The Token System – Chapter 192
"तो बाहर नहीं जा रहा," मैंने कहा। "अंदर जा रहा है। कचहरी में। कल।"
वो सीढ़ियाँ उतरकर चला गया, पर जाते-जाते रुका — "ठाकुर से कह दूँगा कि तुमने आख़िरी रास्ता भी बंद कर दिया।"
"कह देना," मैंने कहा।
अंदर, शेखर बाबू के दफ़्तर में, मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर तीन काग़ज़ थे — एक पर पापा की लिखाई में चार नाम, दूसरे पर भवानी के होम का स्टाम्प और तीस जगह खाली, और तीसरे पर एक लाइन, बस एक लाइन —
"अगर ये काग़ज़ किसी के हाथ लगे, तो समझ लेना कि खाता अब चार का है।"
मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा। वो कुर्सी पर बैठ गए थे, चश्मे का टूटा फ्रेम हाथ में।
"ये किसने लिखा?"
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर लिखने वाले को तुम्हारा नाम पता था। और मेरी मेज़ का पता भी।"
"तो किसी ने इसे आज सुबह रखा है।"
"हाँ।"
बंसी ने काग़ज़ उठाया और रोशनी में देखा। "स्याही ताज़ी है," उसने कहा। "और देख — काग़ज़ के कोने पर वही निशान है जो टोकन पर है।"
मैंने देखा। दो आड़ी-खड़ी लकीरें, बीच में बिंदु। वही निशान जो टोकन पर था, पापा की घड़ी पर था, और उस नई पर्ची पर था जो हवेली की छत पर आने को कहती थी।
"मतलब ये भवानी नहीं भेज सकता," मैंने कहा। "उसका निशान अलग है — उसका टोकन टूटा है, वो औरत बोल रही थी कि टूटे टोकन से भवानी का हिसाब ख़ुद चल रहा है। ये किसी और का काम है।"
"बाबा?" बंसी ने धीरे से कहा।
"हो सकता है," मैंने कहा।
शेखर बाबू ने अचानक कुर्सी पकड़ ली। "एक बात कहूँ?"
"कहिए।"
"भवानी के होम में जो लिफ़ाफ़े आते-जाते हैं, वो एक आदमी लाता है — सफ़ेद कोट में, कभी बोलता नहीं। वो मुझे भी काग़ज़ देता था।" उन्होंने रुककर साँस ली। "उसकी उँगली पर एक अँगूठी है, पीतल की, और उस अँगूठी पर वही निशान है जो अभी तुमने काग़ज़ पर देखा।"
"आपने ये पहले क्यों नहीं बताया?"
"डर के मारे," उन्होंने कहा। "पर अब डर ख़त्म हो गया। मेरी बेटी का रिश्ता तोड़कर भी वो मुझे नहीं छोड़ रहा।" वो उठे। "कल मैं कचहरी में आऊँगा। और अपनी बेटी को भी लाऊँगा।"
"अपनी बेटी को क्यों?"
"क्योंकि वो उस लिफ़ाफ़े वाले आदमी को पहचानती है," शेखर बाबू ने कहा। "एक बार वो हमारे घर आया था। मेरी बेटी ने उसका चेहरा देखा था।"
मैंने काग़ज़ वापस लिफ़ाफ़े में रखा और जेब में डाल लिया। टोकन ठंडा था।
"अभी मुझे एक काम करना है," मैंने कहा। "रामदीन के क्वार्टर जाना है — दो बजे का वक़्त था, अब चार बज रहे हैं।"
"मैं साथ चलूँ?" बंसी ने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा। "तू शेखर बाबू के साथ रह। अगर मैं दो घंटे में न लौटूँ, तो थानेदार को फ़ोन करना।"
मैं सीढ़ियाँ उतरा। बाहर गली में शाम की रोशनी पीली हो रही थी। मेरी जेब में दस हज़ार से नौ हज़ार बचे थे और एक लिफ़ाफ़ा और। मैंने सोचा — एक लिफ़ाफ़ा, तीन काग़ज़, एक लाइन, और एक आदमी जिसकी अँगूठी पर वही निशान है जो मेरे टोकन पर।
थाने से निकलते वक़्त मेरी जेब में सिर्फ़ गड्डी थी। अब उसमें एक और चीज़ थी — एक ऐसा सवाल जो मुझे ख़ुद हल करना था।
क्वार्टर की तरफ़ मुड़ने से पहले मैंने एक बार पीछे देखा। अस्पताल की खिड़कियों में रोशनी जल रही थी। तीसरी मंज़िल की एक खिड़की पर परदा हिला। कोई देख रहा था। मैंने आँखें सिकोड़ीं — परदे के पीछे एक हाथ था, और उस हाथ में कुछ चमक रहा था। पीतल जैसा।
मैंने क़दम तेज़ किए।
क्वार्टर की गली में पहुँचा तो दरवाज़ा खुला था। अंदर अँधेरा था और फ़र्श पर काग़ज़ बिखरे थे। चारपाई खाली थी। संदूक का ढक्कन उठा हुआ था — जिसे बंसी ने कल खोला था, वो आज फिर खुला था। किसी ने उसे फिर छाना था।
मैंने झुककर एक काग़ज़ उठाया। उस पर रामदीन की लिखाई थी — "सुखराम का असली काग़ज़ भवानी जी के पास, मेरे पास सिर्फ़ नक़ल।"
