The Token System – Chapter 157
बंसी ने साइकिल का हैंडल पकड़ा और मुझे देखा।
“अब?” उसने पूछा।
“अब सीधा तहसील। नौ बजे से पहले।”
“और वो काग़ज़? जो जलता नहीं?”
“वो हवेली में है। पर पहले मुझे ये जानना है कि हरि सिंह ने हवेली के नाम पर क्या-क्या दर्ज करवा रखा है। तहसील के पुराने रजिस्टर में सब लिखा होगा।”
बंसी ने साइकिल घुमाई। “मैं साथ चलूँ?”
“तू अस्पताल जा। सुमन के पास। अगर भवानी वहाँ कुछ करने की कोशिश करे, तो मुझे फ़ोन कर।”
“और तू अकेला?”
“अकेला नहीं।” मैंने जेब में हाथ डाला। टोकन ठंडा था, बस एक पल के लिए जैसे हल्का-सा गुनगुना हुआ और फिर ठंडा। “ये साथ है।”
बंसी ने कुछ नहीं कहा। वो साइकिल पर बैठा और पैडल मारकर गली के मोड़ पर मुड़ गया। मैंने अपनी घिसी हुई शर्ट की कॉलर ठीक की और ऑटो पकड़ा।
तहसील का दफ़्तर सुबह सात बजे खुलता है। मैं सवा सात बजे पहुँचा। सामने लोहे का बड़ा फाटक, अंदर पीली इमारत, बरामदे में कुर्सियाँ अभी उलटी पड़ी थीं। एक चपरासी झाड़ू लगा रहा था।
“काम क्या है?” उसने पूछा।
“पुराने रिकॉर्ड देखने हैं। हवेली के।”
“रिकॉर्ड कमरा नौ बजे खुलेगा। बाबू आएँगे तब।”
मैंने उसकी जेब में पचास का नोट डाला। “कमरा दिखा दे। बाबू आने से पहले मैं देख लूँ, फिर उनसे मिल लूँगा।”
वो नोट देखकर मुस्कुराया और आगे चल पड़ा। पीछे की तरफ़ एक छोटा कमरा था, जिसका दरवाज़ा ज़ंग खाई कुंडी से बंद था। चपरासी ने कुंडी खोली। अंदर अंधेरा था, धूल की महक आ रही थी। खिड़की की एक फटी सी झिल्ली से आधी रोशनी आ रही थी।
दीवार के साथ-साथ लोहे के रैक थे, जिन पर मोटे-मोटे भूरे रजिस्टर बँधे पड़े थे। कुछ के कवर फटे हुए थे, कुछ पर जाला लगा था।
“हवेली का पुराना नंबर क्या है?” मैंने पूछा।
“तीन सौ सत्ताईस।” चपरासी ने कहा। “पुराने काग़ज़ों वाला रैक कोने में है। पर बाबू कहते हैं कि उस रैक को कोई छूता नहीं।”
“क्यों?”
“पता नहीं।”
वो चला गया। मैंने कोने वाले रैक की तरफ़ बढ़कर ऊपर से नीचे तक उँगली फेरी। धूल में उँगली की लकीरें बन रही थीं। फिर मुझे वो रजिस्टर दिखा — भूरी जिल्द, सुनहरे अक्षरों में कुछ लिखा था जो अब मिट चुका था। मैंने उसे खींचा। भारी था।
मैंने उसे मेज़ पर रखा और पन्ने पलटने लगा। पुराने पन्ने, पीले, कुछ जगह स्याही फैली हुई। तारीख़ें साठ साल पुरानी। नाम, ज़मीन के टुकड़े, मोहरें।
फिर मेरे हाथ रुक गए।
एक पन्ने पर लिखा था — “हवेली नंबर तीन सौ सत्ताईस। मालिक: सेठ गोवर्धनदास।” और उसके नीचे, दूसरी स्याही में, किसी और के हाथ से — “हस्तांतरण: हरि सिंह।”
तारीख़ थी — इसी महीने की, साठ साल पहले।
पर ज़मीन का हिस्सा बेचा नहीं गया था। “हस्तांतरण” शब्द के नीचे एक और लाइन थी, जो बहुत छोटी लिखाई में थी — “मालिक की मृत्यु के बाद, नामांकित व्यक्ति को, बकाया हिसाब चुकाने तक।”
मैंने उँगली उस लाइन पर रखी और दो बार पढ़ा।
“बकाया हिसाब चुकाने तक…” मैंने धीरे से कहा।
यानी हवेली हरि सिंह को मिली थी, पर पूरी नहीं। कुछ बकाया था। और वो बकाया क्या था, ये अगले पन्ने पर लिखा होगा।
मैंने अगला पन्ना पलटा।
वहाँ एक औरत का नाम था — “कम्मो देवी। नौकरानी। हवेली, तीन सौ सत्ताईस। मृत्यु: साठ साल पहले।”
और उसके आगे, ब्रैकेट में, एक लाइन — “हिसाब: पंद्रह।”
मेरा हाथ रुक गया। कम्मो। वही नाम जो बूढ़ी औरत ने बंसी की दुकान पर बताया था। सेठ गोवर्धनदास के घर की आख़िरी नौकरानी।
पर यहाँ तो लिखा था — मृत्यु। साठ साल पहले।
तो जो औरत मुझे मिली, वो कौन थी?
