The Token System133 / 1154

The Token System – Chapter 133

7 min read November 6, 2026

"थाने चल," मैंने कहा। "पहले तेरी गवाही।"

बंसी ने केतली को गाड़ी के पीछे रखा और सीधा बैठ गया।

"एक बात पहले," वो बोला। "आज जो मैं राजेंद्र के सामने बोलूँगा, उससे पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं रहेगा। न मेरे पास, न तेरे पास।"

"हटने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी," मैंने कहा।

"तू अपने वाला काम कर," उसने कहा। "मैं अपने वाला करता हूँ।"

थाने में राजेंद्र अपनी कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया। रात का वक़्त था, कमरे में बस एक पीली बत्ती जल रही थी और मेज़ पर पड़ी घड़ी टिक-टिक कर रही थी। बंसी ने बैठने से पहले उस घड़ी को देखा, फिर मेज़ पर रखी रजिस्टर की तरफ़ देखा।

"बोलिए," राजेंद्र ने कहा।

बंसी ने गहरी साँस ली।

"सालों पहले," वो बोला, "मैं तहसील में बैठता था। काग़ज़ लिखता था, काग़ज़ बदलता था। रामगंज के कन्हैया माली का काग़ज़ भी मैंने बदला था।"

राजेंद्र का हाथ रुक गया।

"कौन कह रहा है तुम्हें?"

"कोई नहीं कह रहा। ख़ुद याद आ रहा है।" बंसी ने अपनी जेब से रूमाल निकाला और हाथ पोंछे। "उस वक़्त मुझे लगा मैं बड़ा काम कर रहा हूँ। दो हज़ार रुपये थे। मेरे लिए बहुत थे। भवानी का आदमी आया था, काग़ज़ दिखाया, बोला — इस आदमी का नाम यहाँ से हटा दो। मैंने हटा दिया।"

"कौन सा काग़ज़?" राजेंद्र ने कलम उठाई।

"ज़मीन का। हवेली के पीछे वाली ज़मीन का। कन्हैया माली का हिस्सा था उसमें। उसे एक काग़ज़ पर अंगूठा लगवाया गया और दूसरे काग़ज़ में नाम बदल दिया गया। बाद में उस आदमी को गाँव से निकलवा दिया।"

मैं वहीं खड़ा था। कमरे में हवा भारी हो गई थी।

"तुम्हें पता था यह ग़लत है?" राजेंद्र ने पूछा।

"पता था," बंसी ने कहा। "हर रात पता होता था। मैं उसी गली से गुज़रता था जहाँ कन्हैया माली का घर था। एक दिन उसकी औरत दरवाज़े पर बैठी रो रही थी। मैंने गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी।" उसने कुर्सी की बाहें पकड़ीं। "फिर मैंने तहसील की नौकरी छोड़ दी। रामगंज में दुकान खोल ली। सोचा, चाय बेचूँगा, छोटा हिसाब रखूँगा, बड़ा हिसाब भूल जाऊँगा। पर हिसाब भूलता नहीं।"

राजेंद्र ने तीन पन्ने भर दिए। फिर कलम रखी।

"ये बयान अब रिकॉर्ड पर है," उसने कहा। "कल सुबह अदालत जाओगे। और हाँ — आग की घटना का भी लिखवा लो। दो आदमी, एक की कलाई पर पुराना जलन का निशान, सफ़ेद कुर्ता।"

बंसी ने सिर हिलाया और अलग काग़ज़ पर सब लिखवाया। उसकी आवाज़ भारी थी पर रुकी नहीं।

"बंसी," मैंने बाहर निकलते वक़्त कहा, "तू ठीक है?"

"मैं आज पहली बार ठीक हूँ," उसने कहा। "पर ये ठीक होना थोड़ा दर्द करता है।"

शालिनी हमारे पीछे चुपचाप चली आ रही थी। थाने की सीढ़ियों पर उसने मेरा हाथ पकड़ा।

"मन्नू," उसने कहा, "मैं अब घर नहीं जाऊँगी। जब तक भवानी पकड़ा नहीं जाता, मैं बंसी के साथ रहूँगी।"

"तेरे पिता?"

"माँ है साथ। भाई अस्पताल में है, सुमन दीदी देख रही हैं।" उसने हाथ छोड़ा। "मुझे डरना बंद करना है।"

घर पहुँचा तो दालान की बत्ती जल रही थी। अंदर से चाय की गंध आ रही थी। माँ चूल्हे के पास बैठी थी, और उसके पास ही सरोज पलंग पर बैठी थी, उसके हाथ में एक कटोरी थी। विक्रम उसके पैरों के पास फ़र्श पर बैठा था, अपने घुटनों को बाँहों में भरे हुए।

"आ गया," माँ ने कहा, मेरी तरफ़ देखे बिना।

"आ गया।"

सरोज ने कटोरी रखी और मेरी तरफ़ देखा।

"मन्नू," उसने कहा। "मैंने सोचा तू आज नहीं आएगा।"

"क्यों नहीं आता?"

"क्योंकि तेरे पास काम है।" उसने विक्रम के सिर पर हाथ रखा। "ये बच्चा बोलता नहीं, पर मुझे पता है ये क्या सोच रहा है।"

विक्रम ने सिर नहीं उठाया।

"मैं डरता हूँ," वो बोला।

"किससे?"

