The Token System – Chapter 174
“हाँ। तेरे पापा का।” बंसी मेरी तरफ़ देख रहा था। “भवानी ने ये काग़ज़ बदलकर अपने नाम करना चाहा था, पर इसमें एक दिक्कत थी। नीचे पढ़ — रोक लगी है। ये काग़ज़ बेचा भी नहीं जा सकता, गिरवी भी नहीं रखा जा सकता। इसे सिर्फ़ एक इंसान खोल सकता है।”
“कौन?”
“जिसका नाम इस पर लिखा है — तेरे पापा।”
मैंने काग़ज़ को करीब से देखा। मोहर के ऊपर एक छोटी सी लकीर थी — दो आड़ी-खड़ी लकीरें, बिंदु के साथ। वही निशान जो टोकन पर था। वही निशान जो पापा की घड़ी पर था।
“तो इसका मतलब,” मैंने धीरे से कहा, “पापा का हवेली पर हक़ आज भी है।”
“हाँ। और इसीलिए भवानी पागलों की तरह घूम रहा है।” बंसी ने कुर्सी पीछे धकेली। “तेरे पापा ने ये काग़ज़ कभी नहीं छोड़ा। इसलिए भवानी ने वो सारा हिसाब तुझ पर लादने की कोशिश की — ताकि काग़ज़ कभी सामने न आए।”
मैं उठा।
“सुबह अदालत,” मैंने कहा। “रसीद साथ लाऊँगा। काग़ज़ साथ लाऊँगा।”
“और विक्रम?”
“वो अस्पताल में है। सुमन उसके पास है। भवानी उसे अपने साथ नहीं ले जा सकता।”
बंसी ने चाय का आख़िरी घूँट लिया और कप धोने लगा।
“मन्नू,” उसने पानी के शोर में कहा, “तेरे पापा ने उस दिन कहा था — बंसी, जिस दिन ये बही खुलेगी, उस दिन मेरा बेटा आएगा। मुझे देखना है कि वो मेरे नाम के आगे क्या लिखता है।”
“और मैंने क्या लिखा है?”
बंसी ने कप रख दिया। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर उसने आवाज़ नहीं बदली।
“तूने अभी कुछ नहीं लिखा,” उसने कहा। “आज सुबह लिखेगा। और मैं चाहता हूँ कि तू मेरे नाम के आगे वही लिखे जो सच है — बीस साल का बेटा खोया हुआ हिसाब।”
मैंने कप खत्म किया। बाहर सड़क पर कुत्ते भौंकने लगे — सुबह की पहली आवाज़।
“बंसी,” मैंने कहा, “चल। दो घंटे बचे हैं।”
“कहाँ?”
“अदालत से पहले एक जगह जाना है।”
“कहाँ?”
“वहाँ जहाँ विक्रम है।”
अस्पताल की लॉबी में सिर्फ़ एक ट्यूबलाइट जल रही थी। बाक़ी अंधेरा। रिसेप्शन पर बैठा आदमी सिर झुकाए सो रहा था। बंसी दरवाज़े पर रुक गया।
“तू अंदर जा,” उसने कहा। “मैं बाहर रुकता हूँ।”
“क्यों?”
“जिससे मिलना है, उससे मेरी नहीं बनती।”
मैं गया। तीसरी मंज़िल पर विक्रम का कमरा था। दरवाज़े पर सुमन बैठी थी, प्लास्टिक की कुर्सी पर, सिर दीवार से टिकाया हुआ। मेरी आहट से आँख खुली।
“तुम?” उसने कहा। “रात के तीन बजे?”
“विक्रम कैसा है?”
“सो रहा है। डॉक्टर ने कहा सुबह तक होश आ जाएगा।” उसने मेरी तरफ़ देखा। “तुम्हारे हाथ में क्या है?”
मैंने लिफ़ाफ़ा दिखाया।
“सुमन, मुझे सच बताओ। विक्रम भवानी के लिए काम करता था?”
वो उठ खड़ी हुई। गलियारे के आख़िर तक चली, फिर पलटी।
“करता था,” उसने कहा। “पर उसने कभी किसी को नुक़सान नहीं पहुँचाया। वो बस काग़ज़ इधर से उधर पहुँचाता था। भवानी उसे पैसे देता था — महीने के पाँच हज़ार। हमारे पास और कोई रास्ता नहीं था।”
“और तुम्हारे पापा?”
“पापा की मौत के बाद भवानी ने खुद हमारे घर आकर कहा था — तुम्हारा बेटा मेरे साथ रहेगा, मैं उसे पढ़ाऊँगा।” उसकी आवाज़ टूटी। “मैंने मना किया था। बहुत मना किया। पर विक्रम ने कहा — अम्मा, यहाँ रोटी नहीं बनती।”
“तुम्हें पता था वो क्या काम करता है?”
“मुझे पूरा नहीं पता था।” उसने हाथ जोड़े। “मन्नू, मैं तुमसे झूठ नहीं बोलूँगी — मुझे इतना पता था कि वो साफ़ काम नहीं है। पर मैंने आँखें बंद कर लीं। माँ थी, तुम बताओ मैं क्या करती?”
मैं कुछ नहीं बोला।
“अब बताओ,” उसने पूछा, “तुम इसे अदालत में ले जाओगे? उसका नाम भी फँसेगा?”
