The Token System – Chapter 137
राजेंद्र आगे आया। "सोमू, तू यहाँ क्या कर रहा है?"
"मुझे बाबा ने बुलाया था। फ़ोन आया था — कहा, हवेली आ जा, तेरे पापा का हिसाब निकल रहा है।" उसने बूढ़े की तरफ़ देखा। "मुझे नहीं पता था कि बाबा ये हैं। मुझे लगा कोई दलाल है।"
माँ ने मेरी कलाई छोड़ी और सोमू की तरफ़ बढ़ी। "तुम्हारा नाम सोमू है?"
"हाँ। सोमनाथ। लोग सोमू कहते हैं।"
माँ ने उसका चेहरा गौर से देखा। "तुम्हारी माँ का नाम क्या था?"
सोमू चौंका। "कमला। पर वो मुझे छोड़कर चली गई थीं जब मैं छोटा था। मुझे मेरे मामा ने पाला।"
माँ ने आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई पुराना दर्द याद आ गया हो। फिर उसने आँखें खोलीं और बोली, "तेरे पापा ने तुझे नहीं छोड़ा था। तुझे उनसे दूर किया गया था।"
सोमू हिल गया। "किसने?"
"उसी ने जिसने उस रात सबका हिसाब बिगाड़ा था।" माँ ने लालाजी की तरफ़ देखा।
लालाजी ने हाथ उठाए। "मैं नहीं — मेरे बाप —"
"तेरे बाप ने ही सोमू को उसके मामा के पास भेजा था," बूढ़े ने कहा। "ये बात मुझे आज तक नहीं पता थी। मुझे लगता था कि मेरा बेटा कहीं खो गया। इसीलिए मैं तीस साल से हवेली के पीछे भाग रहा था।"
सोमू ने अपना मोबाइल जेब में रखा। "तो आप मेरे पापा हैं?"
बूढ़े ने सिर हिलाया। उसकी आँखों से पानी बह रहा था। "हाँ।"
सोमू ने एक लंबी साँस ली। "और मुझे ये सब आज रात पता चल रहा है, उस हवेली में जिसे मैं हमेशा से बंद देखता आया?"
"हिसाब का वक़्त आ गया था," राजेंद्र ने कहा। "ठाकर साहब ने यही चाहा था।"
तभी मुझे कुछ याद आया। मैंने पोटली से टोकन निकाला। अब वो ठंडा नहीं था — गरम था, हल्का सा। मैंने उसे ऊपर उठाया। टोकन पर लिखा नाम साफ़ दिख रहा था — और वो नाम सोमनाथ था।
राजेंद्र ने टोकन देखा और फुसफुसाया, "तो दूसरा टोकन उसका था।"
"मतलब?" मैंने पूछा।
"मतलब ये कि ठाकर साहब ने दो टोकन छोड़े थे — एक तेरे नाम, एक उसके नाम। और दोनों एक ही जगह हैं। इसीलिए वो बूढ़ा चाहता था कि दोनों टोकन मिलें।"
सोमू ने मेरी तरफ़ देखा। "तुम मन्नू हो?"
"हाँ।"
"मुझे फ़ोन पर किसी ने कहा था कि मन्नू के पास मेरा हिस्सा है। मैं उसे लेने आया था।"
मैंने टोकन उसकी तरफ़ बढ़ाया। "ये तुम्हारा है।"
सोमू ने हाथ बढ़ाया, पर तभी हवेली के बाहर से एक तेज़ आवाज़ आई — किसी चीज़ के टकराने की, और फिर पुलिस की सीटी।
सब दरवाज़े की तरफ़ भागे। बाहर गली में दो पुलिस की गाड़ियाँ खड़ी थीं, और सामने वाले मोड़ से लोग जुट रहे थे। राजेंद्र ने अपनी वर्दी ठीक की और बाहर निकला।
"क्या हुआ?" उसने पूछा।
एक सिपाही आगे आया। "साहब, पीपल के नीचे एक आदमी मिला है। बेहोश है। सिर पर चोट है।"
मैं दौड़कर गया। पीपल के नीचे, ज़मीन पर, वही अजनबी बूढ़ा पड़ा था — पर ये वही बूढ़ा नहीं था जो हवेली में था। ये कोई और था। उसके हाथ में एक काग़ज़ था जो उसने कसकर पकड़ा हुआ था।
राजेंद्र ने काग़ज़ निकाला और पढ़ा। उसका चेहरा उतर गया।
"क्या है?" मैंने पूछा।
राजेंद्र ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये तेरे पापा की लिखाई है। और इसमें लिखा है — 'अगर मैं मर जाऊँ, तो ये काग़ज़ उस आदमी को देना जो पीपल के नीचे मिलेगा। ये मेरा आख़िरी हिसाब है।'"
मैंने काग़ज़ पढ़ा। नीचे तारीख़ थी — उस दिन से एक हफ़्ता पहले की जिस दिन पापा गए थे।
और सबसे नीचे एक लाइन थी, जो मेरे हाथ काँपने लगे —
"मेरी मौत हादसा नहीं थी।"
मैं पीछे मुड़ा, क्योंकि मुझे महसूस हुआ कि कोई मेरे पीछे खड़ा है।
सामने माँ खड़ी थी — आँखों में वो ठंडक जो पहले कभी नहीं देखी थी। उसने मेरे हाथ से काग़ज़ लिया, पढ़ा, और फिर उसका चेहरा पत्थर जैसा हो गया।
"मैं जानती थी तू यहीं आएगा," माँ ने कहा, और उसकी आवाज़ में न गुस्सा था, न डर — बस एक अजीब सी शांति। "अब सुन, पापा ने सिर्फ़ लिफ़ाफ़ा नहीं छोड़ा था।"
॥
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और बिना कुछ कहे गली के कोने की तरफ़ खींच ले गई। पीछे राजेंद्र आ रहा था, हाथ लाठी पर। पीपल के नीचे भीड़ जुट रही थी, सिपाही काग़ज़ों की थैली खोल रहे थे, पर माँ किसी की तरफ़ देखने को तैयार नहीं थी।
कोने पर एक पुराना पत्थर का चबूतरा था, जहाँ पहले कोई दुकान हुआ करती थी। माँ ने मुझे वहीं बैठा दिया और सामने खड़ी हो गई। राजेंद्र दो कदम दूर रुक गया।
"सुन," माँ ने कहा, और उसकी आवाज़ वो नहीं थी जो रोज़ चाय के साथ सुनती हूँ। "तेरे पापा ने उस आख़िरी रात मुझे जगाया था। रात के तीन बजे थे। मैंने सोचा, तबीयत ख़राब होगी। पर वो चारपाई पर नहीं था — दरवाज़े पर खड़ा था, जूते पहने हुए, और उसके हाथ में वो पीली बही थी जो अब बूढ़े के पास है।"
मैंने राजेंद्र की तरफ़ देखा। वो भी सुन रहा था, आँखें नीची किए।
"उसने कहा — सरोज, हवेली में एक दीवार है जो काग़ज़ नहीं, हिसाब रखती है।" माँ ने सामने पीपल की तरफ़ देखा, जहाँ पत्ते हवा में हिल रहे थे। "मैंने पूछा, कैसी दीवार। तो वो बोला — वहाँ दो खाँचे हैं। दोनों अंदर से जुड़े हैं। एक खाली नहीं होना चाहिए। जिस दिन दोनों खाली हो जाएँ, हिसाब किसी और के हाथ में चला जाएगा।"
"फिर क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"फिर वो चला गया। सुबह ख़बर आई कि गाड़ी पलट गई।" माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया। "मैंने सोचा, अब मैं किसको ये बात कहूँ? तू तब आठ साल का था। रीना छोटी थी। मैंने सोचा, बड़ा होकर अपने आप समझ जाएगा।"
"बीस साल?" मेरी आवाज़ फट गई। "बीस साल चुप रही?"
"डर था।" माँ की आवाज़ नीची थी, पर साफ़। "जिस दिन तूने पहली बार जेब में पैसा लाकर मेज़ पर रखा, उस दिन मैं समझ गई थी कि वो दीवार तुझे भी मिल गई है। और उस दिन से मैं रोज़ डरती थी कि कहीं तू भी उसी तरह न निकले — काग़ज़ों के पीछे भागता हुआ, और एक दिन गाड़ी पलटी हुई मिले।"
"तो चुप रहने से क्या बच गया?" ये राजेंद्र ने कहा। पहली बार उसने बीच में बात की।
माँ ने उसकी तरफ़ देखा। "कुछ नहीं बचा। बस टाल दिया।"
मैं उठने ही वाला था कि हवेली के दरवाज़े से आवाज़ आई। लोहे का दरवाज़ा खुला, और उसमें से वही काला कुर्ता पहने बूढ़ा बाहर निकला — हाथ में काग़ज़ों का बंडल, सिर पर वही चोट, पर चेहरे पर अब वो घबराहट नहीं थी जो अंदर थी। वो सीधा मेरे सामने आकर रुका। इतना करीब कि उसके कुर्ते से धूल और पुराने काग़ज़ की बू आ रही थी।
"मनोहर," उसने कहा। मेरा पूरा नाम। किसी ने पूरा नाम ऐसे नहीं लिया था बरसों में। "मैं तुझे नहीं मारूँगा। न मेरे आदमी मारेंगे। सुन — बस एक बात मान ले। टोकन मेरे हाथ में दे दे। तेरा हिसाब मैं ख़ुद उतार दूँगा। तू जितना कमाना चाहे, मैं दूँगा। बीस हज़ार की बात है? मैं चालीस दूँगा।"
राजेंद्र ने लाठी थोड़ी ऊपर की।
"रुक," मैंने कहा। फिर बूढ़े से — "आप कौन हो? सच बोलो, क्योंकि आज रात सब झूठ निकला है। मैंने सुना कि आप सेठ गोवर्धनदास के बेटे हो। फिर ये बही, ये हवेली, ये काग़ज़ — इतने साल कहाँ थे?"
बूढ़े ने बंडल अपनी बगल में दबाया। "मैं बताता हूँ। पर पहले ये मान ले कि मैं तेरा दुश्मन नहीं हूँ। वो बात अलग है कि तेरे पापा ने मुझे दुश्मन बना दिया था।"
"पापा ने?"
"तेरे पापा ने वो बही मुझसे छीनी थी।" बूढ़े की आवाज़ में कुछ टूटा। "मैं हवेली का आख़िरी वारिस हूँ। मेरे बाप ने दो टोकन बनवाए थे — दो बेटों के लिए। मेरे बड़े भाई का टोकन हरि सिंह के हाथ लगा, और वो भाई मेरा नहीं था — वो भवानी का बाप था। मेरे बाप ने मरने से पहले मुझे बही सौंपी थी और कहा था — इसे मत छोड़ना।"
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