाल पृष्ठ वाली मोटी बही पड़ी थी। बूढ़ा बैठा था, चश्मा माथे पर।
"ये दवा है?"
उसने लिखा देखा। "है। चार हज़ार दो सौ।"
"चार हज़ार दो?"
"बाहर की है। उसी महीने की, उसी कंपनी की। दाम वही है, बसिक।" उसने बही उलटी। "पर मैं तुझे तीन हज़ार पाँच में दे दूँगा।"
"क्यों दे देगा?"
"क्योंकि तू सुबह चार बजे अस्पताल में किसी औरत के लिए खड़ा था। छोटू मेरे पोते का साथी है। दादा ने कहा था, मदद करना।" उसने आँखें उठाईं। "पर एक शर्त है।"
"बोल।"
"तू शेखर का आदमी है न?"
मैं रुक गया। "शेखर?"
"उसकी बेटी झामा राम की गली में रहती है। मेरी भांजी वहीं रहती है। दो दिन से फ़ोन बंद है। भवानी के आदमी गली के मुँह पर बैठे हैं, बस लड़की निकलने का इंतज़ार कर रहे हैं।"
"तुझे कैसे पता?"
"मेरी भांजी ने बताया। छत से दिखता है उनका मुँह।" उसने दवा का डिब्बा काउंटर पर रखा। "लड़की को सुरक्षित निकाल। मैं बाकी खुद सँभाल लूँगा। दवा तेरी।"
मैंने डिब्बे की तरफ़ देखा।
"मुझे अभी चाहिए।"
"दवा हाथ में है। लड़की कल तक बाहर हो। बस यही शर्त।"
मैंने पैसे गिने। एक हज़ार तीन सौ निकाले, दो हज़ार दो सौ रखे। "फ़ोन नंबर दे। शाम तक लड़की सुरक्षित होगी, वरना दो हज़ार दो सौ तेरे पास वापस।"
उसने नंबर दिया। दवा का डिब्बा हाथ में दिया। मैंने डिब्बा झोले में रखा और बाहर निकला।
अस्पताल पहुँचा तो चार बज चुके थे। इमरजेंसी के बाहर छोटू बेंच पर बैठा था, पैर हिला रहा था। मुझे देखा, उठ गया।
"चाचा।"
"माँ कहाँ है?"
"मैम ने दवा लिख दी। पर माँ को अंदर नहीं रखा, कहा बेड नहीं है। माँ बाहर ज़मीन पर बैठी है, चादर ताने।"
मैं बाहर आया। इमरजेंसी के पास की दीवार के नीचे औरत बैठी थी, सिर पेट पर झुका। साथ में दो औरतें थीं, उसी झुग्गी की। मैं दवा का डिब्बा लेकर उसके पास बैठा।
"पहला घूँट अभी।"
उसने सिर उठाया। आँखों में पानी था, पर आवाज़ साफ़ थी।
"तूने ले ली?"
"ले ली।"
"पैसा कहाँ से?"
"जुगाड़ है। ऐसा हिसाब जो मेरे पास है, और किसी के पास नहीं।"
वो हँसी नहीं। बस दवा का डिब्बा खोला, गोली निकाली और अपने मुँह में नहीं, मेरी हथेली पर रख दी।
"मेरे लिए।"
"मुझे क्यों?"
"क्योंकि ये तूने मेरे लिए ली है। मैं मरने नहीं जा रही। पर ये गोली मैं इसलिए नहीं लूँगी कि तू बेचारगी दिखा सके। अब बता क्या सच है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मैं सच नहीं बोल सकता।"
"तो मत बोल। पर एक बात कह — जो तुझे दे रहा है, वो तुझसे कुछ माँगता है न?"
"हाँ।"
"तो जो माँगे, वो दे देना। छुपाना मत।"
मैंने गोली वापस उसके हाथ में रखी। वो पानी के घूँट के साथ ले गई। मैं उठा।
छोटू मेरे साथ चला।
"चाचा, आज रात माँ यहीं सोएगी?"
"माँ अंदर सोएगी। मेरी कुर्सी के पास, कुर्सियाँ जोड़कर। मैंने देखा है, फर्श पर भी लेट सकती है।"
"मैं भी रुकूँ?"
"तू घर जा। काकी अकेली होंगी।"
"काकी को मैं लाठी से बता दूँगा।"
"लाठी उठाना मत। बस सुनना और दिमाग़ का इस्तेमाल करना। देख, कल तक उनके घर के मुँह पर कोई खड़ा है क्या?"
"क्या हुआ है चाचा?"
