The Token System17 / 1154

The Token System – Chapter 17

6 min read November 6, 2026

शेखर बाबू का चेहरा वैसे ही रहा, पर उनकी उँगली दरवाज़े के किनारे पर काँपी।

"ये सब पुराना रिकॉर्ड है," उन्होंने धीमे से कहा। "बिना आदेश नहीं निकलेगा। तुम क्लर्क हो? नहीं। तुम एक्स-रे वाले हो। अपने कमरे में जाओ।"

"आदेश है।"

"किसका?"

"डॉक्टर सुमन का।"

शेखर बाबू हँसे। एक छोटी सी हँसी, जैसे किसी पुरानी आदत से निकली हो। "सुमन मैडम इमरजेंसी की हैं। रिकॉर्ड उनका विभाग नहीं।"

"अभी उनका ही विभाग है," मैंने कहा। "उस बच्चे का केस — जो खेत्री से आया था, बुख़ार में तपता हुआ। उसका काग़ज़ इसी रिकॉर्ड में दर्ज है। और उस काग़ज़ के साथ एक पीला काग़ज़ भी है, जिस पर ठाकुर के नर्सिंग होम का नाम लिखा है।"

शेखर बाबू का चेहरा सफ़ेद पड़ा। उन्होंने दरवाज़ा पूरा खोला, फिर बाहर गलियारे में झाँका — दाएँ, बाएँ — और मुझे अंदर खींच लिया।

"चिल्लाओ मत," उन्होंने फुसफुसाया।

कमरे में धूल की महक थी, पुराने काग़ज़ की महक थी, और उसके ऊपर चाय की बासी महक। तीन दीवारें, ऊपर तक अलमारियाँ, हर अलमारी में फ़ाइलों के बंडल — रस्सी से बँधे, कुछ खुले, कुछ पर धूल की सफ़ेद परत।

"सुनो," शेखर बाबू मेरे सामने आकर खड़े हुए। "तुम्हें किसी ने भेजा है। किसने भेजा?"

"किसी ने नहीं भेजा।"

"झूठ।"

"आप झूठ पकड़ते हैं?" मैंने पूछा। "अच्छा। फिर बताइए — उस दिन खेत्री में, छोटू के घर के बाहर, सबसे पहले कौन खड़ा था? मुझे बताया गया है कि सबसे पहले आप थे।"

शेखर बाबू का मुँह खुला रह गया। वो पीछे हटे, कुर्सी की तरफ़, और उसकी बाहु पकड़कर रुक गए, जैसे अचानक कमज़ोर पड़ गए हों।

"किसने कहा?"

"जिसने देखा।"

"वो औरत झूठ बोलती है," उन्होंने तेज़ी से कहा। "उसका दिमाग़ ठीक नहीं। बेटा मर गया तो…"

"बेटा मर गया या मरवाया गया?" मैंने कहा।

कमरे में चुप्पी। इतनी कि ऊपर की बत्ती की गुनगुनाहट सुनाई देने लगी।

शेखर बाबू ने चश्मा उतारा, आँखें मलीं, फिर लगाया। मुझे लगा वो कुछ कहेगा — कोई सफ़ाई, कोई झूठ। पर उन्होंने बस इतना कहा, "तुम जाओ। मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सकता।"

"ठीक है," मैंने कहा और पलट गया। "मैं डॉक्टर सुमन को बोलता हूँ कि रिकॉर्ड कमरे से उस बच्चे की फ़ाइल ग़ायब है। और साथ में यह भी बोलता हूँ कि फ़ाइल के साथ एक पीला काग़ज़ था, जिस पर ठाकुर का नर्सिंग होम लिखा था, और वो काग़ज़ भी ग़ायब है। फिर देखते हैं, शिकायत ऊपर जाती है या नहीं।"

मैं दरवाज़े तक पहुँचा। मेरा हाथ कुंडी पर था।

"रुको।"

मैं रुका, पर पलटा नहीं।

"तुम्हें क्या चाहिए?"

"काकी का ज़मीन का काग़ज़। रामगंज पुरानी गली। तीन साल पहले का।"

"वो मेरे पास नहीं है।"

मैंने कुंडी खोलनी शुरू की।

"रुको, रुको!" शेखर बाबू दौड़कर आए। "मेरे पास है — पर पुराने बंडल में है। मुझे ढूँढने दो।"

वो अलमारी की तरफ़ गए, दूसरी सीढ़ी खींची, चढ़े, ऊपर के खाने से रस्सी से बँधा एक बंडल निकाला। धूल झाड़ी। रस्सी खोली। उँगली चलाई — काग़ज़ दर काग़ज़। कुछ देर लगी।

"ये," उन्होंने कहा और एक पीला, मुड़ा हुआ काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।

मैंने लिया। खोला।

ऊपर लिखा था — ज़मीन का काग़ज़। नाम — काकी। उम्र — सत्तर। गाँव — रामगंज। और नीचे, जो लिखा था, वो मेरे हाथ को काँपने पर मजबूर कर गया। काग़ज़ के आख़िरी कोने पर, एक अलग स्याही में, एक अलग लिखाई में, एक लाल निशान था — और उसके नीचे दो शब्द — "काकी का बेटा।"

हटा दिया। मिटा दिया। किसी ने पेन से काटा था, पर निशान बाकी था।

मैंने शेखर बाबू की तरफ़ देखा।

"ये निशान क्या है?"

