The Token System – Chapter 169
इस बार तहख़ाने का दरवाज़ा खुला था, जैसे किसी ने पहले से खोल रखा हो।
“देख,” बंसी ने फर्श पर एक लकीर देखी। ताज़ा लकीर नहीं थी। किसी ने पैर घसीटा था। चलने का निशान नहीं — घसीटने का।
हम नीचे उतरे।
तिजोरी वहीं थी, दीवार के साथ। मैंने पहले देखी थी, दो ताले, दो खाँचे। उस वक़्त मुझे इनका मतलब नहीं पता था। अब पता था।
पर तिजोरी के ऊपर, दीवार पर वही तीन खाँचे थे। तीन। मैंने गिन लिया। पहले मुझे दो दिखे थे, क्योंकि मैंने धूल में देखा था। अब साफ़ था — तीसरा खाँचा उनके बीच में था, गोल, छोटा।
मैंने जेब से मेरा टोकन निकाला। बंसी ने पूछा, “तू क्या कर रहा है?”
“देखना है, क्या होता है।”
मैंने मेरा टोकन पहले खाँचे में रखा। पत्थर हिला, गरारा आवाज़ आई, पर कुछ नहीं खुला। फिर भवानी का दूसरे में रखा — दीवार और भी काँपी, पर तीसरे के बिना सब बेकार।
“तीसरा नहीं है,” बंसी ने कहा। “बसवा वाले ने जला दिया था।”
“शायद पूरा नहीं जला,” मैंने कहा।
मैंने चारों तरफ़ देखा। फर्श पर पुरानी ईंटें, कोने में एक टूटा घड़ा, और उस घड़े के अंदर — सूखी राख। मैंने हाथ डाला, तो नीचे से एक छोटी सी पीतल की डिबिया निकली। वो जली नहीं थी, बस काली पड़ गई थी। उसे खोला तो अंदर एक आधा पिघला टुकड़ा था — टोकन के आकार का, पर तीसরের आकार का।
“आधा है,” बंसी ने कहा। “आधा टोकन, आधा किस्सा।”
“पर है तो सही।”
मैंने वो आधा टुकड़ा तीसरे खाँचे में रखा।
दीवार ने एक बार ज़ोर से कंपन किया — तेज़, सीधी आवाज़। पत्थरों के बीच से पीली रोशनी फूटी, और अंदर का हिस्सा खुल गया। बीच में एक और तिजोरी थी — बसवा की। उस पर दो ताले थे, और दोनों में चाबी लगी हुई थी।
मैंने एक चाबी घुमाई। दूसरी घुमाई। ढक्कन उठा।
अंदर से एक काग़ज़ निकला — सिर्फ़ एक। और उसके साथ एक लिफ़ाफ़ा, जिस पर लिखा था, “जो इसे खोलेगा, वो बसवा का हिस्सा लेगा। पर पहले सबको बताएगा।”
मैंने काग़ज़ खोला। उस पर सिर्फ़ एक तरफ़ का रास्ता था, खेत के नाम, दो गवाहों के नाम। दादा का नाम नहीं था, भवानी के बाप का नहीं। सिर्फ़ एक नाम — बसवा का।
पर गवाहों में मेरा नाम भी था। लिखा था — “मन्नू, हवेली का बेटा”।
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। वो भी देख रहा था।
“कब लिखा?” मैंने पूछा।
“इस लिखावट से लगता है आज नहीं। महीनों पुराना।”
“तो मेरा नाम कैसे?”
बंसी ने कुछ नहीं कहा।
तभी ऊपर सीढ़ियों से आवाज़ आई। पैरों की आवाज़। एक व्यक्ति नीचे उतर रहा था, धीरे-धीरे, जैसे जानबूझकर।
मैंने काग़ज़ सीने से लगाया और सीढ़ी की तरफ़ देखा।
धूल में एक जूता दिखा — चमड़े का, साफ़। फिर पैंट। फिर कुर्ता।
रोशन लाल।
“किसी ने बुलाया नहीं,” उसने कहा। “पर मैं आ गया।”
उसके हाथ में एक छोटी पीतल की डिबिया थी — तीसरे टोकन जैसी, पर पूरी, जली हुई नहीं।
बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। रोशन ने डिबिया खोली — अंदर एक पूरा टोकन। उसने उसे हवा में उठाया।
“ये मेरे मामा ने मुझे दिया था,” उसने कहा। “मरने से पहले। बोले थे — जब मन्नू आए, तब खोलना।”
मेरी साँस रुक गई।
रोशन ने टोकन मेरी तरफ़ बढ़ाया। “मामा ने कहा था — जिस दिन ये हवेली खुले, उस दिन सच्चाई भी खुलेगी। और सच्चाई तुम्हारे दादा की नहीं, तुम्हारे पिता की है।”
मैंने टोकन लिया। हाथ में आते ही वो गरम हुआ — गरम, जैसे बसवा के बच्चे की गोद।
बंसी ने पूछा, “मेरे पिता के बारे में क्या सच है?”
