The Token System – Chapter 1146
“तो उसे रहने दे। मिलता रहना।”
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर बोला, “तू चाहेगा कि मैं उससे मिलूँ?”
“मैं कुछ नहीं चाहूँगा,” मैंने कहा। “वो तेरा बेटा है। मैं बस इतना कह रहा हूँ कि चले जाने से बाप का हिसाब बंद नहीं होता।”
भवानी ने तौलिया मेज़ पर रखा। उसके चेहरे पर वो भाव आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — न ग़ुस्सा, न घमंड, बस थकान।
“कल तेरी बहन की शादी है?”
“परसों,” मैंने कहा। “ग्यारह तारीख़।”
“परसों।” उसने सिर हिलाया। “मैं नहीं आऊँगा। मेरे आने से तेरी माँ के हाथ काँपेंगे और तेरी बहन की आँखें नीची होंगी। पर मेरी तरफ़ से एक चीज़ आएगी। उसे लेना।”
“क्या?”
“वो मेरे पास है,” उसने टोकरी की तरफ़ इशारा किया। “अभी नहीं। शादी के दिन।”
वो टोकरी उठाने लगा। मैंने आगे बढ़कर पकड़ ली।
“ये काग़ज़ कहाँ जलाएगा?”
“नीचे, आँगन में। जहाँ पहले दीये जलते थे।”
“मैं साथ चलूँ?”
वो रुका। फिर हँसा — थोड़ी-सी हँसी।
“तू मेरे साथ काग़ज़ जलाने चलेगा?”
“तेरे साथ नहीं,” मैंने कहा। “इस हवेली के आँगन में। मैं देखना चाहता हूँ कि बीस साल का कचरा जलते वक़्त कैसा दिखता है।”
हम दोनों नीचे उतरे। शंकर ने हमें देखा, कुछ नहीं बोला, बस चूल्हे में लकड़ी डाल दी।
भवानी ने आँगन के बीच में टोकरी रखी। फिर एक-एक मुट्ठी काग़ज़ उठाकर आग में डालने लगा। पीले पन्ने मुड़ते, काला धुआँ ऊपर उठता, और जलते हुए अक्षर हवा में एक पल के लिए चमकते — किसी का नाम, किसी की तारीख़, किसी का हिसाब।
मैं पास खड़ा रहा। शंकर भी।
आधे काग़ज़ जल चुके थे जब भवानी ने आख़िरी मुट्ठी उठाई और उसे आग में डालने से पहले रोक लिया।
“ये एक नहीं जलाऊँगा,” उसने कहा।
“क्या है?”
“तेरे दादा का हिसाब।” उसने मुट्ठी मेरी तरफ़ बढ़ाई। “सुखदेव का नाम इस हवेली के काग़ज़ों में जहाँ-जहाँ लिखा है, वो सब यहाँ है। मेरे बाप ने इसे अलग रखा था — कहता था, ‘अगर कभी हार माननी पड़े तो यही काग़ज़ हार को हार जैसी नहीं लगने देगा।’”
मैंने काग़ज़ लिए। तीन पन्ने थे। पहले पर — “सुखदेव माली, हिस्सा: चौथा (लिखा हुआ), गिरवी: कुछ नहीं।” दूसरे पर दादा की लिखाई में एक लाइन — “जो मेरे पोते को मिले, वो जान जाए कि मैंने टोकन कभी अपने लिए नहीं रखा।” तीसरे पर बस एक नाम — गेंदा — और उसके आगे लिखा — “माफ़ी।”
“ये माफ़ी किसने लिखी?”
“मेरे बाप ने,” भवानी ने कहा। “उसने गेंदा का नाम मिटाया था। मरने से पहले उसने ये लिखा, पर किसी को दिया नहीं। मैंने इसे बीस साल रखा। आज तेरे हाथ में दे रहा हूँ।”
मैंने पन्ने मोड़कर जेब में रखे।
“अब?” मैंने पूछा।
“अब मैं जाता हूँ।” भवानी ने आग पर आख़िरी नज़र डाली, जो अब बुझ रही थी। “तेरे दादा ने एक बात कही थी जो मैंने उस वक़्त नहीं समझी — ‘हिसाब किसी का नहीं होता, बेटा। हिसाब ख़ुद चलता है। उसे बस एक आदमी चाहिए जो उसे ईमानदारी से रखे।’ तेरे दादा ने रखा। मैंने नहीं रखा। तू रख रहा है।”
वो मुड़ा। शंकर ने उसके लिए फाटक खोला।
दरवाज़े पर पहुँचकर वो रुका। मुड़ा नहीं, सिर्फ़ पीठ से बोला —
“कल तेरी बहन की शादी में मेरी तरफ़ से एक चीज़ आएगी। उसे लेना।”
“क्या है वो?”
