The Token System – Chapter 22
मैंने आँखें खोलीं और रीना के कमरे की तरफ़ देखा। दरवाज़ा बंद था। नीचे से रोशनी नहीं आ रही थी।
मैं उठकर उसके दरवाज़े तक गया। धीरे से खटखटाया। कोई जवाब नहीं। मैंने दरवाज़ा खोला। चारपाई खाली थी। कंबल मुड़ा पड़ा था।
मेरा दिल धक-धक करने लगा।
मैंने माँ की तरफ़ देखा — वो सो रही थीं, शांत। उनके सिरहाने एक काग़ज़ पड़ा था, मोड़ा हुआ, उन्हीं की लिखाई में। मैंने उठाया।
"मन्नू — रीना को मैंने भेजा है। उसे कुछ नहीं होगा। तू बस सुबह हवेली जा और काग़ज़ निकाल। अब देर मत कर। — माँ"
मैं काग़ज़ हाथ में लिए खड़ा रह गया। माँ की आँखें बंद थीं। पर उनके होंठ हिल रहे थे — जैसे सपने में किसी से बात कर रही हों।
मैं कमरे से बाहर आया। आँगन में खड़ा होकर टोकन जेब से निकाला। अब वो पूरा गरम था।
और उस पर एक नई लकीर उभर आई थी, बहुत पतली —
"तीन बजे। पीछे का रास्ता।"
मैंने घड़ी देखी। सवा ग्यारह।
पौने चार घंटे।
॥
रात के सवा बारह बजे मैंने माँ की परची जेब में रखी और अपनी चप्पल उठाई। मुझे रीना के बारे में सोचकर पसीना आ रहा था, पर माँ की लिखाई देखकर थोड़ी तसल्ली भी थी — सो रही थीं, शांत, एक बार भी नहीं हिलीं। सोते वक़्त होंठ हिल रहे थे। मैंने पंखा बंद किया और दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया।
बंसी दरवाज़े पर खड़ा था। साइकिल पर बैठा था और वह एक हाथ से अपना पेट पकड़कर बैठा था, दूसरे से हैंडल।
“तू तो सोने जा रहा था,” मैंने कहा।
“सोता तो, पर तेरी शक्ल देखकर नींद उड़ गई।” उसने साइकिल स्टार्ट की। “कहाँ?”
“पीछे का रास्ता।”
“किसका पीछे का रास्ता?”
“यही तो पता नहीं।” मैं पीछे बैठ गया। “पर टोकन ने तीन बजे कहा है। साढ़े तीन किलोमीटर के अंदर हर पीछे का रास्ता जो मुझे पता है, वो सब देखेंगे।”
बंसी ने साइकिल पेडल मारी। पचास की उम्र में उसका पेट उसे झुकने नहीं देता था, पर वो साइकिल चलाते वक़्त किसी लड़के जैसा हो जाता था।
हम पहले नर्सिंग होम की पिछली दीवार तक गए। वहाँ एक बंद गली थी, जिसमें कूड़े के ढेर और एक टूटा नल था। वहाँ कोई नहीं था। फिर अस्पताल के पीछे वाला रास्ता देखा, जहाँ मरीज़ों के परिवार रात में सोते हैं। वहाँ भी नहीं।
दो बजे हम काकी की गली में थे। मैंने साइकिल रोकी और टोकन जेब से निकाला। वो गरम था, पर जैसे ज़्यादा नहीं।
“क्या हुआ?” बंसी ने पूछा।
“यहाँ कुछ नहीं।”
“तो ये तीन बजे वाली लाइन झूठी है?”
“नहीं।” मैंने टोकन वापस जेब में रखा। “बस इतना पता है कि ये जगह आने वाले वक़्त पर ही खुलेगी, अभी नहीं।”
तीन बजे हम अस्पताल के पीछे वाले फाटक पर खड़े थे। वहाँ से एक पगडंडी जाती थी जिस पर रोज़ सुबह कचरा गाड़ी आती है। रात में वह पगडंडी बिल्कुल सूनी थी। मैंने साइकिल से उतरकर कुछ कदम चला।
तभी मेरी जेब में कुछ ठंडा हुआ।
“रुक,” मैंने कहा।
फाटक के पीछे एक लालटेन जल रही थी। बहुत छोटी, किसी पेड़ के नीचे रखी। और लालटेन के पास कोई बैठा था।
मैंने कदम बढ़ाए। पास जाकर देखा — एक औरत, पचास के आसपास, सिर पर चादर, हाथ में एक पुरानी लिफ़ाफ़े जैसी शक्ल की थैली। वो मुझे देखकर उठी।
“तू मनोहर है?” उसने पूछा।
“हाँ। तू कौन?”
“बात मत कर।” उसने थैली मेरी तरफ़ बढ़ाई। “इसमें तेरे काग़ज़ हैं। हवेली की दीवार से निकाले हैं। ठाकुर के आदमी दो घंटे बाद उसी दीवार को तुड़वा रहे हैं। तीन बजे से पहले तू नहीं पहुँचा, तो सब मिट्टी में मिल जाएगा।”
मैंने थैली ली। हाथ काँप रहे थे। “तू कौन है? तुझे ये किसने दिया?”
“कोई नहीं।” वो पलटी। “मैं हवेली में काम करती हूँ। बूढ़ी औरत ने भेजा है।”
“कौन बूढ़ी औरत?”
वो चलने लगी। “जो तेरे दादा को जानती है।”
वो अंधेरे में घुल गई। बंसी दौड़कर पास आया।
“क्या मिला?” उसने पूछा।
मैंने थैली खोली। अंदर एक मोटा पीला लिफ़ाफ़ा था, उस पर कोई मुहर नहीं, बस धागा लिपटा हुआ। मैंने खोला।
अंदर तीन काग़ज़ थे। पहला — ज़मीन का काग़ज़, उसी तरह का जैसा काकी के पास था, पर इस पर तीन अंगूठे थे। दूसरा — एक पुरानी पर्ची, जिस पर लिखा था — “हम दो, हिसाब बराबर — गोवर्धनदास, हरि सिंह, और गवाह — कन्हैया।” मैं यह नाम पहली बार देख रहा था। कन्हैया — यही तो मेरे पिता का नाम था।
तीसरा काग़ज़ सबसे पुराना था। उस पर लिखा था — “हवेली की छत के नीचे, लोहे के बक्से में, दूसरा टोकन। जो इसे पढ़े, वो समझ जाए कि खाता किसका है। — गोवर्धनदास”
मैं वहीं बैठ गया।
“बंसी,” मैंने कहा, “दूसरा टोकन हवेली की छत के नीचे है।”
“मतलब?”
“मतलब ये कि भवानी के पास जो टोकन है, वो असली नहीं है। असली हवेली में है। और भवानी जानता भी नहीं।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “तो भवानी का टोकन काम कैसे करता है?”
मैंने तीनों काग़ज़ वापस थैली में रखे। “यही तो सवाल है।”
——
सुबह छह बजे मैं घर लौटा। माँ जाग रही थीं और चाय बना रही थीं। मैंने दरवाज़ा खोला तो उन्होंने मुड़कर देखा — और फिर मेरी तरफ़ देखती ही रह गईं।
“रीना कहाँ है?” मैंने सीधा पूछा।
“सुरक्षित।” उन्होंने चाय का कप मेरी तरफ़ बढ़ाया। “तू काग़ज़ लाया?”
“लाया।” मैंने थैली मेज़ पर रखी। “माँ — कन्हैया कौन है?”
उनका हाथ काँपा। चाय का कप छोड़कर वो कुर्सी पर बैठ गईं।
“तेरे पिता,” उन्होंने कहा। “कन्हैया तेरे पिता का नाम था।”
“तो ये काग़ज़ कह रहा है कि पिता हवेली के हिसाब के गवाह थे?”
“हाँ।” उन्होंने आँखों में पानी लाकर मेरी तरफ़ देखा। “और जब तेरे पिता ने उस काग़ज़ पर अंगूठा लगाने से मना किया, तो भवानी के दादा ने उन्हें हवेली से रात को निकलवा दिया। वो फिर रामगंज नहीं लौटे।”
मेरे हाथ से कप छूट गया।
“माँ — तू ये सब जानती थी? इतने साल?”
“मैं डरती थी, मन्नू।” उन्होंने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। “तेरे दादा ने मुझे कसम दी थी कि जब तक टोकन तेरे हाथ न लगे, कुछ न बताना।”
“टोकन मेरे हाथ लग चुका है। अब बता।”
“तो जान ले — तेरी रीना कहाँ है।” उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं। “वो काकी के घर है। मैंने उसे भेजा। भवानी के आदमी उसे हमारे घर से उठा ले जाते, इसलिए रात को वहाँ भेज दिया।”
“और तूने मुझे नहीं बताया?”
“तू भवानी के पास गया था। अगर वो जानता कि रीना घर पर नहीं है, तो तुझे और डराता।” उन्होंने कुर्सी से उठते हुए कहा। “अब जा। तहसील जा। शेखर का अंगूठा लगवा। और फिर हवेली जा — छत देख। भवानी के आदमी दीवार तोड़ें, इससे पहले।”
——
नौ बजे हम तीन लोग तहसील के गेट पर थे। मैं, बंसी और डॉक्टर सुमन। डॉक्टर सुमन को लाना आसान नहीं था। उन्होंने साफ़ मना कर दिया था — “सरकारी अस्पताल की डॉक्टर हूँ, तहसील में मेरा क्या काम।” तब मैंने उनके सामने वो पीला काग़ज़ रखा जिस पर छोटू को ठाकुर के नर्सिंग होम भेजने की लाइन थी और नीचे शेखर बाबू का नाम था।
उन्होंने काग़ज़ पढ़ा और बस एक लाइन बोलीं — “मैं चलूंगी।”
गेट पर सिपाही राजेंद्र खड़ा था। तगड़ा, मुछे ऐंठी हुई, वर्दी में सख़्त चेहरा। जब बंसी पास गया तो उसने नज़र उठाई और होंठों पर एक कोना हिला।
“बंसी भाई,” उसने कहा। “बहुत दिन बाद।”
“राजेंद्र, ये मन्नू।” बंसी ने मेरी तरफ़ इशारा किया। “बात अंदर करनी है।”
राजेंद्र ने मुझे ऊपर से नीचे देखा। “ये वही है न जो कल भवानी के नर्सिंग होम में गया था?”
“तुझे कैसे पता?” मैंने पूछा।
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