The Token System – Chapter 25
दरवाज़ा खुला था। मैंने देखा — काकी ज़मीन पर बैठी थीं। छोटू उनके आगे खड़ा था, आँखें डबडबाई। और रीना — रीना एक कोने में खड़ी थी, हाथ बँधे हुए नहीं थे, पर वो चुप थी। उसकी आँखें मुझे देखकर फैल गईं।
“मन्नू —”
“कुछ नहीं हुआ,” मैंने कहा। “तू शांत रह।”
काकी ने सिर उठाया। उनके हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ साफ़ थी।
“ये दोनों सुबह से बैठे हैं। कहते हैं — रीना को ले जाएँगे। मैं बोली, बेटी मेरे घर आई है, तो मेरी है। तो इसने छोटू को धमकाया।”
छोटू ने अपने आँसू पोंछे और बोला, “मामा जी, इन्होंने कहा — तेरी दादी को बता देंगे कि उसका गुज़रा हुआ बेटा भी वो काग़ज़ चोरी करने वालों के साथ था।”
मेरे भीतर कुछ जम गया।
एक आदमी मेरी तरफ़ बढ़ा। “सुन मनोहर, ज़्यादा तमाशा मत कर। काग़ज़ निकाल, रीना को ले जा, और अपने घर जा। ठाकुर साहब के साथ पंगा लेना तेरे बस का नहीं।”
“टोकन निकाल,” मैंने पीछे से आती आवाज़ सुनी।
सब पलटे। राजेंद्र दरवाज़े पर खड़ा था। वर्दी में। पीछे दो सिपाही। बंसी भी साथ।
“मनोहर, टोकन निकाल,” राजेंद्र ने दोहराया। “आज इसी बहाने ये दोनों बैठे हैं, तो निकलवा लेते हैं।”
मैं समझ गया। मैंने जेब से टोकन निकाला — पीतल, सपाट, दोनों तरफ़ साफ़। कुछ लिखा नहीं था। सिर्फ़ चमक रहा था।
“ये टोकन है,” मैंने कहा। “ये मेरा है। और ठाकुर साहब के पास जो है — वो जानते हैं क्या है?”
दोनों आदमियों ने एक-दूसरे को देखा।
“अब सुनो,” राजेंद्र ने कहा। “ये दोनों काकी के घर में घुसकर धमका रहे हैं, एक बूढ़ी औरत और एक दस साल के बच्चे को। ये धारा के तहत आता है। मेरे सामने बताओ — किसके कहने पर आए हो?”
वे चुप रहे।
“ठीक है,” राजेंद्र ने कहा। “दोनों को थाने चलो। वहाँ बताओ।”
तभी एक आदमी ने धीरे से कहा, “हम तो बस… ठाकुर साहब ने कहा था कि रीना जी को घर छोड़ने आ जाना। भलाई की बात कही थी।”
“किसकी भलाई?” मैंने पूछा। “मेरी बहन को घर से उठाकर लाना — भलाई?”
“बस, बस,” राजेंद्र ने हाथ उठाया। “दोनों पीछे हटो।”
वे पीछे हुए। एक ने मेरी तरफ़ देखा — आँख में गुस्सा था, पर जीभ बंद।
मैं रीना के पास गया। उसने मेरा हाथ पकड़ा और धीरे से कहा, “मैं डरी नहीं थी। मैंने सोचा — भाई आएगा।”
“आ गया,” मैंने कहा।
काकी ने मेरी तरफ़ देखा। “मन्नू, ये दोनों जो काग़ज़ माँग रहे थे — वो कौन सा है?”
मैंने कहा, “काकी, आप चिंता मत करो। वो मेरे पास है।”
“मेरे बेटे का नाम उसमें है?” उनकी आवाज़ काँपी।
“नहीं। आपके बेटे का नाम ज़मीन वाले काग़ज़ में था, जो पूरा हो चुका।”
काकी ने आँखें बंद कर लीं। छोटू ने उनका हाथ पकड़ लिया।
राजेंद्र ने दोनों आदमियों को बाहर खींचा। बंसी उनके पीछे गया। मैं रीना के साथ बैठ गया।
“तू ठीक है?” मैंने पूछा।
“हाँ।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “माँ ने मुझे रात में यहाँ भेजा था। कहा था, कल सुबह तक रुक जा। फिर भेज देगी।”
“मुझे पता है।”
“पर मन्नू,” उसने धीरे से कहा, “सुबह छह बजे से ये दोनों बाहर खड़े थे। काकी ने दरवाज़ा खोला तो घुस आए। चाय माँगी, बैठ गए। कहा — बैठे रहेंगे, जब तक तेरा भाई न आए।”
“अब चले जाएँगे।”
“मन्नू, वो काग़ज़ क्या है जो तुझे छुपाना पड़ रहा है?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें सीधी थीं। कोई शक नहीं, कोई डर नहीं।
“बाद में बताऊँगा,” मैंने कहा।
“कब?”
