The Token System – Chapter 1142
"क्योंकि मेरा बेटा मुझसे बड़ा निकला," रामावत जी ने कहा। "आकाश ने उस दिन तेरे सामने सच बोल दिया। उसके बाद मैंने सोचा — अगर मेरा लड़का झुक सकता है, तो मैं क्यों नहीं झुक सकता।"
आकाश ने सीढ़ी से कुछ कहा — आवाज़ दबी थी, पर सुनाई दी।
"पापा, रीना से माफ़ी माँगनी है। मुझसे नहीं होगा।"
रामावत जी हँसे। वो हँसी अजीब थी — आधी खीज, आधी शर्म।
"देख लिया," उन्होंने मुझसे कहा। "ये लड़का ब्याह से पहले ही जमाई बन गया है।"
"अच्छा है," मैंने कहा। "कम से कम ईमानदार है।"
मैंने काग़ज़ जेब में रखा।
"ये मैं अदालत में दूँगा," मैंने कहा। "पर एक बात पूछूँ — आपने ये काग़ज़ मुझे अब क्यों दिया? ग्यारह तारीख़ तक रुक सकते थे।"
रामावत जी उठ खड़े हुए। उन्होंने ऊपर आसमान की तरफ़ देखा, जहाँ बादल धीरे-धीरे सरक रहे थे।
"क्योंकि मुझे पता चला कि भवानी ने अपने होम के सारे काग़ज़ जलाने का हुक्म दे रखा है," उन्होंने कहा। "और मैं नहीं चाहता कि मेरे लड़के की शादी उस आदमी के जले काग़ज़ों की राख पर हो।"
मैंने सिर हिलाया।
"ठीक है," मैंने कहा। "कल सुबह दस बजे अदालत। ये काग़ज़ वहीं पेश होगा। और आप गवाही देंगे।"
"दूँगा," रामावत जी ने कहा। फिर वो रुके। "पर एक बात कहूँ — मैं गवाही दूँगा भवानी के ख़िलाफ़, पर रीना के सामने मैं अपना चेहरा नहीं छुपाऊँगा। जो किया, किया। माफ़ी माँगने से काग़ज़ नहीं बदलता।"
वो सीढ़ी की तरफ़ बढ़े, फिर रुके और मेरी तरफ़ मुड़े।
"और मनोहर जी," उन्होंने कहा, "तेरे पास जो टोकन है — वो मेरे हाथ नहीं लगेगा, मैं जानता हूँ। पर उसके बगैर भी जो काम किए हैं तूने, वो किसी टोकन के बगैर किए हैं। याद रखना।"
वो उतर गए। आकाश सीढ़ी के मुँह पर अभी भी खड़ा था। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"मनोहर भाई," उसने कहा। "रीना से कह देना — मैं उसके सामने आऊँगा, तब भी झूठ नहीं बोलूँगा। भवानी के आदमी मुझे धमका चुके हैं। मैं डरा हूँ। पर झूठ नहीं बोलूँगा।"
"यही काफ़ी है," मैंने कहा।
वो चला गया। बंसी छत के किनारे से आया और मेरे पास बैठ गया।
"अब?" उसने कहा।
"अब कल," मैंने कहा। "अदालत। रामावत जी का काग़ज़, शेखर बाबू की फाइल, सुमन की गवाही, और हवेली की वो कॉपी जो कुएँ के संदूक में मिली।"
"और मंडप?" बंसी ने कहा। "ग्यारह तारीख़?"
"मंडप अपनी जगह," मैंने कहा। "पर मंडप से पहले एक दीया बुझाना है।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा।
"तेरी माँ ने कहा था — तीसरा पत्थर खुलने पर दीया बुझेगा।"
"पत्थर तो खुल गया," मैंने कहा। "पर दीया अभी जल रहा है।"
मैंने जेब से टोकन निकाला। रात की हवा में उसकी सतह पर "मिल गया" लिखा हुआ ठंडा था। फिर मैंने वो पुरानी पर्ची निकाली — "अब खुल गया।"
देखते ही देखते पर्ची के नीचे टोकन पर एक नई लकीर उभरी — छोटी सी — और उसके नीचे एक शब्द आया।
"बुझा।"
बंसी मेरे कंधे के पास आया।
"ये क्या है?"
"माँ ठीक कह रही थी," मैंने कहा। "टोकन कह रहा है — अब वो दीया बुझाने का वक़्त आ गया है, जो दादा के भाई ने जलाया था।"
"कैसे?"
"नाम लेकर," मैंने कहा। "जो नाम उसने नहीं लिया, वो मैं लूँगा।"
मैंने टोकन जेब में रखा और सीढ़ी की तरफ़ बढ़ा।
"कल सुबह अदालत में ये नाम लिया जाएगा," मैंने कहा। "और उसके बाद दीया बुझेगा — फिर हवेली में कोई हिसाब बाक़ी नहीं रहेगा।"
बंसी मेरे पीछे आया। सीढ़ी उतरते वक़्त उसने कुछ गुनगुनाया — कोई पुरानी चाय की दुकान वाली बात, जो इस वक़्त किसी को याद नहीं थी, पर उसे याद थी।
नीचे आँगन में माँ चूल्हे के पास बैठी थी, रीना उसके साथ। रीना ने मेरी तरफ़ देखा और पूछा —
"क्या कह रहे थे?"