"कुछ नहीं। जा।"
वो चला। मैं अस्पताल के गलियारे में खड़ा सोचने लगा — शाम तक रीना को, बंसी को, शेखर की बेटी को सँभालना है। तीन जगह, एक आदमी।
तभी सुमन आई। हाथ में फ़ाइल, साथ में एक नर्स।
"मनोहर।"
"मैम।"
"वो औरत बाहर बैठी है। क्या सोचा है?"
"अंदर कुर्सियाँ जोड़कर। रात भर।"
"फर्श ठंडा है।"
"मैं चादर ले आऊँगा।"
वो एक पल देखती रही। "तेरे पास सबका इलाज है, बस अपना नहीं।"
"मेरा इलाज है — रीना का डाँटना। चलेगा।"
वो मुस्कुराई। "एक बात। ये दवा तुझे कहाँ से मिली?"
"बाज़ार से।"
"कितने की?"
"तीन हज़ार पाँच।"
"बाज़ार में चार हज़ार दो की है। किसने कम कर दिया?"
मैं चुप रहा।
"तेरे पास कोई है," उसने कहा। "पता है मुझे। पर उसको ऐसे मत इस्तेमाल करना कि वो किसी की जान से खेल जाए।"
"वो जान से नहीं खेलता, मैम। जान बचाता है।"
वो चली गई।
मैं गली के मोड़ पर पहुँचा तो बंसी दुकान बंद कर रहा था।
"इतनी जल्दी?"
"मन्नू, तेरे चेहरे पर कुछ और चढ़ा है। बता क्या है।"
मैंने उसे बाज़ार की बात सुनाई। बंसी ने करछुल रखी, सिर खुजाया।
"तूने लड़की निकालने की बात मान ली?"
"मान ली।"
"अकेले?" उसने दुकान की छत की तरफ़ देखा। "गली के मुँह पर दो आदमी हैं। पीछे वाली गली से जाना होगा, वहाँ नाली कूदनी पड़ती है। मैं चलूँ?"
"तू नहीं। तू पहले से इस हिसाब में फँसा है। मैं राजेंद्र को बुलाऊँगा।"
"राजेंद्र चौकी पर नहीं है, आज शहर के दूसरे छोर पर ड्यूटी है। मैंने सुबह सुना।"
"तो?"
बंसी एक पल रुका। "एक आदमी है। पहलवान जैसा, गली के मोड़ पर दुकान चलाता है। उसकी बेटी का रिश्ता भवानी ने तुड़वाया था। वो भवानी के नाम से जलता है। उससे बात कर लेता हूँ।"
"तू बात करेगा?"
"हाँ। पर तू लड़की को शाम तक निकाल। रात में भवानी के आदमियों की नज़र और तेज़ हो जाती है।"
मैं घर लौटा। रीना ने दरवाज़ा खोला। मेरी नज़र सीधी रसोई में गई — वहाँ बैठी थी काकी, हाथ में लाठी, आँखें दरवाज़े पर।
"आ गया," काकी ने कहा। "काग़ज़?"
"कल जमा हुआ था। रसीद आज शाम मिलेगी।"
"और शेखर?"
"वो सुरक्षित है।"
"उसकी बेटी?"
मैं रुक गया। "काकी, तू सब कैसे जानती है?"
"मैं बूढ़ी हूँ, बेवकूफ़ नहीं। तीन साल से मैं उस दफ़्तर के चक्कर लगा रही हूँ। शेखर का नाम काग़ज़ पर था, उसकी बेटी की शादी टूटी थी — दोनों बातें जोड़कर मैंने सोच लिया था। तू उसकी लड़की को निकाल रहा है न?"
"कौन कह रहा है?"
"तेरी आँखें।"
काकी ने लाठी ज़मीन पर टिकाई। "मैं साथ चलूँगी।"
"काकी।"
"मैं बैठी रहूँगी गली के मुँह पर, लाठी लेकर। मेरी उमर में भवानी के आदमी मुझे नहीं छुएँगे। और अगर छुएँगे, तो मोहल्ले में इतना शोर होगा कि उसकी हवेली तक सुनाई देगा।"
मैंने रीना की तरफ़ देखा। रीना ने कंधे उठाए। "मुझे मत पूछ। मैं तो काकी की बात से सहमत हूँ।"
शाम छह बजे मैं झामा राम की गली के पीछे वाली नाली पर खड़ा था। चप्पल हाथ में थी, पैर मिट्टी में। सामने की दीवार पुरानी थी, उस पर किसी बच्चे ने कोयला से नाम लिखे थे।
पीछे से कोई आया। मैं मुड़ा — पहलवान जैसा आदमी, मोटा, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में डंडा।
"तू मन्नू है?"
"हाँ।"
"बंसी ने भेजा।" उसने डंडा नीचे रखा। "मैं गली के मुँह पर खड़ा रहूँगा, दोनों से बतियाता रहूँगा। तू जल्दी कर।"
"तू क्यों आया?"
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