The Token System – Chapter 121
"सरोज?" मैंने आवाज़ दी।
सन्नाटा।
"सरोज?"
खिड़की के पास कोई हिला। मैंने टॉर्च जलाई। एक बूढ़ी औरत चारपाई पर बैठी थी, हाथ बँधे थे, मुँह पर कपड़ा।
પુલિસ वाले ने कपड़ा खोला। औरत ने लंबी साँस ली।
"तेरा नाम?" उसने पूछा।
"सरोज। विक्रम की माँ।"
"भवानी की पत्नी?"
वो चुप रही। फिर बोली — "जो बंद करके रखा, उसे पति कहूँ भी तो कैसे?"
पुलिस वाले ने उसके हाथ खोले। वो उठी और दीवार से टिक गई।
"छोटू," उसने कहा, "सोनल उसे लेकर नीचे गई। चालीस मिनट पहले।"
"कहाँ?"
"पीछे के दरवाज़े से। गाड़ी में। लेकिन उसके हाथ में एक और काग़ज़ था। लाल रबर बैंड वाला। उसपे तेरा नाम लिखा था।"
मैं सीढ़ी की तरफ़ भागा। बंसी पीछे आया।
"रुक," पुलिस वाले ने कहा, "मैं गाड़ी भेजता हूँ।"
"गाड़ी को देर लगेगी," मैंने कहा, "मैं पैदल जाने वाले रास्ते से देखता हूँ। बंसी, तू पीछे के फाटक पर रुक। अगर गाड़ी निकले, तो नंबर ले।"
मैं नीचे उतरा। रसोई के पीछे एक छोटा दरवाज़ा था। मैं उससे बाहर निकला और गाय के बाड़े की तरफ़ भागा। वहाँ से पीपल के मैदान तक एक रास्ता जाता था।
मैदान के किनारे एक सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। उसके पास सोनल खड़ी थी, और उसकी कलाई पकड़े एक लड़का — छोटू।
छोटू रो नहीं रहा था। वो सोनल को देख रहा था, जैसे कुछ सोच रहा हो।
"सोनल," मैंने आवाज़ दी।
वो पलटी। उसके हाथ में लाल रबर बैंड वाला काग़ज़ था।
"तू जल्दी आ गया," उसने कहा। "मैं सोच रही थी, तुझे ढूँढने में रात लगेगी।"
"छोटू को छोड़।"
"ये मेरा बंधक नहीं है। ये मेरा हथियार है।" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "इसपे तेरा नाम है। और नीचे लिखा है — 'मनोहर ने हवेली के काग़ज़ चुराए।' ये पर्ची कल सुबह पूरे बाज़ार में बँटेगी। तेरी बहन की शादी में जो लोग आएँगे, वो पहले ये पढ़ेंगे।"
"और अगर मैं ये पर्ची ले लूँ?"
"तो मेरे पास दो और हैं।"
छोटू ने अचानक सोनल की कलाई में दाँत गड़ा दिए। वो चीखी और उसने हाथ छोड़ दिया। छोटू भागकर मेरे पीछे आ गया।
सोनल ने काग़ज़ जेब में डाला और गाड़ी की तरफ़ बढ़ी। पर तभी पीछे से सफ़ेद गाड़ी आई और उसने रास्ता रोक दिया। पुलिस वाला उतरा।
"सोनल?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"तेरे नाम पर दो शिकायतें हैं। एक मरीज़ की जानकारी बेचने की, दूसरी एक बच्चे को अगवा करने की।"
सोनल हँसी। "शिकायत? किसकी? इसका?" उसने मेरी तरफ़ इशारा किया।
"मेरी," गंगा ने पीछे से कहा। वो सरोज के साथ आ रही थी। "मेरी बहन की मौत का काग़ज़ तेरे हाथ से गया था।"
सोनल का चेहरा बदला।
"मैंने कुछ नहीं किया," उसने कहा। "मुझे हुक्म मिला था।"
"किसका?"
वो चुप रही।
"पुलिस थाने में बताना," पुलिस वाले ने कहा। "अभी गाड़ी में बैठ।"
सोनल को गाड़ी में बैठाया गया। छोटू मेरे पीछे से निकला और गंगा की तरफ़ देखने लगा।
"तू मेरी माँ की बहन है?" उसने पूछा।
"हाँ," गंगा ने कहा। "तेरी माँ ज़िंदा है। मैं तुझे उसके पास ले जाऊँगी।"
"कहाँ?"
"पहले अस्पताल। तेरी माँ वहाँ है।"
छोटू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया।
बंसी पीछे से आया। उसके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था।
"गाड़ी के अंदर से गिरा," उसने कहा। "लाल रबर बैंड वाला नहीं। सादा।"
मैंने खोला। अंदर एक पर्ची थी, जिसपे लिखा था — "मन्नू, आज शाम छह बजे, चाय की दुकान पर। अकेला आ। बात शादी की है। — भवानी"
मैंने पर्ची जेब में रखी।
"क्या है?" बंसी ने पूछा।
"भवानी ने चाय पर बुलाया है।"
"मत जा।"
"नहीं जाऊँगा।"
सरोज ने मेरी तरफ़ देखा। "वो अकेला नहीं आएगा," उसने कहा। "वो कभी अकेला नहीं आता।"
"मुझे पता है।"
पुलिस वाले ने सबको गाड़ी में बैठाया। मैंने छोटू को गंगा के साथ भेजा और बंसी के साथ अस्पताल लौटा।
अस्पताल पहुँचकर मैंने पहले शालिनी के भाई को देखा। सुमन वहीं थी।
"इलाज हो सकता है," उसने कहा, "पर जल्दी करनी होगी। दो दिन में ठीक हो जाएगा।"
शालिनी ने राहत की साँस ली।
"भर्ती कर दिया है," सुमन ने कहा। "वार्ड तीन में। और मन्नू, एक बात — सोनल का काग़ज़ मिल गया?"