"अपनी माफ़ी," मैंने कहा। "और कुछ नहीं।"
रीना कुछ देर चुप रही। फिर वो उठी और चूल्हे के पास रखी लोहे की तवेली उठाने लगी।
"ठीक है," उसने कहा। "अब खाना खा। कल अदालत है, और अदालत में भूखे आदमी की ज़ुबान भी थक जाती है।"
मैं हँसा। माँ ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो शब्दों में नहीं आती — कुछ ऐसा, जो बरसों से बंद था और अब खुल रहा था।
खाना खत्म करते-करते रात ग्यारह बज गए। बंसी उठा।
"मैं चलता हूँ," उसने कहा। "सुबह छह बजे आ जाऊँगा। रामावत जी का काग़ज़ तेरे पास है?"
"है," मैंने कहा।
"शेखर बाबू की फाइल?"
"सुमन के पास।"
"सुमन कल आ रही है?"
"आएगी," मैंने कहा। "उसकी गवाही है।"
बंसी दरवाज़े तक गया। फिर रुका। उसने पलटकर मेरी तरफ़ देखा।
"मन्नू," उसने कहा। "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"तेरे पास टोकन है। तू कह सकता है — एक काम, और सब खत्म। एक काम, और भवानी हमेशा के लिए बंद। तू क्यों नहीं करता?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। चूल्हे की आग अब बुझ रही थी, और उसकी लाल रोशनी में बंसी का चेहरा आधा अंधेरे में था।
"क्योंकि टोकन काम बताता है, इंसाफ़ नहीं," मैंने कहा। "और भवानी का हिसाब अदालत का काम है। मेरा काम — हवेली। और हवेली का काम — उसका नाम।"
बंसी कुछ देर देखता रहा। फिर उसने सिर हिलाया और चला गया।
दरवाज़ा बंद करते वक़्त मैंने जेब से टोकन निकाला। उस पर "बुझा" शब्द अब भी उभरा हुआ था। मैंने उसे हथेली पर रखा — ठंडा था, जैसे कोई पुरानी बात।
फिर मैंने पर्ची उठाई — "अब खुल गया।"
और मैं चूल्हे की बुझती आग के सामने बैठ गया, टोकन हाथ में लिए, यह सोचकर कि सुबह अदालत में कौन-कौन खड़ा होगा — और कौन नहीं।
॥
चूल्हे की बुझती आग में एक आख़िरी चिंगारी उठी, फिर वो भी गई। मैं टोकन जेब में रखकर उठा ही था कि दरवाज़े पर दस्तक हुई — तीन बार, ठहरकर।
इतनी रात को कौन? बंसी तो अभी गया था।
माँ ने चूल्हे के पास से ही कहा, "देख ले।"
दरवाज़ा खोला। बाहर रामावत जी खड़े थे — वही मोटी अँगूठी, वही चौड़ा चेहरा — पर आज उनके साथ कोई सफ़ेद गाड़ी नहीं थी, कोई आदमी नहीं। पीछे अँधेरी गली में सिर्फ़ एक ऑटो खड़ा था, जिसका ड्राइवर सीट पर सिर झुकाए बैठा था।
"रात ग्यारह बजे?" मैंने कहा। "रामावत जी, आप तो सुबह वाले आदमी लगते थे।"
वो हँसे नहीं। सीधे अंदर आए। चप्पल आँगन की सीमेंट पर उतारी, फिर चूल्हे के पास रखी लकड़ी की चौकी पर बैठ गए — जैसे कोई बैठक करने आया हो, फ़ोन करने नहीं।
"पानी लाऊँ?" माँ ने पूछा।
"बैठिए," रामावत जी ने कहा। "पहले बात।"
माँ रुकी, फिर दीवार के सहारे बैठ गईं। रीना भी भीतर से आकर दरवाज़े के पास खड़ी हो गई।
रामावत जी ने मेरी तरफ़ देखा।
"मुझे सब पता है," उन्होंने कहा। "भवानी। टोकन। हवेली। तेरे पापा। तेरे दादा। सब।"
मैं चुप रहा।
"पर मैं काग़ज़ नहीं माँगता," वो बोले। "न तेरी ज़मीन, न तेरा हवेली का हिस्सा, न तेरे पास की कोई चीज़। बस एक बात पूछता हूँ — तेरे पास जो पैसा है, वो साफ़ है?"
कमरे में हवा रुक गई। माँ की उँगलियाँ साड़ी के पल्लू पर जम गईं।
मैंने उनकी आँखों में देखा। छुपाने की कोशिश नहीं की, क्योंकि छुपाने की बात ही नहीं थी।
"रामावत जी," मैंने कहा, "मेरी जेब में जो है, उसका हिसाब मैं बता सकता हूँ। हर नोट पर मेरा काम है। मेरी शिफ़्ट है। मेरी रात है। जो मरीज़ मैंने डॉक्टर तक पहुँचाया, जो काग़ज़ मैंने सही करवाया, जो ज़मीन किसी की बची — वो मेरा हिसाब है।"
मैंने जेब से टोकन निकाला। उनके सामने नहीं रखा — सिर्फ़ हाथ में पकड़ा।
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