The Token System – Chapter 120
"पीछे की गली में, मेरी माँ के पास। पुराने नाले के पास वाला कमरा।"
बंसी ने चाबी निकाली। "चल। गाड़ी आगे है।"
हम पीछे की गली में पहुँचे। छोटा सा कमरा था, टिन की छत। अंदर एक बुढ़िया बैठी थी — शालिनी की माँ — और उसकी गोद में एक लड़का था। लड़के का चेहरा लाल था, आँखें आधी बंद। वो काँप रहा था।
सुमन ने फ़ोन उठाया। "मैं पहुँच रही हूँ। इमरजेंसी में बेड तैयार रखो। बच्चे को बुख़ार है, तेज़। मैं और मन्नू अभी आ रहे हैं।"
मैंने बच्चे को गोद में लिया। वो हल्का था, पर उसका शरीर तवे जैसा गरम था।
शालिनी ने अपनी माँ को कुछ समझाया। बुढ़िया रोने लगी।
रास्ते में गाड़ी में शालिनी मेरे बगल में बैठी थी। उसके हाथ बच्चे के सिर पर थे।
"मन्नू," उसने धीमे से कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"तू क्यों कर रहा है ये सब? तेरा क्या जाता है?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर आगे सड़क पर।
"मेरे पापा एक बार किसी के काग़ज़ बदलने में फँसे थे," मैंने कहा, "और उन्हें कोई बचाने वाला नहीं था। मैं वो नहीं होना चाहता जो उस वक़्त चुप बैठा था।"
वो कुछ नहीं बोली।
अस्पताल पहुँचे। सुमन इमरजेंसी के बाहर खड़ी थी। उसने बच्चे को देखा और तुरंत नर्सों को बुलाया।
"इसे अंदर लाओ। दवा शुरू करो। मैं दो मिनट में आती हूँ।"
बच्चा अंदर चला गया। शालिनी दरवाज़े पर खड़ी रह गई।
सुमन शालिनी के पास गई। "तू वापस आ गई।"
शालिनी ने सिर हिलाया।
"तो अब सुन," सुमन ने कहा, "तेरा इस्तीफ़ा मैंने फाड़ दिया है। तू कल से ड्यूटी पर है। और सोनल के पास जो काग़ज़ आए, पहले मेरी मेज़ पर।"
"पर वो मुझे धमकाएगी।"
"धमकाएगी तो मेरे सामने धमकाएगी।"
शालिनी ने सुमन की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
"तो मैं अब अंदर जाऊँ?" उसने पूछा।
"जा," मैंने कहा, "और ये भी याद रख — होम के अंदर जो भी काग़ज़ हो, उसकी कॉपी मेरे पास। तेरा भाई ठीक हो जाएगा।"
वो अंदर चली गई।
बाहर बंसी खड़ा था। उसने अपनी घड़ी देखी।
"चार बजे के थे। अब सवा चार हैं। पुलिस वाले को फ़ोन कर।"
मैंने फ़ोन निकाला। उस पुलिस वाले ने दूसरी रिंग पर उठाया।
"मन्नू, मैं रास्ते में हूँ। पाँच बजे तक पहुँच जाऊँगा।"
"साहब, एक बात और। होम के अंदर एक नर्स है जो भवानी की आदमी है। उसका नाम सोनल है। अगर वो कुछ करे तो—"
"तो क्या?"
"तो मैं संभाल लूँगा। पर आप उससे सवाल ज़रूर कीजिएगा।"
"ठीक है। पर मन्नू, एक बात याद रख — तू अंदर अकेला मत घुसना। मैं पाँच बजे आ रहा हूँ। उसके पहले कुछ नहीं।"
"ठीक है।"
फ़ोन काटा।
मैं इमरजेंसी के बाहर की बेंच पर बैठ गया। शालिनी अंदर बच्चे के पास थी। सुमन दवा लिख रही थी। बंसी चाय लेने गया।
मेरे हाथ में पोटली थी। मैंने उसे खोला। सिक्का अंदर था। ठंडा था। पर उसका एक कोना… हल्का गरम।
मैंने पोटली बंद करके जेब में रखी।
सुमन बाहर आई।
"बच्चा ठीक है," उसने कहा, "बुख़ार है, पर ख़तरे से बाहर। दो दिन रखना पड़ेगा।"
"शालिनी?"
"वो अंदर है। उसके हाथ नहीं रुक रहे। मैंने उसे काम में लगा दिया। इससे उसका ध्यान भटकेगा।"
वो मेरे बगल में बैठ गई।
"तीन साल पहले वाली बात," मैंने कहा, "मैंने किसी को नहीं बताऊँगा।"
"मैंने ख़ुद बताया है। अब किसी को नहीं बताना है तो तू तय कर।"
"किसी को नहीं बताऊँगा।"
वो मुस्कुराई। फिर उठी।
"मैं अंदर जा रही हूँ। पाँच बजे तक तू मुझे फ़ोन कर। अगर नहीं किया, तो मैं ख़ुद होम के गेट पर आ जाऊँगी।"
"तू नहीं आएगी।"
"देखेंगे।"
वो अंदर चली गई।
बंसी ने दो कप चाय लाकर मेरे हाथ में एक रखा।
"अब?" उसने पूछा।
"अब चल। होम के पिछले रास्ते। चार बज चुके हैं। पाँच बजे तक हमें गंगा से मिलना है।"
"और सरोज?"
