The Token System – Chapter 24
सुबह छह बजे छत पर बैठा, मैंने टोकन हथेली पर रखा और उसे घूरने लगा। पीतल पर वो लकीर अभी भी वैसी ही थी — अब तीन काम, तीन दिन, तीन ज़रूरतें। रात भर यही लाइन आँखों के सामने घूमती रही।
“कौन से तीन?” मैंने टोकन से पूछा। “कम से कम नाम तो बता।”
टोकन गरम हुआ। मेरी उँगलियाँ झुलसने लगी तो मैंने उसे दूसरे हाथ में पलटा। कान में आवाज़ आई — “रामगंज, पुरानी गली, ज़मीन का काग़ज़।”
और बस। ठंडा हो गया।
“अरे, ये क्या बात हुई?” मैंने फिर पूछा। “काकी के काग़ज़ तो कल ही निकल आए। अंगूठा लग गया। तहसील में जमा हो गया। फिर ये कौन सा ज़मीन का काग़ज़?”
कुछ नहीं। मैंने टोकन हिलाया, उल्टा किया, नाखून से खुरचा। पीतल की सपाट सतह पर सिर्फ़ अंक और वो एक लकीर। तीन सौ पचास, नीचे एक दिन। मैंने जेब में रख दिया।
“आधी बात बोलकर चुप हो जाए,” मैंने आसमान से बात की, “तो आदमी क्या करे? अपने सिर के बल चले?”
नीचे से माँ की आवाज़ आई। “मन्नू, चाय रखी है।”
मैं उतरा। माँ चूल्हे के पास बैठी थीं, चाय का प्याला हाथ में। मैंने उठाया और एक घूँट लिया। कड़क थी।
“रीना सुबह आ जाएगी,” माँ ने कहा। “काकी के घर छोड़ी थी, तो काकी भी नाराज़ नहीं होगी।”
“हाँ।”
“आज फिर रात भर जागे?”
“नींद नहीं आई।”
माँ ने कुछ नहीं कहा। बस मेरी प्लेट में एक रोटी रख दी।
मैं चाय खत्म करके उठा। शर्ट पहनी, थैला उठाया। टोकन जेब में ठंडा था।
“अस्पताल जा रहा हूँ,” मैंने कहा। “रीना आए तो कह देना, दोपहर में मिलूँगा।”
माँ ने सिर उठाया। “मन्नू।”
“हाँ?”
“जो काग़ज़ तूने निकाले हैं, वो अब तेरी जेब में हैं। भवानी उसे बिना लड़े नहीं छोड़ेगा। ध्यान से चल।”
“मैं ध्यान से ही चलता हूँ,” मैंने कहा और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। पलटकर देखा। “माँ, एक बात।”
“क्या?”
“दादा ने कभी बताया था — हवेली में कोई और काग़ज़ भी है? ज़मीन वाला नहीं, किसी और तरह का?”
माँ के हाथ चाय के प्याले पर रुक गए। “क्यों?”
“बस ऐसे ही। कल टोकन ने कहा था, कुछ बाकी है।”
माँ कुछ देर चुप बैठी रहीं। फिर बोलीं, “तेरे दादा कहते थे — हवेली में दो तरह का हिसाब रखा जाता था। एक ज़मीन का, एक ब्याज का। ब्याज वाला हिसाब किसी की ज़मीन से जुड़ा नहीं था। उसमें गिनती थी। नाम थे। और किसी की आँख का पानी था।”
मैं दरवाज़े पर ही ठिठक गया।
“किसका हिसाब?”
“जिसका पैसा जोड़ा गया था। सेठ ने।” माँ ने कहा। “वो हिसाब मेरे ससुर के हाथ में था। और मेरे ससुर ने उसे देखकर ही सब छुपा दिया।”
“वो हिसाब कहाँ है?”
“नहीं जानती।” उन्होंने चाय का प्याला नीचे रख दिया। “बस इतना जानती हूँ — जो काग़ज़ तुझे छत के बक्से में मिले, वो हिस्सा थे। पूरा हिसाब कहीं और है।”
मैं बाहर निकल गया।
——
गली के मोड़ पर काली शर्ट वाले आदमी ने मेरा रास्ता रोका। वही, जिसने बस स्टॉप पर मुझे धमकाया था।
“मनोहर भाई,” उसने कहा, “ठाकुर साहब ने कहा है, तू आज से अपनी राह चल।”
“अपनी राह?” मैं हँसा। “मैं तो पहले से अपनी राह चल रहा हूँ। तुम्हारे ठाकुर साहब मेरी राह में नहीं आए, तो अच्छा था।”
“मतलब?”
“मतलब यही, भाई। मुझे अस्पताल जाना है। तुम्हारे ठाकुर साहब का बड़ा दिल है कि मुझे इतनी सुबह याद किया। अब जाने दो।”
वह मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर बोला, “ठाकुर साहब कह रहे थे, तेरे पास जो टोकन है, वो नक़ली है। असली कभी खोता नहीं। तेरे हाथ में जो है, वो बस एक टुकड़ा है।”
मेरे पेट में कुछ हिला। पर मैं मुस्कुराया।
“अरे, तो ठाकुर साहब को इतनी फ़िक्र क्यों है? जगह-जगह मुझे थाना-कचहरी में घसीट लिए। मेरे घर आ गए। मेरी बहन की शादी मेरी बुक कर रहे हैं। अगर ये टुकड़ा है, तो इतना डर किस बात का?”
