The Token System – Chapter 175
“ये उस दिन की रसीद है,” उसने कहा। “मैंने इस पर दस्तख़त किए थे। और गवाह के तौर पर एक और आदमी ने दस्तख़त किए थे।”
मैंने काग़ज़ को हैडलाइट की रोशनी में खोला।
नीचे दो दस्तख़त थे। एक बंसी का नाम था, जो उसने लिखना नहीं जानता था — इसलिए उसका अँगूठा लगा था। और ऊपर, गवाह की जगह, एक नाम साफ़-साफ़ अक्षरों में लिखा था।
मेरा हाथ काँप गया।
“ये नाम —”
“हाँ,” बंसी ने धीमी आवाज़ में कहा। “ये भवानी के बेटे का दस्तख़त है। ये रसीद उसने खुद लिखी, खुद साइन की। उसने अपने ही पापा के काग़ज़ का गवाह बनकर लिख दिया — कि पचास हज़ार ले लिए, कोई शिकायत नहीं।”
अस्पताल के गेट पर लगी लाल बत्ती धीरे-धीरे जल-बुझ रही थी। मैंने रसीद को दोनों हाथों से पकड़ा, और मेरे मुँह से बस एक ही बात निकली, जो मैं रोक नहीं पाया।
“भवानी का अपना बेटा?”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब डर नहीं था। कुछ और था — बीस साल का शांत धमाका।
“अब समझा,” उसने कहा, “मैंने तुझसे क्यों कहा कि अब वक़्त आ गया है?”
॥
अस्पताल की लाल बत्ती बुझ चुकी थी और गेट पर सिर्फ़ चौकीदार का टॉर्च घूम रहा था। मैंने रसीद को दोबारा सामने खोला। हेडलाइट बंद कर दी थी, इसलिए बंसी ने अपना मोबाइल जलाया और उसकी रोशनी में हम दोनों उस पीले काग़ज़ को देख रहे थे जो बीस साल से एक ताले में सड़ रहा था।
नीचे बंसी का अँगूठा। और ऊपर, गवाह की जगह, साफ़ अक्षरों में एक नाम — विक्रम सिंह।
“ये दस्तख़त मैंने खुद देखे थे,” बंसी ने कहा। “वो लड़का उस वक़्त सोलह-सत्रह का रहा होगा। भवानी ने उसे बगल में बिठाकर कहा था — बेटा, गवाही के नीचे नाम लिख दे। बाप का काम है। लड़के ने पूछा भी नहीं। बस कलम उठाई और लिख दिया।”
“और तुमने उसे रोका नहीं?”
“मैं क्या रोकता।” बंसी ने मोबाइल बंद कर दिया। “मैं खुद उस वक़्त अपने बेटे के जनेज़े से उठकर आया था। मुझे किसी और के बच्चे की फ़िक्र कहाँ थी।”
हम दोनों चुप हो गए। गेट के अंदर से स्ट्रेचर की पहिए की आवाज़ आई, कोई नर्स जल्दी में किसी को बुला रही थी।
“मुझे ये रसीद सुमन को दिखानी है,” मैंने कहा।
बंसी ने साइकिल का स्टैंड लगाया।
“जा। मैं यहीं बैठता हूँ।” वो गेट के पास वाली पत्थर की बेंच पर बैठ गया। “और मन्नू — सुमन से कहना, मैंने काग़ज़ बदला था। मैं ही वो आदमी हूँ। मुझे नहीं बचाना।”
इमरजेंसी के गलियारे में दो मरीज़ों के परिवार बैठे थे। सुमन अपनी मेज़ पर झुकी कुछ लिख रही थी, स्टेथोस्कोप उसकी कुर्सी पर टँगा था।
“अब तुम?” उसने बिना सिर उठाए कहा। “अभी तो तुम गए थे।”
“एक काग़ज़ दिखाना है।”
“दिखाओ।”
मैंने रसीद उसकी मेज़ पर रख दी। उसने पहले तो नहीं देखा, फिर नज़र गई और कलम रुक गई। उसने काग़ज़ उठाया, दोनों तरफ़ पलटा, और उसकी आँखें गवाह वाली जगह पर अटक गईं।
“ये विक्रम का नाम है,” उसने धीमे से कहा।
“हाँ।”
“वो लड़का —” उसने काग़ज़ नीचे रख दिया, जैसे छूने से जल रहा हो। “मैं उसे जानती हूँ। पिछले महीने हमारे अस्पताल के कैंप में आया था। खेत्री की ओर, जहाँ बाढ़ के बाद कैंप लगा था। वो अपनी गाड़ी से दवाइयाँ लेकर आया, बच्चों को लाइन में लगाया, पानी के डिब्बे ढोए। पूरे दिन खड़ा रहा। किसी ने नहीं बताया था कि वो कौन है। मुझे भी नहीं। बाद में मालूम हुआ कि उसका बाप वही है।”
“वो कहाँ रहता है?”