"उसे पकड़ लिया।"
"तो अच्छा है।"
शालिनी मेरे पास आई।
"मैं अब वापस जाऊँगी," उसने कहा। "और आगे कुछ नहीं भेजूँगी। मैंने सोच लिया है।"
"अपने भाई के बारे में सोच।"
"मैं सोच चुकी हूँ।" वो मुड़ी और अंदर चली गई।
शाम को जब मैं अस्पताल के गेट से बाहर निकला, तो एक आदमी रास्ता रोककर खड़ा था। काली शर्ट। वही।
"ठाकुर ने चाय पर बुलाया है," उसने कहा।
"मैंने पर्ची पढ़ ली है। मना कर दिया है।"
"ठाकुर ने कहा — अगर नहीं आया तो शादी के कार्ड पर लिखा नाम बदल जाएगा।"
मैं रुका। शादी के कार्ड पर मेरा नाम था। और रीना का।
"मेरा नाम बदलेगा तो पता चल जाएगा कि कार्ड किसने छपवाए।"
काली शर्ट वाला हँसा। "ठाकुर को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता। वो सिर्फ़ ये चाहता है कि तू चाय पर आ।"
"नहीं आऊँगा।"
"तेरी मर्ज़ी।" वो मुड़ा और चला गया।
मैं घर पहुँचा तो रात हो चुकी थी। रीना चूल्हे पर रोटी बना रही थी। माँ चारपाई पर बैठी थी, और उसके हाथ में बही थी।
वो उसे खोलकर नहीं पढ़ रही थी। बस उस पर हाथ फेर रही थी।
"माँ?"
उसने नज़र उठाई।
"तेरे पापा ने इसे छूआ था," उसने कहा। "तभी मैं इसे छू रही हूँ।"
मैं उसके पास बैठ गया।
"माँ, तूने कभी नहीं बताया कि पापा ने बही में क्या लिखा।"
"मैंने ख़ुद नहीं पढ़ा।"
"तो अब पढ़।"
उसने बही खोली। पन्ने पलटे। आख़िरी पन्ने पर उँगली रोकी।
"यहाँ कुछ लिखा है," उसने कहा।
"क्या?"
वो चुप रही। फिर बोली —
"जो हिसाब बाँटेगा, उसका घर बसेगा।"
वो लाइन पढ़कर माँ के हाथ काँप रहे थे। बही मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"तू पढ़। मेरी आँखें धोखा दे रही हैं।"
मैंने बही ली। आख़िरी पन्ना। पुरानी स्याही, कुछ जगह धुँधली। नीचे तीन लाइनें थीं। ऊपर वाली साफ़ थी — माँ ने वही पढ़ी थी। उसके नीचे दो और लाइनें थीं जो माँ ने नहीं पढ़ीं, या पढ़कर भी नहीं बोलीं।
"माँ, यहाँ नीचे भी कुछ लिखा है।"
वो उठकर मेरे पास आई। मेरे कंधे पर हाथ रखा और झुककर देखा।
"मुझे दिख नहीं रहा," उसने कहा। "तू बोल।"
"लिखा है — जिस दिन हिसाब खुलेगा, उस दिन ज़मीन अपना मुँह खोलेगी।"
माँ की साँस रुक गई।
"और नीचे?" उसने पूछा।
"और नीचे… पापा का नाम है। और तारीख़।"
"कौन सी तारीख़?"
मैंने देखा। "अगले हफ़्ते की सोमवार।"
माँ पीछे हटकर चारपाई पर गिरी जैसे किसी ने धक्का दे दिया हो।
"माँ?"
"ये तारीख़…" वो बोली, "ये तारीख़ तेरे पापा की मौत के तीन दिन पहले की है।"
मुझे कुछ समझ नहीं आया। "मतलब पापा ने ये लाइन मरने से पहले लिखी थी?"
"नहीं।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "ये तारीख़ आने वाली सोमवार है। मैंने इसे पहले नहीं देखा था। बही में ये लाइन, ये तारीख़, कल तक नहीं थी।"
रीना ने चूल्हे से हाथ हटाया। "माँ, तू क्या कह रही है?"
"मैं सुबह से इसे छू रही हूँ," माँ ने कहा। "कल रात तक आख़िरी पन्ना खाली था। मैंने ख़ुद देखा था। मैं इसे रोज़ छूती हूँ। अब यहाँ लिखा है।"
कमरे में बाहर का कोई शोर नहीं था। रीना की रोटी जलने लगी, उसने उसे उतारा।
"माँ," मैंने कहा, "तू ठीक से सोच। हो सकता है पहले भी लिखा हो और तूने न देखा हो।"
"मैंने ख़ुद इस बही को सालों से रखा है, मन्नू। मुझे पता है किस पन्ने पर क्या है। वो पन्ना खाली था।"
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