"उससे।" उसने पिता का नाम नहीं लिया। "जब वो अस्पताल आया था, मैं हाथ नहीं मिलाया। उसने देखा भी नहीं। जैसे मैं वहाँ था ही नहीं।"

माँ ने सबको चाय दी। फिर ख़ुद विक्रम के पास बैठ गई।

"बेटा," उसने कहा, "तेरे पिता ने तुझे कभी देखा नहीं, ये मैं जानती हूँ। पर तू मेरी आँखों के सामने बड़ा हुआ है। तेरे पिता का नाम तुझे नहीं ढोना है।"

कमरे में कुछ देर किसी ने कुछ नहीं कहा।

मैंने जेब से पोटली निकाली। मेज़ पर रखी। अब ये अकेला टोकन नहीं था, ये चार-चार टुकड़ों का जुड़ा हुआ सिक्का था, आधा पीतल का, आधा ज़ंग लगा। मैंने उसे उँगलियों में पलटा।

और तभी मैंने देखा। टुकड़ों के जोड़ के बीच, जहाँ आज तक कुछ नहीं लिखा होता था, वहाँ अब अंक उभर आए थे।

बीस हज़ार बाकी।

मैंने रोशनी की तरफ़ उठाया। अंक साफ़ थे, जैसे अंदर से किसी ने लिखे हों।

"क्या हुआ?" सरोज ने पूछा।

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस थकान।"

पर मैं झूठ बोल रहा था। जब से भवानी ने मुझे रोका, जब से शालिनी को डराया, जब से बंसी की दुकान जली — तब से टोकन पर कोई नया काम नहीं आया था। और जब काम नहीं आता, तो अंक ऐसे ही नहीं घटते। इसका मतलब था कि हिसाब मेरी तरफ़ से नहीं, किसी और तरफ़ से चल रहा था। भवानी की तरफ़ से।

बीस हज़ार। मुझे हँसी आई। पिछले हफ़्ते तक मैं पाँच सौ रुपये के लिए भवानी से लड़ रहा था। अब बीस हज़ार बाकी थे, और मेरे पास एक गाड़ी, एक जली दुकान, और एक बूढ़ी औरत थी जिसने अपनी बाँह पर तीन शब्द खुदे थे।

"अब आगे का हिसाब बड़ा है," मैंने ख़ुद से कहा।

सरोज ने मेरी तरफ़ देखा। वो कुछ समझ गई थी, पर उसने पूछा नहीं।

रात को सब सो गए। सरोज को दूसरे कमरे में बिछौना दिया गया, विक्रम उसके पास ही ज़मीन पर लेटा। माँ अपने कोने में चली गई। शालिनी और बंसी रामगंज में रुके थे।

मैं दालान में बैठा था। सामने बही खुली थी। ये वही बही थी जो माँ ने दराज़ से निकाली थी, जिसके पन्ने पीले पड़ चुके थे और जिनकी स्याही मिट रही थी।

मैं शुरू से पढ़ने लगा। पहले दस पन्ने — सिर्फ़ नाम, तारीख़ें, अंगूठे के निशान। कोई पूरा वाक्य नहीं। जैसे किसी ने बात कहने से डरते हुए सिर्फ़ हिसाब लिखा हो।

मैंने पन्ना पलटा। फिर पलटा। हर पन्ने पर एक नाम, एक रक़म, एक तारीख़।

फिर आख़िरी पन्ना आया।

यहाँ तक सब वैसा ही था जैसा माँ ने बताया था — चार नाम, दो कटे, दो खुले। सरोज, चंदा।

पर उसके नीचे, जहाँ पहले कुछ नहीं था, वहाँ अब एक लाइन थी। बहुत छोटी, स्याही में लिखी, जैसे किसी ने जल्दी में लिखी हो।

"जो टोकन लौटाएगा, उसका हिसाब उसके बेटे के सिर चलेगा।"

बही मेरे हाथ से छूट गई। फ़र्श पर गिरी और खुली रह गई।

मैंने उसे उठाया और फिर से पढ़ा। शब्द वही थे। मैंने उँगली उस लाइन पर रखी, जैसे मिटा दूँ तो मिट जाएगी।

नहीं मिटी।

मैं खिड़की के पास गया। बाहर अंधेरा था, पर आसमान के किनारे पर हल्की सी धुंध फैल रही थी, जैसे सुबह अपनी जगह से उठने की तैयारी कर रही हो। दूर सड़क पर एक सफ़ेद गाड़ी धीरे से गुज़री। उसकी रोशनी खिड़की पर पड़ी और गई।

मैं दालान में लौटा और पापा की पुरानी घड़ी को देखा। वो दीवार पर टँगी थी, सालों से चुप। माँ कहती थी इसे कभी नहीं छेड़ना।

और आज वो चल रही थी।

टिक। टिक। टिक।

मैं वहीं जम गया। घड़ी का पेंडुलम धीरे-धीरे हिल रहा था, जैसे उसे चलने की आदत अभी याद आई हो।

"माँ," मैंने आवाज़ दी। मेरी आवाज़ कमरे में सूखी गिरी।

माँ अपने कोने से चली आई, सिर पर दुपट्टा, आँखों में नींद।

"क्या है?"

मैंने घड़ी की तरफ़ उँगली की।

माँ ने देखा। उसका चेहरा नहीं बदला — न डर, न हैरानी। बस आँखें भर आईं, जैसे उसने इस दिन के लिए बीस साल से इंतज़ार किया हो।

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