The Token System – Chapter 1139
"तीसरा पत्थर — यादी," सुमन ने दोहराया। "यानी तीसरे पत्थर में जो है, वो याद रखने वाला है। कुछ ऐसा जो बताता है कि क्या हुआ था।" उसने पर्ची वापस मेरी तरफ़ बढ़ाई। "जैसे कोई नाम, या कोई रसीद — जिसे देखकर पता चले कि किसने क्या किया।"
मैंने पर्ची जेब में रखी। "मतलब — तीसरे पत्थर में दादा का कुछ है।"
"या तीनराम का।" सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "या दोनों का।"
दोपहर को अदालत के लिए निकला। जेब में टोकन, रसीदें, पर्चियाँ — सब साथ। ग्यारह तारीख़ दूर नहीं है और हवेली का तीसरा पत्थर अभी खुला पड़ा है।
गली के मोड़ पर शेखर बाबू मिले। उनके हाथ में मेरी डिबिया वाली चाबी थी — मैंने उन्हें दी थी।
"ये रख," उन्होंने कहा। "मेरी दराज़ की नहीं है। मैंने सारी दराज़ें खोल के देखीं।"
"तो ये किसकी है?"
"ये उस दराज़ की है," उन्होंने धीरे से कहा, "जो तेरे पापा ने रखी थी।" उनका हाथ मेरे कंधे पर रखा। "मन्नू — तेरे पापा ने कभी एक बात कही थी, जब वो बीमार थे और मैं उनसे मिलने आया था — 'शेखर भाई, जब मेरा बेटा हिसाब पूरा कर ले, तो उससे कहना — टोकन मेटी के नहीं, सुखदेव के हाथ का था।' मैंने उनसे पूछा था — मेटी कौन? वो बस हँसे थे।"
मैं रुक गया। "माँ का नाम कोई और था, शेखर बाबू। उनका नाम मेटी नहीं था।"
"मुझे पता है।" उन्होंने चाबी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "मेटी नाम किसी और का है। और यही तीसरा नाम है — जो अभी खुला नहीं।"
मैंने चाबी ली। "शेखर बाबू, ये तीसरा नाम क्या है?"
"मुझे नहीं पता।" उन्होंने अपनी मेज़ की तरफ़ देखा। "पर जब मैंने आज सुबह अपनी मेज़ के अलमारी की सबसे नीचे दराज़ खोली, तो उसमें एक काग़ज़ था। सिर्फ़ एक नाम — 'मेटी'। और उसके नीचे लिखा था — 'यही तीसरा हिस्सा है।'"
"कौन लाया उसे?"
"सुबह जब मैं आया, वो दराज़ खुली थी। काग़ज़ रखा हुआ था। किसी ने अपना नाम नहीं छोड़ा।" उन्होंने मुझे देखा। "मन्नू, मुझे लगता है — तीसरा हिस्सा वो ख़ुद है जो तेरे पास आना चाहता है।"
"मेटी।" मैंने नाम ज़ुबान पर लिया।
दोपहर की धूप में नाम जैसे हवा में लटक गया।
शेखर बाबू चले गए। मैं गली में अकेला खड़ा था और जेब में टोकन, चाबी, पर्ची — सब एक ही जगह। मैंने टोकन निकाला और उलटा किया — पीछे दादा का नाम अभी भी था। मैंने टोकन सीधा किया।
उसके ऊपर नई लकीर उभर आई थी।
उस नई लकीर के नीचे एक शब्द था। और वो शब्द था —
"मिल।"
॥
रिकॉर्ड कमरे की अलमारी मैंने खींची तो उसके पीछे की दीवार से सफ़ेद प्लास्टर का एक टुकड़ा अपने आप उखड़कर गिरा। नीचे पुरानी ईंट दिखी — और ईंट के साथ ही एक मोटी तह लगी पीली फाइल दीवार से चिपकी हुई।
"रुक," सुमन ने मेरा हाथ पकड़ा। "मत तोड़ इसे। अदालत का काग़ज़ है, तेरे पास नहीं रह सकता। पहले पढ़ ले, फिर मेरे पास रहेगी।"
मैंने फाइल खींची। कवर पर स्याही से लिखा था — "हवेली। कर्मचारी सूची। उन्नीस सौ अठहत्तर।"
मैंने पन्ने पलटे। एक-एक नाम, एक-एक अंगूठा, हर पन्ने पर मुंशी का दस्तख़त। बीच में एक पन्ना ऐसा था जिसमें पूरी लिखाई किसी और हाथ की थी।
"माली की नियुक्ति। हवेली के मालिक हरि सिंह के कहने पर सुखदेव पुत्र देवीलाल।"
मेरी उँगली पन्ने पर अटक गई।
"आगे पढ़," सुमन ने धीरे से कहा।
उस पन्ने के नीचे एक अलग हाशिया जुड़ा था — छोटी, काँपती लिखाई में, जो दादा की नहीं थी। मुंशी की थी।
"माली ने हवेली में दो पीतल के टोकन दीवार में राज़ी-ख़ुशी रखे। मालिक के कहने पर। बाहर वाला झूठा, भीतर वाला सच्चा। वह जानता है जिसे मालिक ने बताया। सुखदेव को इस हिसाब में कोई हक़ नहीं दिया जाएगा। हरि सिंह।"
मैं उस हाशिये को दो बार पढ़ गया।