"पुराना है।" उन्होंने नज़र चुराई। "फ़ाइल में भी रद्दी निशान होते हैं।"

"ये रद्दी निशान नहीं है," मैंने कहा और उँगली उस पर रखी। "ये किसी का नाम है। किसका?"

"मुझे नहीं पता।"

"आपको पता है।"

शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। पहली बार। सीधा। उनकी आँखों में डर था — और उस डर के पीछे कुछ और भी था। जैसे कोई बोझ जो वो उठाए हुए था और अब उतारना चाहता था, पर उतारने की हिम्मत नहीं थी।

"तुम्हें ये काग़ज़ ले जाना है?" उन्होंने पूछा।

"हाँ।"

"तो ले जाओ।" उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और काग़ज़ उसी में दबा दिया। "पर एक बात — ये काग़ज़ जिसको दोगे, उससे कहना कि ये काग़ज़ दिखाए नहीं। किसी भी दफ़्तर में नहीं। किसी भी कचहरी में नहीं।"

"क्यों?"

"क्योंकि इस काग़ज़ पर अंगूठा नहीं है। देखो।"

मैंने देखा। नीचे की तरफ़, जहाँ गवाह के अंगूठे की जगह होती है — खाली। सिर्फ़ एक चौकोर छाप, पुरानी स्याही में, जो अब हल्की पड़ गई थी।

"काकी के बेटे ने अंगूठा लगाया था," शेखर बाबू ने धीमे से कहा। "पर नीचे आख़िरी गवाह का अंगूठा किसी ने लिया ही नहीं। काग़ज़ अधूरा है।"

"तो?"

"तो इससे ज़मीन नहीं बचेगी। इससे सिर्फ़ ये साबित होगा कि ज़मीन कभी थी।"

मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा। "फिर इसका फ़ायदा क्या?"

"अभी नहीं। पर जब बही खुलेगी — तो ये काग़ज़ बही से जुड़ेगा। बही में हर नाम के आगे एक तारीख़ है। और इस काग़ज़ पर भी एक तारीख़ है। मिला देना।"

मैंने काग़ज़ फिर निकाला और तारीख़ देखी। तीन साल पहले की एक तारीख़। एक उँगली से ढकी जा सकती थी।

"आपने ये क्यों छुपाया?" मैंने पूछा।

शेखर बाबू ने जवाब नहीं दिया। मुझे लगा वो कुछ कहेगा, पर वो गए और अपनी कुर्सी पर बैठ गए, और फ़ाइलों की तरफ़ देखने लगे — जैसे मैं वहाँ था ही नहीं।

मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।

"मनोहर।"

मैं रुका।

"तुम जहाँ जा रहे हो — वहाँ आसान रास्ता नहीं है।"

"पता है।"

"नहीं, तुम्हें नहीं पता।" उन्होंने चश्मा ठीक किया। "तीन साल पहले मैंने अपनी आँखों से देखा था। मैं खड़ा था। बस खड़ा था। किसी ने मुझसे कुछ नहीं पूछा और मैंने कुछ नहीं किया। इतना ही। और आज तीन साल बाद भी मैं उसी कमरे में खड़ा हूँ।"

कमरा चुप था।

"मैं गवाही दूँगा," शेखर बाबू ने कहा। "पर अभी नहीं। मेरी बेटी का सवाल है।"

"उसकी भी सुनेंगे," मैंने कहा।

दरवाज़ा खोला और बाहर निकल गया। गलियारे में चलते-चलते मुझे पीछे से आवाज़ आई — चीज़ें समेटने की, दराज़ बंद करने की। मैंने मुड़कर नहीं देखा।

सीढ़ियाँ उतरते हुए मेरी जेब में टोकन ठंडा था। एक लम्बी साँस छोड़ी। हाथ में काग़ज़ था — काकी का काग़ज़। पहली बार कुछ ऐसा हाथ में था जो अधूरा होकर भी पूरा था।

बाहर निकला तो सामने वही चायवाला — कर्मचारियों के कमरे के पास वाला, भाई। उसने कहा, "मन्नू भाई, साहब बुला रहे थे।"

"कौन साहब?"

"शेखर बाबू।"

"अभी आया हूँ उनके पास से।"

"नहीं, फ़ोन पर।" उसने कंधा उचकाया। "फ़ोन किया था। मुझसे कहा कि मन्नू आए तो भेज देना। मैंने कहा आ गए हैं।"

मैं कुछ देर खड़ा रहा। फिर समझ आया।

शेखर बाबू ने मुझे अंदर बुलाया नहीं था। उन्होंने मुझे अपने आप आने दिया। उन्हें पहले से पता था कि मैं आने वाला हूँ।

वो फ़ोन ऊपर से किया गया था — अंदर जाने से पहले नहीं, आज सुबह।

मैंने काग़ज़ अपनी जेब में अच्छी तरह दबाया और रामगंज की तरफ़ चल पड़ा। ऑटो में बैठते हुए मेरा हाथ जेब पर था — काग़ज़ पर, टोकन पर। दोनों एक साथ।

रास्ते में बंसी का फ़ोन आया। "क्या हाल?"

"मिल गया।"

बंसी ने सीटी बजाई। "मिल गया? यानी शेखर ने दिया?"

"दिया। और मुझे लगता है उसने दिया इसलिए कि वो खुद इस काग़ज़ से छुटकारा पाना चाहता था।"

"यानी डर है उसे।"

"बहुत।"

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