“वो मेरा हिसाब है।” वो फाटक से बाहर निकला। “जो अब पूरा है।”
उसकी चप्पलों की आवाज़ गली में दूर तक गई, फिर मुड़ी, फिर बंद हो गई।
शंकर ने फाटक बंद किया।
मैं आँगन में खड़ा रहा। जलते काग़ज़ों की राख अब भी हल्की गरम थी, और उसमें से एक पतला-सा धुआँ उठ रहा था, जो हवा में सीधा ऊपर जा रहा था — जैसे कोई उँगली आसमान की तरफ़ उठी हो।
मैंने जेब से टोकन निकाला।
उस पर “बुझ गया” अब भी था, पर उसके नीचे वाली लकीर अब पूरी हो चुकी थी। और उसके नीचे, जैसे किसी ने बहुत धीरे से लिखा हो, एक नया शब्द उभर रहा था —
“साफ़।”
मैंने टोकन वापस जेब में रखा और शंकर की तरफ़ देखा।
“अब क्या करेगा तू?” मैंने पूछा।
शंकर ने आँगन में चारों तरफ़ देखा — सील लगी दीवारें, खाली बरामदा, बुझा चूल्हा।
“मैं यहीं रहूँगा,” उसने कहा। “कोई तो हो जो सुबह उठकर इस आँगन में झाड़ू लगाए। हवेली सील है, पर धूल तो सील नहीं है।”
“तू अकेला रहेगा?”
“अकेला नहीं,” उसने कहा, और दीवार की तरफ़ देखा। “जब दीवार में टोकन रखा जाएगा, तब ये हवेली फिर सोएगी। और जब वो सोएगी, तब मैं उसके सपनों में रहूँगा।”
मैं हँसा। ये पहली बार था कि हवेली में किसी ने मुझे हँसाया था।
“शादी में आएगा?” मैंने पूछा।
“मैं नहीं,” उसने कहा, और चूल्हे की तरफ़ बढ़ा। “मेरी चाय आएगी।”
घर पहुँचा तो दोपहर हो चुकी थी। रीना आँगन में सिलाई मशीन पर झुकी थी और माँ चूल्हे पर कुछ पका रही थी।
“कहाँ था?” रीना ने पूछा।
“हवेली में।”
उसने सुई रोक दी।
“फिर?”
“फिर कुछ नहीं।” मैंने उसके पास बैठकर काग़ज़ निकाले। “ये तेरे लिए।”
उसने पन्ने पलटे। दादा की लिखाई देखी। फिर मेरी तरफ़ देखा।
“ये मैंने कभी नहीं पढ़ा।”
“मैंने भी नहीं। आज पहली बार।”
वो चुप बैठी रही। फिर बोली, “दादा ने लिखा है कि उन्होंने टोकन अपने लिए नहीं रखा।”
“हाँ।”
“तो हमारे पास जो भी है, वो सब किसी और का है।”
“नहीं,” मैंने कहा। “हमारे पास जो है, वो हमारे काम का हिस्सा है। हर नोट के पीछे किसी का इलाज है, किसी की ज़मीन है, किसी का बचा हुआ काग़ज़ है। अब ये सब तेरे नाम पर नहीं, इस बात पर है कि हमने किसी को लूटा नहीं।”
रीना ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ देर बाद सिर हिलाया।
“परसों,” उसने कहा। “परसों तक सब बंद हो जाएगा?”
“कल दीवार में टोकन रखा जाएगा। उसके बाद कोई और हिसाब नहीं। बस एक पर्ची रहेगी।”
“कौन सी?”
“जो हर बार मिलती है — ‘हिसाब बराबर’।”
माँ चूल्हे से उठी और बिना कुछ बोले मेरे सामने एक थाली रख दी। फिर बोली, “कल तू दस बजे हवेली जाएगा?”
“हाँ।”
“मैं भी चलूँगी।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो अपनी साड़ी के पल्लू से हाथ पोंछ रही थी।
“तू क्यों चलेगी?”
“क्योंकि मैंने बीस साल उस दीवार को कोसा है,” उसने कहा। “अब एक बार उसे देखना है, जब वो बंद हो रही हो।”
मैंने सिर हिलाया।
शाम को बंसी आया। हाथ में चाय का कप और मुँह में एक बीड़ी।
“सुन,” उसने दरवाज़े पर ही कहा। “कल दस बजे की रस्म में एक दिक्कत है।”
“क्या?”
“अदालत ने कहा है कि टोकन दीवार में रखा जाएगा, पर ये नहीं कहा कि कौन रखेगा।”
“तो?”
“तो अगर वो किसी हाकिम के हाथ से रखा गया, तो ये हिसाब का नहीं, रस्म का हिस्सा होगा।” उसने बीड़ी बुझाई। “तेरे दादा ने टोकन कभी हाकिम के हाथ से नहीं रखवाया। उन्होंने ख़ुद रखा और ख़ुद हिसाब बराबर किया।”
मैंने सोचा।
“तो कल मैं ख़ुद रखूँगा।”
“अदालत की निगरानी में?”
“अदालत की निगरानी में भी,” मैंने कहा। “पर हाथ मेरा होगा। अगर अदालत को कुछ कहना है, तो उसने मेरा नाम साफ़ किया है — ‘गवाह नंबर एक’। अब वोही गवाह आख़िरी काग़ज़ भी रखेगा।”
बंसी हँसा।
“तेरे दादा की लाइन है,” उसने कहा। “बंदे ने हिसाब ऐसे रखा कि उसके पोते को भी वही ढंग आ गया।”
“वो क्या ढंग?”
“ये कि हर चीज़ का सबूत रखो और किसी से डरो मत।”
रात को मैं छत पर गया। टोकन जेब में था, डिबिया पलंग के नीचे, और माँ ने ग्यारह तारीख़ की शादी के लिए पुरानी संदूक से अपनी साड़ी निकाल रखी थी — वही साड़ी जो उसने पापा के साथ पहनी थी।
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