The Token System134 / 1154

The Token System – Chapter 134

7 min read November 6, 2026

"तेरे पापा ने कहा था," उसने धीरे से कहा, "जिस दिन घड़ी फिर चलेगी, उस दिन हिसाब का आख़िरी पत्ता खुलेगा।"

"कौन सा पत्ता?"

वो मेरे पास आई और उसने घड़ी को देखा। सुइयाँ चल रही थीं। फिर, जैसे किसी ने हवा में उँगली रख दी हो, सुइयाँ अचानक रुक गईं।

बारह बजे।

और जिस पल सुइयाँ रुकीं, घड़ी के काँच के नीचे, जहाँ नंबर होना चाहिए था, वहाँ कुछ और उभर आया। मैंने आँखें सिकोड़ीं। ये कोई अंक नहीं था।

माँ ने घड़ी को दीवार से उतारा और मेरे हाथ में दी।

"तोड़," उसने कहा।

"क्या?"

"काँच। तोड़ दे।"

मैंने घड़ी को मेज़ पर रखा और उँगली से काँच पर मुक्का मारा। वो चटक कर टूटा। अंदर से एक छोटी सी मुड़ी पर्ची निकली, इतनी पुरानी कि हाथ लगाते ही किनारे झड़ने लगी।

मैंने उसे धीरे से खोला।

उस पर पापा की लिखाई थी। छोटी, काँपती, जैसे बुख़ार में लिखी हो।

"मन्नू, अगर तू ये पढ़ रहा है तो मैं नहीं हूँ। जिस दिन टोकन वापस जाएगा, उस दिन हिसाब अपने आप किसी के सिर नहीं जाएगा — बस उस हाथ को चुन लेगा जो सबसे कमज़ोर हो। मेरे हिसाब का बोझ तेरे ऊपर आया था, इसलिए मैंने उसे बही में छुपा दिया। अब तेरे पास वक़्त है। जो बोझ तू उठाएगा, वो अपना उठाना, मेरा नहीं।"

रुक गई वहाँ लिखाई। नीचे एक आख़िरी लाइन, बहुत छोटी।

"और घड़ी — इसे मत बंद करना। जब तक चले, हिसाब तेरे हाथ में है।"

मैंने पर्ची माँ को दी। उसने पढ़ी, फिर दोनों हाथ जोड़कर माथे से लगाई।

"वो जानता था," वो बोली। "वो जानता था कि तू अकेला पड़ेगा।"

मैंने घड़ी की तरफ़ देखा। सुइयाँ बारह पर रुकी थीं। मैंने उँगली से पेंडुलम को हल्का धक्का दिया।

टिक।

टिक।

सुइयाँ फिर चलीं। मैंने दीवार पर लगाकर घड़ी को टाँग दिया।

तभी खिड़की के बाहर मुझे कुछ दिखा। सड़क के उस पार, पीपल के पेड़ के नीचे, एक आदमी खड़ा था। काले कुर्ते में, हाथ पीछे बँधे हुए, और वो सीधा खिड़की की तरफ़ देख रहा था।

मैंने पोटली उठाई। टोकन उँगलियों में पकड़ा। वो अचानक गरम नहीं हुआ, ठंडा भी नहीं हुआ। बस चुप रहा।

"माँ," मैंने कहा, "सो जा।"

"तू?"

"मुझे कुछ देखना है।"

वो मेरी तरफ़ देखती रही। फिर बोली, "दरवाज़ा बंद करके जाना। और वापस आते वक़्त दस्तक दे देना। मुझे पता होना चाहिए कि तू आया।"

मैंने सिर हिलाया। वो अंदर चली गई।

मैंने पर्ची को जेब में रखा और बही को सीने से लगाकर दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। बाहर आदमी अब भी वहीं खड़ा था — मैं उसे दूर से देख सकता था। वो हिला नहीं। जैसे वो मेरा इंतज़ार कर रहा हो।

और मेरे पीछे, दालान में, घड़ी चल रही थी — टिक, टिक, टिक — जैसे बीस साल बाद फिर से हिसाब गिनने लगी हो।

मैंने दरवाज़ा खोला और बाहर कदम रखा। ठंडी हवा चेहरे पर पड़ी। पीपल के पेड़ के नीचे वो आदमी खड़ा था। मैंने पोटली कसकर पकड़ी और सड़क पार करने लगा।

आधी सड़क आते-आते वो बोला, "मन्नू।"

मैं रुका। मुझे उसकी आवाज़ पहचानी नहीं।

"तू वही है जो बही लेकर घूम रहा है?" उसने पूछा।

"तू कौन है?"

वो आगे बढ़ा। चेहरा साये में था, पर जब वो पेड़ के नीचे से निकला तो दिखा — उमर में पापा से भी बड़ा, दाढ़ी कटी हुई, आँखों के नीचे गहरे गड्ढे।

"मैं वो हूँ," वो बोला, "जो तेरे पापा से पहले इस हिसाब में फँसा था। और निकल नहीं पाया।"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

"तू झूठ बोल रहा है।"

"तेरे पापा ने मुझे छुड़ाया था। आधा।" उसने अपनी कलाई दिखाई। उस पर एक निशान था, गोल, टोकन जैसा। "आधा हिस्सा अब भी बही में बाकी है। उन्होंने कहा था — मेरा बेटा आएगा, वो पूरा करेगा।"

"पापा ने ऐसा कुछ नहीं कहा।"

"काग़ज़ पर नहीं कहा।" उसने मेरी छाती पर उँगली रखी, जहाँ बही दबी थी। "यहाँ कहा।"

मैंने एक कदम पीछे हटा। घड़ी की आवाज़ मुझे घर से आती सुनाई दे रही थी। टिक। टिक।

"अगर तू मुझे छुड़ा दे," वो बोला, "तो तेरा बोझ आधा हो जाएगा। बीस हज़ार तेरे सिर से हट जाएँगे।"

"और तेरे सिर पर क्या आएगा?"