मैंने पन्ना उलटकर देखा। पीछे की तरफ़ एक और लाइन थी, जो बहुत फीकी थी, जैसे बाद में जोड़ी गई हो — “कम्मो की मृत्यु दर्ज नहीं। जीवित। पता अज्ञात।”
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
“दर्ज नहीं…”
मतलब किसी ने उसे मरा हुआ दिखाया था, पर वो ज़िंदा थी। और शायद आज भी ज़िंदा है। वही बूढ़ी औरत, जो बंसी की दुकान पर आई थी, जो हवेली की चादर लाई थी, जिसने खुद को सेठ की नौकरानी बताया था — वो कम्मो थी।
तभी पीछे से पैरों की आहट आई।
मैंने रजिस्टर बंद किया और पलटा। दरवाज़े पर वही बूढ़ा आदमी खड़ा था — सफ़ेद दाढ़ी, झुकी कमर, हाथ में लाठी। वही जो हवेली में भवानी के साथ था।
उसके हाथ में एक पीतल का डिब्बा था। वही डिब्बा जो हवेली की मेज़ पर लाल कपड़े में लिपटा था।
वो अंदर आया और डिब्बा मेज़ पर रख दिया। फिर बिना पूछे सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया।
“बैठ जा, बेटा।” उसने कहा। आवाज़ खुरदरी थी, जैसे सालों से किसी ने उससे बात न की हो।
“आप कौन हैं?” मैंने पूछा।
“नाम से क्या? ठाकुर साहब ने भेजा है।”
“भवानी सिंह यहाँ खुद क्यों नहीं आया?”
“वो व्यस्त है।” बूढ़े ने डिब्बे की तरफ़ इशारा किया। “उसने कहा है — चाबी दे, काग़ज़ दे। बदले में विक्रम सुबह छह बजे नहर के पुल से लौट जाएगा। सही-सलामत।”
मैंने डिब्बे को देखा। ताला छोटा था, पीतल का ही। ऊपर की तरफ़ एक खरोंच थी, जैसे किसी चीज़ से रगड़ी गई हो।
“और अगर मैं न दूँ?”
बूढ़ा मुस्कुराया। उसके दाँत कुछ-कुछ गिरे हुए थे।
“तो वो लौटेगा नहीं।” उसने कहा। “और तेरे पास सुबह नौ बजे तक का वक़्त है। अभी सवा आठ बजे हैं।”
मैंने सोचा। मन में गिनती चल रही थी — तीन सौ सत्ताईस, कम्मो, हिसाब पंद्रह, विक्रम, डिब्बा।
“काग़ज़ मेरे पास नहीं है,” मैंने कहा। “चाबी हवेली में है।”
“झूठ मत बोल, बेटा।” बूढ़े ने लाठी टिकाई। “तेरे बाप ने सब कुछ हवेली में छिपाया था। तू जानता है। और तेरे पास जो है—” उसने मेरी जेब की तरफ़ आँख से इशारा किया। “—वो भवानी साहब के बाप का है।”
मैं एक पल के लिए रुका।
“हरि सिंह का?”
“हाँ। उसका।” बूढ़े ने कहा। “वो चीज़ हमारे साथ चली आई है। और अब तेरे पास है।”
मैंने अपने आप को सँभाला। जेब में हाथ डाला और टोकन निकाला। उसे हथेली पर रखकर बूढ़े के सामने किया।
“ये?”
बूढ़े की आँखें चमकीं। वो आगे झुका। पर मैंने टोकन वापस जेब में डाल दिया।
“ये मेरे पापा का है,” मैंने कहा। “हरि सिंह का नहीं।”
“तेरे पापा का?” बूढ़ा हँसा। “तेरे पापा तो हवेली के माली थे। उनके पास ये कहाँ से आया?”
“यही तो मैं भी सोच रहा हूँ।” मैंने कहा। “और अब जवाब मिल गया। हरि सिंह ने मेरे पापा को ये दिया था। शायद हिसाब के तौर पर।”
बूढ़े का चेहरा बदला। वो उठ खड़ा हुआ। उसने डिब्बा उठाया।
“वक़्त नहीं है, बेटा।” उसने कहा। “नौ बजे तक का।”
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। फिर रुका। मेरी जेब की तरफ़ इशारा किया।
“तेरे पास जो है,” उसने कहा, “वो भवानी साहब के बाप का है। और जो भवानी साहब का है, वो वापस भवानी साहब को ही मिलेगा। चाहे एक दिन लगे या सौ साल।”
वो बाहर निकल गया। उसकी लाठी की आवाज़ दूर तक सुनाई दी — टक, टक, टक।
मैं कमरे में अकेला रह गया। मेज़ पर रजिस्टर खुला था। मैंने दोबारा उस पन्ने पर नज़र डाली जहाँ कम्मो का नाम था।
“कम्मो देवी। नौकरानी। जीवित। पता अज्ञात।”
मैंने रजिस्टर बंद किया और रैक पर वापस रख दिया। फिर बाहर निकला। बरामदे में सुबह की धूप फैल रही थी। मैंने ऑटो पकड़ा और अस्पताल की तरफ़ चल पड़ा।
रास्ते में मेरा फ़ोन बजा। बंसी।
“कहाँ है तू?” उसकी आवाज़ हाँफ रही थी।
“तहसील से निकला। अस्पताल आ रहा हूँ।”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno