The Token System20 / 1154

The Token System – Chapter 20

7 min read November 6, 2026

भवानी के आदमी कुछ कहने ही वाले थे कि सुमन ने उनकी तरफ़ नज़र घुमाई। बस नज़र — कोई शब्द नहीं। वो दोनों एक कदम पीछे हटे।

मरीज़ को अंदर ले जाया गया। मैं स्ट्रेचर के साथ चल रहा था, एक तरफ़ हाथ लगाए हुए। अंदर जाते वक़्त सुमन ने पलटकर मुझे देखा और कहा — "तुम बाहर रुको। मैं निकलकर बताती हूँ।"

मैं बाहर रुका। भीड़ धीरे-धीरे छँटने लगी। भवानी के दोनों आदमी मेरे पास आए। काली शर्ट वाले ने धीरे से कहा, बिलकुल मेरे कान के पास — "मन्नू, तू ठाकुर साहब के रास्ते में आ रहा है। अभी तक सब ठीक चल रहा था। अब देख लेना।"

"आप लोग चाय पी लो," मैंने कहा। "गुस्सा ठंडा हो जाएगा।"

वो कुछ कहता, इससे पहले सुमन बाहर निकलीं। उनके हाथ में दस्ताने अभी भी थे, माथे पर पसीना।

"मरीज़ बच गया। खून ज़्यादा बह गया था, पर अब ख़तरे से बाहर है। एक घंटा और देर होती तो…" उन्होंने बात अधूरी छोड़ दी, फिर मेरी तरफ़ देखा। "तुम ठीक आदमी हो, मन्नू।"

मैंने मुस्कुराकर सिर हिलाया।

जाते-जाते सुमन ने वो आदमियों की तरफ़ देखा और कहा — "और तुम दोनों — इस गेट पर मरीज़ उठाने आए तो मैं पुलिस को फ़ोन करूँगी। साफ़ बोल रही हूँ।"

वो दोनों कुछ बड़बड़ाए और जीप की तरफ़ बढ़ गए। काली शर्ट वाले ने जाते वक़्त मुझे देखा — बस देखा। उस नज़र में जो था, वो मैं समझ गया। अब हिसाब सिर्फ़ काग़ज़ का नहीं रहा।

मैं अंदर गया। टोकन जेब में गरम था। मैंने एक कोने में निकालकर देखा।

नई लकीर — "एक काम और। तीन सौ पचास। मरीज़ का परिवार।"

तीन सौ पचास रुपये। मैं मुस्कुराया। सड़क दुर्घटना में बचाई जान के तीन सौ पचास। ये टोकन का अपना हिसाब था — कोई मोल-भाव नहीं।

दोपहर में मैं शेखर बाबू के कमरे में गया। वो अपनी कुर्सी पर बैठे थे, चश्मा उतारकर पोंछ रहे थे। मुझे देखते ही हड़बड़ाए।

"मनोहर, अभी नहीं —"

"बस एक मिनट," मैंने कहा, कुर्सी खींचकर बैठते हुए। "तहसील वाली बात। आज नौ बजे। आपने ख़ुद बंसी को फ़ोन किया था।"

शेखर ने चश्मा पहना, फिर उतारा, फिर मेज़ पर रखा। "हाँ। मैंने किया था।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैं थक गया हूँ, मनोहर।" उनकी आवाज़ धीमी थी, थोड़ी काँप रही थी। "तीन साल से रोज़ सोचता हूँ — कल करूँगा। कल कभी नहीं आता। पर आज…" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, "आज तेरे साथ छोटू को देखा, तो लगा कि अब नहीं टाल सकता।"

"अंगूठा लगाओगे?"

"लगाऊँगा।" उन्होंने कुर्सी की बाहें पकड़ीं। "पर एक शर्त है। मेरी बेटी को कुछ न हो। वो पहले।"

"मैंने आपकी बेटी से बात की थी," मैंने कहा। "बही उसके पास सुरक्षित है। आप चिंता मत कीजिए।"

"बही?" शेखर की आँखें फैल गईं। "बही तुम्हारे पास है?"

"मेरे पास नहीं, सुरक्षित जगह पर है।"

शेखर ने गहरी साँस ली और पीछे टेक लगाई। "मनोहर — तू नहीं जानता ये सब कितना फैला हुआ है। थाने में एक आदमी है जो भवानी का आदमी है। तहसील में दो। बस उतना ही कहूँगा — तहसील में जब काग़ज़ पर अंगूठा लगे, तब तेरे साथ कोई और होना चाहिए जो बाहर का हो। भवानी का नहीं।"

"कौन?"

"पुलिस।" शेखर ने कहा। "थाने में एक सिपाही है — नाम भूल गया — जो भवानी से नाराज़ रहता है। उसे लेकर आ।"

"उसका नाम?"

"मैं सोचकर बताऊँगा। पर तू जब पहुँचे, तब तैयार रहे। बात बने या न बने — अंगूठा लगना चाहिए, चाहे मुझे कुर्सी से उठकर भागना पड़े।"

मैं कमरे से निकला। गलियारे में आते ही रीना का फ़ोन आया।

"मन्नू, तू कहाँ है?"

"अस्पताल। क्या हुआ?"