वो हँसा। हँसी में कुछ नहीं था, सिर्फ़ आवाज़। "मेरे सिर पर तो पहले से सब आया हुआ है। मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता।"

मैंने उसकी आँखों में देखा। आदमी डरा हुआ था। बहुत डरा हुआ। डरा हुआ आदमी सच नहीं बोलता — वो सिर्फ़ अपना डर कम करने की तरकीब बताता है।

"मैं किसी को नहीं छुड़ाता," मैंने कहा। "जिसने किया, वो खुद भुगतेगा। मैं तो बस अपना उठाऊँगा।"

उसका चेहरा बदला। "तेरे पापा ने भी यही कहा था। और देख, कहाँ गए।"

"पापा ने मुझे बचाया था। ये भी उन्हीं का काम है।"

वो चुप हो गया। फिर वो पेड़ की तरफ़ मुड़ा और बोला, "आज रात तेरे घर में कोई आएगा। जो उसे अंदर आने दे, वो हिसाब हार जाएगा।"

"कौन आएगा?"

"जिसका नाम बही में लिखा है। तीसरा नाम।" वो चल दिया। कुछ कदम जाकर रुका, बिना पीछे देखे बोला, "तेरी माँ को बता देना — हर घड़ी का एक वक़्त होता है। इस घड़ी का वक़्त बारह था। अब वो चल रही है, मतलब वक़्त लौट आया है।"

वो अंधेरे में ग़ायब हो गया।

मैं घर लौटा और दरवाज़ा बंद किया। पीछे से माँ की आवाज़ आई, "कौन था?"

"कोई पुराना जान-पहचान।"

वो दालान में आई, हाथ में लोटा। "मन्नू, तू मुझे बेवकूफ़ नहीं बना सकता। मैंने तेरे पापा के चेहरे पर बीस साल ऐसे ही झूठ देखे हैं।"

मैं बैठ गया। "उसने कहा — आज रात कोई आएगा। जिसका नाम बही में लिखा है।"

माँ का हाथ रुक गया। "तीसरा नाम?"

"तू जानती है?"

वो लोटा रखकर मेरे सामने बैठी। "तेरे पापा ने एक रात मुझे जगाया था। बोले थे — सरोज, बही में तीन नाम हैं। पहला मेरा, दूसरा उस आदमी का जो कल आया था, और तीसरा…" वो रुकी। "तीसरे के बारे में उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस इतना कहा कि तीसरा वो है जो सबसे करीब है।"

"करीब का मतलब?"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो वो बोल नहीं रही थी।

"सो जा," वो उठी। "सुबह सब ठीक होगा।"

"माँ —"

"सो जा, मन्नू।"

मैं अपने कमरे में आया। बही खोली। मैंने पन्ने पलटे, तीसरा नाम ढूँढा। पहला नाम — पापा का। दूसरा — उसी आदमी का, जो अभी मिला। तीसरा पन्ना खाली था। बिलकुल खाली।

मैंने उँगली उस खाली पन्ने पर रखी। कुछ नहीं हुआ।

मैंने बही बंद की और लेट गया। आँख लगी तो सपने में वही घड़ी दिखी — टिक, टिक करती हुई, और उसके नीचे माँ बैठी थी, और वो बोल रही थी, "तीसरा वो है जो सबसे करीब है।"

मैं उठा। पसीना छूट रहा था। बाहर झाँका। सुबह की पहली किरण आसमान पर थी।

मैं दालान में आया। घड़ी चल रही थी। मैंने उसे देखा और मुस्कुराया। फिर माँ की आवाज़ आई, पीछे से, बहुत धीमी — "मन्नू, तेरे पापा ने कहा था, जिस दिन घड़ी फिर चलेगी, उस दिन हिसाब का आख़िरी पत्ता खुलेगा।"

मैंने पलटकर देखा। माँ दरवाज़े पर खड़ी थी, और उसके हाथ में कुछ था — एक पुराना लिफ़ाफ़ा, जो उसने अब तक नहीं दिखाया था।

"ये तेरे पापा ने दिया था," वो बोली। "कहा था — जब घड़ी चले, तब देना।"

मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक छोटी पर्ची थी। उस पर सिर्फ़ एक नाम लिखा था।

तीसरा नाम।

और वो नाम पढ़ते ही मेरे हाथ से बही छूट गई। क्योंकि वो नाम मेरा था।

माँ ने पर्ची उठाई और मेरे हाथ में दी। "अब समझा? तीसरा नाम तू है। हिसाब तेरा है। पूरा। और आज रात जो आएगा, वो तुझे लेने आएगा।"

मैंने घड़ी की तरफ़ देखा। सुइयाँ बारह पर थीं। और उस पल, जैसे किसी ने अंदर से धक्का दिया हो, सुइयाँ रुक गईं। बारह बजे।

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