“सच सामने आएगा तो सबका आएगा।”
“तो वो जेल जाएगा।”
“अगर उसने ग़लत किया है तो।”
सुमन दीवार से टिक गई।
“तुम्हारे पापा भी तो सब जानते थे, मन्नू,” उसने धीरे से कहा। “उन्होंने भी तो आँखें बंद रखीं। उन्होंने भी तो कभी अदालत नहीं जाने दिया।”
वो लाइन मेरे सीने में लगी।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। गलियारे के आख़िर में बंसी खड़ा था। वो अंदर आ गया था, चुपचाप, और सब सुन रहा था।
“ये बात सही है,” बंसी ने कहा। “कन्हैया भी डरता था। वो भवानी से पंगा नहीं लेना चाहता था। उसने मुझसे एक बार कहा था — बंसी, मैं इस हवेली से बाहर निकलूँगा, तब साँस लूँगा।”
सुमन ने बंसी की तरफ़ देखा।
“तुम कौन हो?”
“मैं वही हूँ,” बंसी ने कहा, “जिसने तुम्हारे ससुर की ज़मीन का काग़ज़ बदला था।”
सुमन का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“तुम? तुम वो आदमी हो?”
“हाँ।”
“मेरे ससुर तुम्हें गालियाँ देते थे। सालों तक।”
“हक़ था उन्हें,” बंसी ने कहा। “और अब हक़ है तुम्हें भी।”
वो सुमन के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। कमरे में सिर्फ़ मशीन की बीप बज रही थी।
“मैं ये सब ठीक नहीं कर सकता,” बंसी ने कहा। “पर जो मेरे हाथ में है, वो मैं आज सबके सामने रखूँगा। तुम्हारा बेटा जेल जाए या न जाए, ये अदालत तय करेगी। पर भवानी अकेला नहीं बचेगा।”
सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया। वो विक्रम की तरफ़ मुड़ गई और उसके सिर पर हाथ रख दिया।
बाहर आकर बंसी ने मुझे कोने में खींचा।
“अब सुन,” उसने कहा। “जो मैंने तुझे रात में नहीं बताया, वो अब बताता हूँ। मैंने काग़ज़ बदला — ठीक है। मैंने ग़लती की — ठीक है। पर ग़लती सिर्फ़ काग़ज़ तक नहीं थी।”
“क्या मतलब?”
“भवानी ने मुझसे कहा था — बंसी, काग़ज़ बदल दे, तेरे बेटे को नौकरी दिला दूँगा। मैंने काग़ज़ बदल दिया। दो हज़ार रुपये मिले। नौकरी का वादा मिला।” उसने साँस ली। “छह महीने बाद नौकरी मिली — तेरे पापा के खेत पर मज़दूरी नहीं, भवानी के घर में चौकीदारी। मेरा बेटा खुश था। पहली तनख़्वाह से मेरे लिए बीड़ी लाया था।”
“फिर?”
“फिर दो साल बाद।” बंसी की आवाज़ धीमी हो गई। “भवानी के घर में एक हादसा हुआ। मेरा बेटा छत पर गया था — भवानी की बीवी को कुछ चाहिए था। परछत्ती कमज़ोर थी। वो गिर गया।” उसने मुट्ठी भींची। “अस्पताल ले गए। भवानी ने पुलिस को बताया — लड़का गिर पड़ा, हादसा है। और मुझे बुलाकर कहा — बंसी, दुख की बात है। ये पचास हज़ार रख ले। किसी को कुछ मत बताना। तेरे बेटे की नौकरी का हिसाब पूरा हुआ।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“तुमने पैसे लिए?”
“लिए।” उसने सीधे आँखों में देखा। “और आज तक उनमें से एक पैसा खर्च नहीं किया। वो पैसे आज भी ताले में पड़े हैं, उसी लिफ़ाफ़े के नीचे। मैं उन्हें किसी को देना नहीं चाहता। जब मरूँगा, तो मेरी बीवी को नहीं पता चले — पर वो पैसे मेरे साथ जलेंगे। बस।”
उसकी आँखें भर आईं। उसने हथेली से चेहरा पोंछा, पर आवाज़ नहीं रोकी।
“मैं बीस साल से उन दो हज़ार के नीचे दबा हुआ हूँ, मन्नू,” उसने कहा। “हर बार जब तेरे पापा की बही खोलता था, मेरा नाम ऊपर दिखता था। मैं सोचता था — कन्हैया मुझे क्या लिखेगा? एक शब्द लिखेगा — कायर। पर वो नहीं लिखा। वो नहीं लिखा, क्योंकि वो सब जानता था। वो जानता था कि मैंने पैसे के लिए नहीं, अपने बेटे के लिए किया था।”
“बंसी —”
“रुक।” उसने मेरा हाथ पकड़ा। “आख़िरी बात। भवानी ने जो पचास हज़ार दिए थे, उस वक़्त मुझे एक काग़ज़ पर दस्तख़त करने पड़े थे। उसने कहा था — ये रसीद है, कि तूने पैसे ले लिए और कोई शिकायत नहीं।”
मैं रुका।
“तो वो रसीद कहाँ है?”
बंसी ने जेब से एक मुड़ा हुआ काग़ज़ निकाला। पुराना, पीला, किनारों से फटा हुआ। उसने मेरे हाथ में रख दिया।
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