"माँ ठीक नहीं लग रही। सुबह से बैठी है, कुछ बोल नहीं रही। मैंने चाय दी, छोड़ दी। मुझे डर लग रहा है।"

मेरा हाथ टोकन पर गया। गरम था। "मैं अभी आता हूँ," मैंने कहा। "तू उसके पास ही रह।"

मैं तेज़ क़दमों से अस्पताल से बाहर निकला। ऑटो मिला — एक चालक था, शेरवानी की तरह एक पुरानी शर्ट पहने, "बैठो, भाई" कहकर रास्ता छोड़ दिया। मैं बैठ गया।

घर पहुँचा तो रीना दरवाज़े पर ही खड़ी थी। हाथ में एक कप था, जो ठंडा हो चुका था।

"अंदर," उसने कहा।

माँ चारपाई पर बैठी थीं, आँखें उतनी ही जैसे कल थीं — खुली, पर कहीं और देखती हुई। मैं उनके पास बैठ गया।

"माँ?"

"मिला?" उन्होंने बिना सिर घुमाए पूछा।

"क्या?"

"काग़ज़। दादा का। हवेली में पड़ा है।"

"अभी नहीं मिला।"

वो चुप रहीं। फिर बोलीं, बहुत धीमे से — "तू उस हवेली में गया।"

मैं ठिठका। "हाँ।"

"कुछ देखा?"

"दीवार में दो खाँचे। एक खाली। एक में…" मैंने टोकन की तरफ़ इशारा नहीं किया, "कुछ पीतल का।"

माँ ने धीरे से मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं, पर आँसू नहीं थे।

"तेरे दादा ने उस दिन वो नहीं किया जो करना था," वो बोलीं। "उन्हें दीवार के पीछे काग़ज़ मिला था — सेठ की बही वाला असली हिसाब। उसमें तीन नाम थे। एक सेठ का। एक भवानी के दादा का। और तीसरा — तेरे पिता का।"

मैं सीधा बैठ गया। "पिता जी का?"

"उनका नाम उस हिसाब में गवाह की जगह था। तेरे दादा ने उसे दीवार में छुपा दिया — भवानी के डर से। और तब से वो काग़ज़ वहीं है।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। "मन्नू, वो काग़ज़ मिले तो पहले मुझे दिखा। मैं जानती हूँ वो क्या है।"

"अभी बताओ न।"

"अभी नहीं।" उन्होंने हाथ छोड़ दिया। "जब सामने आएगा, तब।"

——

शाम को मैं बंसी की दुकान पर बैठा था। कुछ सोच रहा था, कुछ नहीं। बंसी ने चाय रखी और बोला — "तहसील में कोई और आ रहा है क्या?"

"शेखर ने कहा — एक सिपाही लेकर आऊँ।"

"पुलिस?" बंसी ने चाय का गिलास रगड़ते हुए कहा। "पुलिस को साथ लेकर जाना। हिम्मत का काम है।"

"क्या करूँ?"

बंसी ने गिलास मेरी तरफ़ सरकाया। "सुन। तहसील के गेट पर एक सिपाही हमेशा खड़ा रहता है — राजेंद्र। वो भवानी के ख़िलाफ़ बोलता है, खुलकर। भवानी ने उसके भाई का केस छुड़वाया था, पैसा लेकर। उससे बात कर। पर सावधानी से — क्योंकि वो तेरे नाम से जानता नहीं।"

"तो कैसे?"

"मैं चलूँगा।" बंसी ने अपनी शर्ट की बाँह चढ़ाई। "मेरी एक पुरानी जान-पहचान है। मैं बात कर लूँगा।"

मैंने चाय पी। मीठी थी, बहुत मीठी — जैसे बंसी ने जान-बूझकर ज़्यादा शक्कर डाली हो, ताकि मैं देर तक बैठा रहूँ। पर मुझे जल्दी थी।

घर लौटा तो दरवाज़े पर एक कार्ड पड़ा था। बड़ा, चमकीला, ऊपर सुनहरे अक्षरों में — "ठाकुर भवानी सिंह का नर्सिंग होम"।

पलटकर देखा। पीछे हाथ से लिखा था, नीली स्याही में —

"आज शाम, आठ बजे, अकेले आना। रीना की बात है।"

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

मैंने कार्ड जेब में डाला। टोकन निकाला, देखा — गरम था। पर कोई नई लकीर नहीं। कोई शब्द नहीं।

मैंने एक पल सोचा। फिर मैंने रीना की तरफ़ देखा — वो छत पर कपड़े डाल रही थी, बिना किसी डर के, बिना किसी ख़बर के। एक गाना गुनगुना रही थी।

मैंने टोकन जेब में रखा और कार्ड निकालकर दोबारा पढ़ा।

आठ बजे। अकेले।

अच्छा। चलेंगे। पर अकेले क्यों — ये मैं वहीं तय करूँगा।

बंसी को फ़ोन किया। "बंसी, चार कदम चलना है। आज शाम आठ बजे।" "कहाँ?" "भवानी के नर्सिंग होम।" "क्या?" "पर उसके अंदर मैं जाऊँगा। तू बाहर रहेगा। अगर आधे घंटे में मैं न निकलूँ तो समझ जाना।" बंसी कुछ देर चुप रहा, फिर बोला — "मन्नू, तू पागल है।" "यही तो मेरा काम है।" "–और सिपाही?" "सिपाही कल सुबह तहसील के लिए। आज शाम वो बात है जो टाल नहीं सकते।" फ़ोन कटा। मैंने टोकन उँगलियों में पकड़ा। ठंडा हो गया था।

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