उसने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, पर मैंने उसे चलता कर दिया।
“जाओ, ठाकुर साहब को कह दो — मन्नू ने कहा, नक़ली टोकन से असली काम नहीं होता। और जो असली टोकन से नक़ली काम करता रहा, वो खुद जानता है अब।”
मैंने कंधा मिलाया और चल दिया। पीछे मुड़कर नहीं देखा।
अस्पताल के गेट पर बंसी खड़ा था। कमर पर हाथ, आँखें छोटी। यह चेहरा देखकर मेरा कदम अपने आप रुक गया।
“क्या बात?” मैंने पूछा।
“सुन,” बंसी ने कहा, “काकी के घर से रीना लौटी नहीं। और वहाँ भवानी के दो आदमी खड़े हैं।”
मैं जहाँ था वहीं स्तब्ध खड़ा रहा। पीतल का टोकन जेब में गरम हुआ।
“क्या मतलब लौटी नहीं? माँ ने कहा था सुबह आएगी।”
“मैंने अभी काकी के गली की तरफ़ से आते हुए दो आदमियों को देखा। काली पैंट, सफ़ेद बंडी, वही ठाकुर के। वो काकी के दरवाज़े पर खड़े थे। मुझे गली में देखकर एक जोर से बोला — ‘चाय वाले, यहाँ इनकी दुकान का पता किसी से मत बताना।’ मैं बस देखता रहा और भागता हुआ तुझे ढूँढने चला।”
“रीना कहाँ है?”
“पता नहीं। मैंने काकी को फ़ोन लगाया — कोई नहीं उठा रहा। शायद घर में फ़ोन है ही नहीं।”
मैंने अपना मोबाइल निकाला। माँ को फ़ोन लगाया। चार घंटी बजीं, फिर आवाज़ आई।
“हाँ, मन्नू?”
“माँ, रीना आई?”
“नहीं तो। तूने कहा था दोपहर में… अभी तो आठ ही बजे हैं।”
“काकी के यहाँ कुछ ठीक नहीं लग रहा। मैं जा रहा हूँ।”
“मन्नू —” माँ की आवाज़ घबराई हुई थी, पर मैंने फ़ोन काट दिया।
बंसी ने मेरा हाथ पकड़ा। “रुक। इस तरह भागेगा तो पकड़ा जाएगा। पहले सोच।”
“सोचने का वक़्त नहीं है।”
“दो मिनट लगेंगे।” उसने मुझे खींचकर दुकान की तरफ़ किया। “सुन। ठाकुर के आदमी वो काग़ज़ नहीं माँग रहे जो तहसील में जमा हो गया। वो कुछ और माँग रहे हैं। उनको रीना से मतलब नहीं, रीना से तुझ तक रास्ता है। ये उन्होंने सोच-समझकर किया है — तेरी घबराहट को टटोलने के लिए।”
“तो मैं क्या करूँ — चाय पीकर बैठा रहूँ?”
“तू राजेंद्र को फ़ोन कर। सिपाही वाला। वो दो मिनट में पहुँच सकता है। सरकारी गाड़ी से। उसके साथ जाना है हमें।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। फिर मोबाइल निकाला और राजेंद्र का नंबर लगाया।
“दो मिनट में मिलता हूँ। तीन चार सिपाही साथ लाओ। रामगंज की पुरानी गली, काकी का घर।”
राजेंड्र ने कुछ नहीं पूछा। बस बोला, “सात मिनट। पुलिस चौकी से गाड़ी लेकर आ रहा हूँ।”
मैं चल पड़ा। बंसी मेरे साथ था। रास्ते में मैंने कुछ नहीं बोला। सिर्फ़ एक बार जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था।
——
गली के मोड़ पर दो आदमी खड़े थे। मुझे देखते ही एक ने मेरी तरफ़ कदम बढ़ाया।
“मनोहर भाई, आप आ गए। ठाकुर साहब ने…”
“चुप कर,” मैंने कहा। “रीना कहाँ है?”
“अंदर। काकी जी के घर में। बातचीत चल रही है।”
“किस बात की बातचीत? किसने बुलाया तुम दोनों को?”
वह मुस्कुराया। “ठाकुर साहब का हुक्म है। सब की भलाई के लिए। आप काग़ज़ दे दो, रीना जी को मैं खुद ऑटो में बिठाकर घर छोड़ दूँगा। कोई बात नहीं होगी।”
“कौन सा काग़ज़?”
“वो जो तहसील में जमा नहीं हुआ। जो आपके पास है।”
मैं हँसा। “तुम्हारे ठाकुर साहब के आदमी को इतनी जल्दी पता चल गया कि मेरे पास कोई और काग़ज़ भी है? कल रात का हिसाब है। अभी सुबह हुई है।”
वह सीधा खड़ा रहा।
“मनोहर भाई, हम से बहस मत करो। हमारा काम है। जो कहा गया है, वही करेंगे।”
“तो करके दिखाओ,” मैंने कहा और गली में दाखिल हो गया।
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