मैंने दूसरा काग़ज़ उठाया। उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी — "मन्नू, तू देर से आया।"
मैंने काग़ज़ पलटा। पीछे वही निशान था — दो आड़ी-खड़ी लकीरें, बीच में बिंदु। और नीचे एक तारीख़, स्याही में ताज़ी — आज की।
जेब में टोकन ने एक बार हल्का सा ठंडा होकर कहा — "अब तू अकेला नहीं है।"
मैंने काग़ज़ जेब में रखा और बाहर आकर आसमान की तरफ़ देखा। शाम ढल रही थी। कल सुबह कचहरी में मेरा बयान था, और आज रात मुझे उस आदमी को ढूँढना था जिसकी अँगूठी पर मेरे टोकन का निशान था — क्योंकि अगर वो सच में "बाबा" है, तो भवानी भी उसके सामने छोटा आदमी है।
क्वार्टर की गली से बाहर निकला तो सामने रामलाल खड़ा था, हाथ में एक छोटा थैला और आँखों में वही डर जो कल थाने में था।
"तू यहाँ क्यों खड़ा है?" मैंने पूछा।
"तेरे पीछे-पीछे आया," उसने कहा। "थाने से निकला तो देखा तू तेज़ चल रहा था। मैंने सोचा, कुछ गड़बड़ है।"
"घर जा," मैंने कहा। "तेरी बीवी अस्पताल में है।"
"अस्पताल में पैसे नहीं लगे," उसने धीरे से कहा। "डॉक्टर ने कहा, किसी ने पहले ही दे दे रखे हैं। चार दिन का बिल, सब चुका हुआ।"
मैं रुक गया। "किसने दिए?"
"पता नहीं। नर्स बोली, सुबह एक आदमी आया था, सफ़ेद कोट में। उसने कहा — रामलाल के नाम का बिल है, ये लो।" उसने थैला मेरी तरफ़ बढ़ाया। "और ये भी छोड़ गया। कहा, मन्नू को दे देना।"
मैंने थैला खोला। अंदर एक मोटी लाल रंग की किताब थी, जिसके पन्ने पुराने थे, और ऊपर लिखा था — "भवानी होम का हिसाब, साल का पहला हिस्सा।"
"ये क्या है?" रामलाल ने पूछा।
"ये वो चीज़ है जिसके लिए भवानी ने तेरा घर उजाड़ा," मैंने कहा। "और ये मुझे उसी आदमी ने भेजी है जो तेरी बीवी का बिल भर रहा है।"
रामलाल का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। "मन्नू, ये आदमी कौन है?"
"यही तो मैं भी सोच रहा हूँ।"
मैंने किताब के पन्ने पलटे। पहले पन्ने पर तारीख़ें थीं और नाम। कई नाम पहचाने — शहर के दो बड़े वकील, एक पत्रकार, और सबसे नीचे, अलग स्याही में — "शेखर बाबू — रिश्ता तोड़ने का हिसाब।"
"इसे पढ़ना ख़तरनाक है," रामलाल ने कहा।
"यही तो इसकी कीमत है," मैंने कहा और किताब जेब में रखी।
रामलाल ने मेरी ओर देखा। "तू मुझे कुछ पैसे दे रहा था। अब ज़रूरत नहीं। पर एक बात कहूँ — जो आदमी मेरी बीवी का बिल भर रहा है, वो तुझे किताब दे रहा है। मतलब वो तेरे साथ है। फिर भवानी का आदमी तेरे पीछे क्यों पड़ा है?"
"क्योंकि भवानी को लगता है वो अकेला बड़ा आदमी है," मैंने कहा। "और उसे नहीं पता कि उसके ऊपर भी कोई है।"
रामलाल ने मेरा हाथ पकड़ा। "मन्नू, मैं अनपढ़ हूँ। पर इतना जानता हूँ — जो आदमी चुपचाप बिल भरता है, वो बदले में कुछ माँगेगा।"
"माँगेगा तो देखा जाएगा," मैंने कहा। "तू घर जा। और हाँ — ये पैसे रख।" मैंने उसकी जेब में दो हज़ार ठूँस दिए।
"मन्नू—"
"ये कर्ज़ नहीं, हिसाब है," मैंने कहा। "जब मैं छोटा था, मेरे पापा की दुकान जली थी। तेरे पापा ने बिना कहे दस हज़ार दिए थे। तेरे पापा को शायद याद भी नहीं होगा। मुझे है।"
रामलाल की आँखें भर आईं। वो कुछ बोलता, उससे पहले मैं मुड़ गया। भावुकता का वक़्त नहीं था — कचहरी कल सुबह थी और आज रात एक आदमी को ढूँढना था।
मुख्य बाज़ार के मोड़ पर वो मिला। भवानी का आदमी — काला कुर्ता, मोटी मूँछें, हाथ में बीड़ी। वो मानो मेरा इंतज़ार कर रहा था।
"मन्नू," उसने कहा। "ठाकुर ने संदेश भेजा है।"
"बोल।"
"रिपोर्ट दर्ज करवा ली, ठीक है। पर अगली सुनवाई में काग़ज़ किसके पास रहेगा, ये मैं तय करूँगा।" उसने बीड़ी फेंकी। "समझ गया ना? तेरे पास सिर्फ़ शिकायत है। सबूत नहीं।"
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