"सरोज सुमन के पीछे वाले कमरे में है। सुरक्षित। पर लिस्ट पर रात नौ बजे का समय उसके नाम के आगे है।"
"तो रात नौ बजे का वक़्त कोई संख्या नहीं। वो समय-सीमा है।"
"हाँ।"
बंसी ने चाय का आख़िरी घूँट भरा और कप उठाकर रखा।
"चल," उसने कहा।
हम निकले। सड़क पर धूल उड़ रही थी। पश्चिम में सूरज ढल रहा था। होम के पिछले रास्ते तक पहुँचने में हमें पच्चीस मिनट लगने वाले थे।
मैंने बंसी की गाड़ी में बैठकर पीछे की खिड़की से देखा। अस्पताल छोटा होता जा रहा था। अंदर एक बच्चा बच रहा था, एक नर्स अपनी शर्म से मुक्त हो रही थी, और एक डॉक्टर के सिर से तीन साल का बोझ हट रहा था।
मुझे पता नहीं था कि हमें आगे क्या मिलने वाला था।
पर इतना पता था कि मेरी जेब में जो टोकन है, वो इस पूरे खेल का सबसे चुप्चाप खड़ा सबसे बड़ा हिसाब है।
॥
बंसी की गाड़ी ने होम के पिछले रास्ते पर मोड़ लिया तो सामने एक ट्रक खड़ा था। सब्ज़ी के बोरे उतर रहे थे। बंसी ने गाड़ी रोकी।
"यहीं से पैदल," उसने कहा। "पीछे का फाटक अभी खुला होगा। चूल्हे के धुएँ से पता चलेगा।"
मैं उतरा। सामने पीली दीवार थी, और उसके पीछे एक चिमनी से धुआँ उठ रहा था। पाँच बजने में दस मिनट थे।
फाटक के पास एक औरत बैठी थी, चूल्हे पर कुछ उबाल रही थी। उसने हमें देखा, फिर अपने बर्तन में देखने लगी।
"गंगा?" मैंने पूछा।
"तू वही है जो कल रात भागा था?" उसने कहा, बिना नज़र उठाए।
"हाँ।"
"अंदर मत जा। ठाकुर ने दो आदमी सीढ़ी पर बैठा रखे हैं। सोनल ने काग़ज़ देखकर सब बता दिया।"
"तो तू क्यों बैठी है?'
"मैं बैठी नहीं। मैं इंतज़ार कर रही थी।" उसने चूल्हे से एक जली हुई लकड़ी उठाई और पीछे की दीवार पर मिट्टी से दो नाम लिखे। "एक नाम तेरा, एक नाम मेरा। अब मिटाओ तो पता चले।"
"मुझे समझ नहीं आ रहा।"
"न समझ। बस याद रख — रात नौ बजे जो सामने वाले कमरे में जाएगा, वो मरा। औरत अंदर बैठी है, और वो मेरी बहन है।"
बंसी ने मेरी बाँह पकड़ी।
"ये लिस्ट वाली औरत है," उसने धीरे कहा।
"मैं जानता हूँ।"
"तो अभी पुलिस का इंतज़ार कर।"
उसी वक़्त पीछे से गाड़ी की आवाज़ आई। एक सफ़ेद गाड़ी आकर रुकी। उसमें से पुलिस वाला उतरा, साथ में दो आदमी सादे कपड़ों में।
"अंदर कौन है?" उसने पूछा।
"बहन है। मेरी बहन।" गंगा ने कहा।
"अब तक क्यों नहीं बताया?"
"बताती तो तू आता कैसे? फ़ोन पर ही गिरफ़्तार कर लेता।"
पुलिस वाले ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कंधे उचकाए।
"ठीक है। पहले अंदर चलते हैं।"
हम पीछे के रास्ते से अंदर गए। रसोई में दो औरतें थीं। उन्होंने हमें देखकर काम रोक दिया। गंगा ने उन्हें इशारा किया। वो दोनों दरवाज़े के पास चली गईं।
"तीसरी मंज़िल पर चार कमरे हैं," गंगा ने रास्ते में कहा। "पहला डॉक्टर मधु का था। अब ख़ाली है। दूसरे में सोनल बैठती है। तीसरे में चिड़िया का स्टिकर है — वहाँ कोई नहीं। चौथे में लोहे का दरवाज़ा है।"
"और छोटू?" मैंने पूछा।
"छोटू कल रात से गायब है। सोनल ने उसे किसी और रास्ते भेजा।"
मेरे पैर रुक गए।
"तो तूने इतनी देर क्यों लगाई?"
"क्योंकि सोनल के पास छोटू का नाम और उम्र लिखा काग़ज़ है। अगर मैंने जल्दी शोर मचाया, तो वो काग़ज़ गायब हो जाता।"
पुलिस वाले ने सीढ़ी पर बैठे दोनों आदमियों को देखा। दोनों उठ खड़े हुए।
"बैठो," उसने कहा। "जब तक पूछा न जाए, कोई नहीं हिलेगा।"
हम तीसरी मंज़िल पर पहुँचे। सोनल के कमरे का दरवाज़ा खुला था। वो अंदर नहीं थी। दराज़ खुली पड़ी थी, काग़ज़ बिखरे थे।
"कहाँ गई?" पुलिस वाले ने पूछा।
"शायद छत पर।" गंगा ने कहा।
हम चौथे कमरे तक गए। लोहे का दरवाज़ा। पुलिस वाले ने धक्का दिया। अंदर अंधेरा था और एक बदबू आ रही थी।
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