"यानी दादा ने टोकन चुराए नहीं थे," मैंने कहा। "छुपाए थे। हरि सिंह के कहने पर।"
सुमन ने फाइल मेरे हाथ से लेकर उस पन्ने को रोशनी की तरफ़ किया। "और हरि सिंह ने ये लिखवा दिया कि सुखदेव का इस हिसाब में कोई हक़ नहीं। ताकि जिस दिन ये दीवार खुले और किसी को कुछ मिले, तो सुखदेव का नाम पहले से ही काट दिया गया हो।"
"पर वो भूल गया," मैंने कहा, "कि जो हरि सिंह की लिखाई में ये ले रहा है, वो पन्ना यहीं भूल जाएगा।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "इसे मेरे पास रख। अदालत में मैं पेश करूँगी — आज नहीं, पर जब पापा की सफाई की बारी आए।"
"अब पापा की सफाई की बारी क्या है।"
"किशोरी लाल ने अदालत में ये कहा था कि तेरे पापा ने हिसाब में हेराफेरी की।" सुमन ने फाइल बंद की। "ये काग़ज़ बताता है कि हेराफेरी किसने शुरू की थी।"
मैंने अपनी जेब से वो रसीद निकाली जो कल शेखर बाबू की मेज़ से मिली थी — कर्ज़ की, जिसके पीछे पेंसिल में लिखा था — "कर्ज़ सुखदेव ने चुकाया।"
"ये देख," मैंने कहा। "पापा ने टोकन गिरवी रखकर मेरी फ़ीस चुकाई थी। और यहाँ लिखा है कि कर्ज़ दादा ने चुकाया।"
सुमन उस लाइन को देखती रही। "मतलब दादा ने कर्ज़ अपने नाम पर लिया, पापा ने उसे चुकाया, और जब काग़ज़ आया तो दादा का नाम आगे कर दिया गया।"
"या," मैंने कहा, "दादा ने कर्ज़ का बोझ अपने ऊपर ले लिया, ताकि हिसाब में पापा का नाम कहीं न आए।"
सुमन ने रसीद मुझे वापस दी।
"तो तेरे पापा ने वही कर्ज़ चुकाया जो दादा ने अपने नाम पर लिया था," उसने कहा। "और तूने वही हिसाब पूरा किया जो दादा ने अधूरा छोड़ा था। तीन पीढ़ियाँ, एक ही हिसाब।"
मैंने रसीद तह कर जेब में रखी। "अब ये काग़ज़ हमारा हथियार है," मैंने कहा। "किशोरी लाल कहेगा पापा ने हेराफेरी की — और ये काग़ज़ कहेगा कि हेराफेरी का शुरू हरि सिंह ने किया।"
"पर ये फाइल मेरे पास रहेगी," सुमन ने कहा। "जब तक अदालत न माँगे, तेरे हाथ में नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि अब तू गवाह है, पक्ष नहीं।" उसने फाइल अपने बैग में रखी। "और गवाह के पास काग़ज़ कम, बात ज़्यादा होनी चाहिए।"
मैं हँसा। "ये तुझे कहाँ से आया?"
"तेरे से।" वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। "तूने कल अदालत में जो किया, वो किसी गवाह ने नहीं किया था। किसी पक्ष ने नहीं किया था। तूने सिर्फ़ सच कहा और अपने हिसाब को सामने रखा।"
कमरे से बाहर निकले तो गलियारे की धूप आँखों में लगी। सुमन मेरे साथ चलने लगी। दो कदम चलकर वो रुकी।
"मन्नू, एक बात है।"
"हूँ।"
"भवानी के होम के काग़ज़ों की जाँच शुरू हो गई है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "बारह जगहों से रजिस्टर माँगे गए हैं। मुझे भी गवाही के लिए बुलाया है — परसों।"
मैं रुक गया।
"तू डर रही है?"
"ना।" उसने कहा। "पर मैंने उनसे झूठ बोला था — एक बार। तीन साल पहले, जब भवानी के आदमी मरीज़ ले जाने आए थे और मैंने कहा था — मरीज़ यहाँ नहीं है।" उसकी आवाज़ नीची हुई। "वो वही मरीज़ थी जिसकी बाद में मौत हो गई।"
"तूने झूठ बोला था बचाने के लिए," मैंने कहा। "और जो उसे ले गए थे, वो उसका हिसाब हैं।"
"अदालत को ये फ़र्क़ समझाना पड़ेगा।"
"तू डर मत," मैंने कहा। "जो सच है वही बोलना। बाकी सब अदालत के काग़ज़ अपने आप कह देंगे।"
सुमन ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर वो मुस्कुराई — वो हँसी जो डॉक्टर के चेहरे पर कम ही आती थी।
"पहली बार किसी ने मुझे ये बात कही है," उसने कहा। "लोग मुझे बस कहते आए हैं — तुम्हें ये नहीं करना चाहिए था, तुम्हें वो नहीं कहना चाहिए था।"
"लोगों से मत पूछ," मैंने कहा। "अदालत बात सुनेगी।"
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