रोशन ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी। “ये सीढ़ी चढ़कर बताता हूँ। यहाँ नहीं।”
वो पलटा और सीढ़ी चढ़ने लगा। मैं उसके पीछे था। बंसी सबसे पीछे।
तभी ऊपर से एक आवाज़ आई — साफ़, तेज़, जानी-पहचानी।
“रुक जा भवानी। तेरे पीछे पुलिस खड़ी है।”
हम तीनों रुक गए।
बंसी की आवाज़ थी — पर बंसी मेरे पीछे खड़ा था, मेरी आँखों के सामने। उसने भी मेरी तरफ़ देखा।
ऊपर आवाज़ फिर आई — वही आवाज़, हूबहू — “रुक जा भवानी। तेरे पीछे पुलिस खड़ी है।”
मैंने ऊपर देखा।
सीढ़ी के ऊपर भवानी खड़ा था — हाथ पीछे बँधे, पर खुला, आज़ाद — और उसके पीछे… मैंने आँखें सिकोड़ीं।
राजेंद्र था। सिर्फ़ राजेंद्र नहीं — दो सिपाही, और एक सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी, झुकी हुई लाइट हाथ में लिए।
और भवानी पुलिस के सामने नहीं था। भवानी के पीछे, बिल्कुल उसके पीछे, आधे अँधेरे में खड़ा था — मेरा दादा।
नहीं। धूल हटी। चेहरा साफ़ हुआ।
वो राजेंद्र था। बिल्कुल राजेंद्र। पर मैंने कल रात उसे थ
॥
मैंने आँखें मली। धूल थी, ऊपर की लाइट आधी बंद थी, और सीढ़ी के ऊपर वो चेहरा — अब साफ़ दिख रहा था। राजेंद्र। पीछे दो सिपाही, एक हाथ में लालटेन। भवानी उनके बीच खड़ा था, हाथ सामने, कलाई पर कोई कुछ नहीं — बस खुला, आज़ाद, जैसे बुलाया गया हो, पकड़ा नहीं गया हो।
“नीचे आ जाओ,” राजेंद्र ने कहा। “सब नीचे।”
भवानी सीढ़ी उतरने लगा। उसके जूते की आवाज़ तहख़ाने में गूँज रही थी, धीरे-धीरे, जैसे हिसाब गिन रहा हो। मेरे हाथ में तीन टोकन थे — अपना, भवानी का, और रोशन का दिया हुआ तीसरा। मैंने तीनों पोटली में लपेटकर कमर से बाँध लिए।
राजेंद्र नीचे आया। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरे सीने से चिपके काग़ज़ की तरफ़।
“जो मिला है, सब मेज़ पर रखो,” उसने कहा।
मैंने काग़ज़ और लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा। बंसी ने भी अपनी जेब से एक-दो पुरानी पर्चियाँ निकालकर रख दीं। राजेंद्र ने एक-एक उठाकर देखा, फिर भवानी की तरफ़ बढ़ाया।
“ये क्या है?”
भवानी ने काग़ज़ पर नज़र डाली। उसके चेहरे पर कुछ नहीं बदला। “मेरी हवेली है,” उसने कहा। “मेरे पुरखों का काग़ज़ है। जो मेरे घर का है, वो मेरे हाथ में रहेगा।”
“ये तिजोरी हवेली की है,” राजेंद्र ने कहा। “और तिजोरी हवेली के साथ जाती है। हवेली किसकी है, ये अदालत तय करेगी। अभी ये काग़ज़ सरकार के कब्ज़े में जाएँगे।”
उसने हाथ बढ़ाया। मैंने काग़ज़ों का बंडल उसकी तरफ़ सरकाया। राजेंद्र ने बंडल खोला — उसमें एक मोटी मैली बही थी, कुछ पुरानी रसीदें, और एक लिफ़ाफ़ा जिस पर मोम लगी थी।
राजेंद्र ने बही का पहला पन्ना पलटा। दूसरा। तीसरा। उसकी आँखें तेज़ी से चल रही थीं। फिर वो रुका। उँगली एक लाइन पर टिकी रह गई। उसने ऊपर देखा — पहले भवानी को, फिर मुझे।
“ये बही तो…” उसने आवाज़ धीमी की। “ये तो हिसाब की बही है। नाम हैं, साल हैं, रकम हैं। किसकी ज़मीन कब ली, किसके नाम पर कब लिखी, कितने पैसे ऊपर चढ़े…”
“हरि सिंह की लिखाई है,” बंसी ने कहा। “मैंने ये लिखाई तहसील में देखी है।”
भवानी ने कदम आगे बढ़ाया। “एक काग़ज़ मिला है, उससे कहानी मत बना लो। मेरे दादा ज़मीन का काम करते थे। हिसाब रखना उनका काम था।”
राजेंद्र ने बही के पन्ने पलटते हुए पढ़ा — “साल… बारह साल पहले… श्रीराम जाट की ज़मीन… बेटे साजन के अँगूठे से… सात बीघा… भवानी सिंह के नाम…”
उसकी आवाज़ रुक गई।
“ये तो वही काग़ज़ है,” उसने कहा, “जो तुम मुझे थाने में दिखा रहे थे। इसका दूसरा हिस्सा। यहाँ हरि सिंह ने खुद लिखा है — ‘अँगूठा लिया, असली रकम नहीं दी, अगर बोले तो डराना।’”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने अपनी साँस रोक ली।
राजेंद्र आगे पढ़ता गया। “तीस साल पहले… कम्मो देवी के पति की ज़मीन… पाँच बीघा… दस्तख़त बदले… और…” वो फिर रुका। “और यहाँ लिखा है — ‘बेटे सोमनाथ का हिस्सा मिटाया, उसके हाथ से बाप की डायरी छीनी।’”
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