“कुछ दिन में।”
उसने सिर हिलाया। “तू हर बात में ‘कुछ दिन में’ कर देता है।”
“सीख रहा हूँ,” मैं हँसा। “देख, आज मैंने ‘ना’ कहना शुरू कर दिया है।”
वह मुस्कुराई। “अच्छा कर रहा है। पर एक बात — मुझे शादी की जल्दी नहीं है। मैं तुझ पर बोझ नहीं बनना चाहती।”
“तू बोझ नहीं है।”
“मैं जानती हूँ। पर तू अब सुन भी ले।”
मैं हँसा। बाहर से बंसी की आवाज़ आई। “मन्नू — दोनों को गाड़ी में बैठा दिया। राजेंद्र कह रहा है, तू भी थाने चल। बयान देने पड़ेंगे।”
मैं उठा। रीना ने मेरा हाथ पकड़ा।
“मन्नू, एक बात। माँ ने कल रात मुझे भेजते वक़्त कहा था — ‘तेरे भाई को बोलना, दादा की बात याद रखे। दीवार के पीछे जो लिखा है, वो पढ़े।’”
मैं रुक गया।
“किस दीवार के पीछे?”
“नहीं बताया। बस इतना कहा।”
मैंने टोकन जेब में महसूस किया। वो गरम नहीं था — पर ठंडा भी नहीं। जैसे सुन रहा हो।
थाने के रास्ते में राजेंद्र ने कहा, “मनोहर, ये आदमी ज़्यादा नहीं बोलेंगे। भवानी का हुक्म है। मगर मैं कुछ निकाल सकता हूँ।”
“क्या?”
“तेरे पास जो काग़ज़ हैं, उनमें ज़मीन का है। मगर भवानी को किसी और काग़ज़ की फ़िक्र है। मुझे थाने में पता चला आज सुबह — भवानी के आदमी तहसील दफ़्तर के पुराने कमरे में कुछ ढूँढ रहे थे। रात में। तीन आदमी। रिकॉर्ड कमरे की चाबी उनके पास नहीं है, तो उन्होंने ताला टूटा।”
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। “क्या ढूँढ रहे थे?”
“मुझे नहीं पता। पर एक चौकीदार ने देखा — वो लालटेन लेकर दराज़ों में कुछ ढूँढ रहे थे। कोई पुरानी फ़ाइल। चौकीदार ने मुझे बताया, एक आदमी ने कहा था — ‘सेठ की बही वाला हिस्सा नहीं मिला तो ठाकुर साहब हमें नहीं छोड़ेंगे।’”
मैं चलते-चलते रुक गया। राजेंद्र मेरी तरफ़ देख रहा था। बंसी ने भी कदम रोके।
“सेठ की बही,” मैंने धीरे से कहा। “वो शेखर की बेटी के पास है।”
“क्या?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “राजेंद्र भाई, जल्दी करो। थाने में बयान देकर मुझे झामा राम की गली जाना है।”
“अभी?”
“अभी। भवानी के आदमी उस बही के पीछे हैं। और बही एक अकेली लड़की के पास है।”
राजेंद्र ने गाड़ी तेज़ की — वह गाड़ी जो हमें थाने ले जा रही थी। मैंने खिड़की से बाहर देखा। अस्पताल का गेट पीछे छूट गया था।
तभी मेरी जेब में टोकन गरम हुआ। बहुत गरम। मैंने खिड़की बंद की, हथेली पर रखा। अंक पर एक नई लकीर उभर आई थी।
“झामा राम की गली, पहले। बही बाद में।”
मैंने अपनी आँखें मलीं। लकीर वहीं थी।
“क्या लिखा है?” बंसी ने पूछा।
“कुछ नहीं,” मैंने कहा और टोकन जेब में रख लिया। “बस — पहले गली, फिर बही।”
राजेंद्र ने मेरी तरफ़ देखा। “क्या बोला, मनोहर?”
“बाद में बताऊँगा। पहले गाड़ी मोड़ — झामा राम की गली।”
गाड़ी तेज़ हो गई। मैं घबराया हुआ बैठा था, पर मेरे होठों पर हल्की मुस्कान थी। टोकन ने आज पहली बार एक से ज़्यादा बात कही थी। आधी अधूरी, पर साफ़।
कान में जैसे कोई हँसा। मैंने पलटकर देखा — बंसी बैठा था, राजेंद्र बैठा था, गाड़ी में कोई और नहीं। मैंने सोचा, मेरा दिमाग़ ख़राब हो रहा है। और फिर मैंने खुद को टोका — “आज तो तीन काम शुरू होने हैं। एक भी नहीं हुआ। और उल्टा भवानी के लोग पीछे पड़ गए।”
टोकन जेब में ठंडा पड़ गया। जैसे कह रहा हो — “जल्दी क्या है? तीन दिन बाकी हैं।”
गाड़ी ने झामा राम की गली का मोड़ लिया। घड़ी सुबह के नौ बजे दस मिनट दिखा रही थी।
पहला काम शुरू भी नहीं हुआ था, और उसका पहला ख़तरा दरवाज़े पर खड़ा था।
॥
गाड़ी ने झामा राम की गली का मोड़ लिया तो मैंने बंसी की तरफ़ देखा। उसने मुँह बना लिया — जैसे कह रहा हो, "मैंने कहा था न, ये गली कभी अच्छी ख़बर नहीं लाती।"
गली के मुँह पर ही तीन लड़के खड़े थे, स्कूल बैग टाँगे। उनमें से एक ने गाड़ी देखी और भाग गया।
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