सुमन ने कुर्सी पीछे सरकाई और दराज़ से एक पर्ची निकाली। कुछ लिखा, फिर रुकी।
“मन्नू, एक बात पहले।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “वो लड़का अपने बाप जैसा नहीं है। पर वो डरा हुआ है। इतना डरा हुआ कि अगर तुम गलत तरीके से पहुँचे, तो वो दरवाज़ा खोलेगा भी नहीं।”
“मैं काग़ज़ दिखाऊँगा।”
“काग़ज़ नहीं,” उसने कहा। “तुम ये दिखाओ कि तुम उससे कुछ माँगने नहीं आए।”
उसने पर्ची मेरी तरफ़ बढ़ाई।
“खेत्री जाने वाली सड़क पर, पुराने ईंट के भट्ठे से आगे, नीम का पेड़ है। उसके पीछे दो कमरे का मकान। वो वहीं अकेला रहता है। महीने में एक बार भवानी का आदमी उसके पास जाता है। बस।”
मैंने पर्ची जेब में रखी। मुड़ा, फिर रुका।
“सुमन, बंसी बाहर बैठा है। वो कह रहा है —”
“मुझे पता है वो कौन है,” उसने कलम उठाई। “मेरे ससुर का काग़ज़ जिसने बदला था, वो वही है। मैं उससे आज नहीं मिलूँगी। कल अदालत में मिलूँगी।”
मैं बाहर आया। बंसी बेंच पर बैठा बीड़ी सुलगा रहा था, और उसके पास एक और साया खड़ा था — कम्मो। बूढ़ी औरत साड़ी से हाथ पोंछ रही थी।
“तू गया था तो मैं सोचती रही,” कम्मो ने कहा। “हवेली में सेठ की एक बात याद आई। वो कहते थे — हिसाब कभी एक आदमी का नहीं होता। जिस दिन किसी के बेटे ने गवाही दी, उस दिन खाता उसी के नाम चला जाता है।”
मेरे हाथ में पकड़ी रसीद भारी हो गई।
“कम्मो, तुम कह रही हो कि विक्रम के दस्तख़त ने —”
“मैं कुछ नहीं कह रही,” उसने मेरी तरफ़ उँगली उठाई। “मैं साठ साल से देख रही हूँ। जो खाता है, वो अपने हिसाब से चलता है। तू अपना काम कर।”
बंसी ने बीड़ी बुझाई।
“मैं चलता हूँ। सुबह छह बजे अदालत के पिछले दरवाज़े पर।” वो उठा। “तू सूरज से मिलने जा रहा है ना?”
“तुम्हें कैसे पता?”
“क्योंकि तेरी आँखों में वही चमक है जो उस दिन थी जब तूने कहा था — बंसी, हवेली चलो।” उसने साइकिल उठाई। “जा। पर एक बात याद रख। सूरज से मिलते वक़्त उससे ये मत पूछना कि तेरे पापा ने क्या किया। पहले वो अपनी बात कहे।”
मैंने ऑटो पकड़ा। रात के दो बजे ऑटो वाले ने पहले तो मुँह बनाया, फिर सौ का नोट देखकर बैठा लिया। खेत्री की सड़क सूनी थी। ईंट का भट्ठा आया, फिर बंद पड़ी एक फैक्ट्री, और फिर नीम का पेड़।
“यहीं रोक दो,” मैंने कहा।
“साहब, यहाँ आगे कुछ नहीं है।”
“मुझे यहीं उतरना है।”
ऑटो लौट गया। पेड़ के पीछे मकान था — पक्के ईंट का, छोटा, छत पर पुराना टिन का शेड। एक खिड़की में पीली रोशनी जल रही थी। सामने सीढ़ी के नीचे दो जोड़ी चप्पल रखी थीं, जैसे कोई आदत से रखता हो। चारों तरफ़ सन्नाटा था, दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर किसी के उठने की आहट आई, फिर रोशनी बुझ गई।
“कौन?” अंदर से आवाज़ आई। जवान आदमी की आवाज़, पर थोड़ी दबी हुई।
“मेरा नाम मनोहर है। सरकारी अस्पताल में एक्स-रे का काम करता हूँ। सुमन डॉक्टर ने भेजा है।”
“मुझे नहीं मिलना किसी से।”
“मैं तुमसे कुछ माँगने नहीं आया, सूरज।” मैं दरवाज़े के सामने खड़ा रहा। “मैं तुम्हें एक चीज़ दिखाने आया हूँ। बस देख लो, और अगर देखकर भी तुम नहीं खोलना चाहो, तो मैं चला जाऊँगा।”
अंदर देर तक कोई हरकत नहीं हुई। फिर कुंडी की आवाज़ आई और दरवाज़ा थोड़ा खुला। सफ़ेद कुर्ता पहने एक दुबला लड़का खड़ा था, पच्चीस-छब्बीस साल का, आँखों में नींद नहीं, डर था। उसके हाथ में एक छोटा डिब्बा था जिसमें दवाइयाँ थीं।
“क्या दिखाना है?”
मैंने रसीद उसकी तरफ़ बढ़ाई।
उसने देखा। पहले तो समझा नहीं, फिर उसकी उँगली नीचे गवाह वाले नाम पर रुकी और उसका चेहरा बदल गया। उसने काग़ज़ मेरे हाथ से लिया, अंदर की तरफ़ जाती रोशनी में लाया, और धीरे से बैठ गया — दरवाज़े के पास वाली चौकी पर।
“ये मेरा दस्तख़त है,” उसने कहा। न सवाल, न हैरानी। बस बता रहा था।
“तुम्हें पता है?”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno