The Token System – Chapter 1138
पहला — एक पुरानी रसीद। कुएँ के पानी के रजिस्टर की। ऊपर लिखा — "तीन घर। बंटवारे का पानी।" नीचे तीन नाम — एक भवानी के बाप का, दूसरा रामदीन मिस्त्री का और तीसरा — मैंने पढ़ा — "तीनराम"।
दूसरा — एक चिट्ठी। नाना की लिखाई में।
तीसरा — एक लिफ़ाफ़ा। ऊपर लिखा — "मनोहर के लिए।"
मैंने रीना की तरफ़ देखा। "तीनराम — नाना।" उसने धीरे से कहा।
माँ ने चिट्ठी उठाई। उसका हाथ काँप रहा था।
"पढ़ूँ?" उसने पूछा।
"पढ़ो।"
अक्षर साफ़ थे, पर स्याही उतर गई थी। माँ ने पढ़ना शुरू किया, धीरे-धीरे।
"मेरा नाम तीनराम। ये कुआँ मेरे पास है। बंटवारे के वक़्त मुझे ये लिखवाया गया था कि मैं कुएँ का पानी तीन घरों को दूँगा। पर ये कुआँ उस आदमी का है जिसने हमें बाँटा था।"
माँ रुकी। मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"आगे पढ़ो, माँ।"
"हरि सिंह ने ये कुआँ अपने नाम कर लिया, काग़ज़ पर। पर पानी उन लोगों का है जिनका हक़ था। मैंने ये रजिस्टर सुखदेव — मन्नू के दादा — को दिया था। पानी का पानी को। जब मेरे पास कुछ नहीं बचा, तो उन्होंने मुझे बचाया। मेरा हिसाब उनका है।"
माँ ने काग़ज़ नीचे रख दिया। "हिसाब," उसने कहा। "हर काग़ज़ में यही शब्द।"
तीसरा लिफ़ाफ़ा उठाया। ऊपर सिर्फ़ मेरा नाम था — मनोहर। नीचे तीन लकीरें — वही निशान।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक ही काग़ज़ था। ऊपर कुछ नहीं लिखा था। बस नीचे, कोने में, एक लाइन —
"तेरा हिसाब साफ़ है।"
नीचे हस्ताक्षर — भवानी सिंह।
मैं काग़ज़ हाथ में लिए खड़ा रहा।
रीना ने पूछा, "किसकी?"
"उसकी," मैंने कहा। "जिसे अब कोई नहीं बचा।"
माँ ने काग़ज़ पढ़ा। उसका चेहरा सख़्त था। "फेंक दे।"
"नहीं, माँ।" मैंने काग़ज़ तह किया। "रख लूँगा। याद रहे कि हिसाब कभी मिटता नहीं, बस बराबर होता है।"
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। "पर उसने ये यहाँ क्यों छिपाया?"
"क्योंकि ये वो काग़ज़ है जो उसने ख़ुद लिखा।" मैंने काग़ज़ जेब में रखा। "उसने अपने हाथ से लिखा — तेरा हिसाब साफ़ है — और ये यहाँ रखा, जहाँ सिर्फ़ मैं और वो जानते हैं।"
"कैसे जानते हैं?"
"क्योंकि ये चाबी उसने भिजवाई होगी।" मैंने चाबी उठाई। "डाकिये वाली औरत भवानी की आदमी थी। और वो औरत जो अदालत में बसंती के साथ थी — वो भी।" मैंने साँस ली। "भवानी अपना हिसाब ख़ुद साफ़ कर रहा है, बंसी। एक-एक करके।"
"तब तो ठीक है," बंसी ने कहा। "पर वो कभी हमारा नहीं होगा। उसने बीस साल किसी के पेट पर लात मारी है।"
"मुझे पता है।"
"फिर ये रखने का मतलब?"
मैंने रीना की तरफ़ देखा। "मतलब ये — जब रोटी बाँटी जाए, तो हिसाब बताने के लिए कोई काग़ज़ चाहिए। ये मेरा काग़ज़ है। भवानी भले न हो, पर उसका लिखा हुआ रहे — कि हिसाब बराबर हो चुका है।"
बंसी कुछ नहीं बोला। फिर हँसा। "तू ना, हर हिसाब में एक दोस्त भी डाल देता है।"
रात घर लौटे तो माँ ने खाना बनाया। रीना ने मेहंदी के डिब्बे से अपने हाथ भरे और फिर बोली — "ग्यारह तारीख़ तय है। तेरे हिसाब से नहीं — मेरे हिसाब से।"
"मेरा हिसाब अब ख़त्म है।"
"तेरा हिसाब ख़त्म नहीं है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तेरे हिसाब में दादा का नाम आया है। सुखदेव। और माँ कह रही थी कि नाना का हिसाब भी आया है। तीनराम। अब बता — दादा का नाम कहाँ है? रजिस्टर में या तेरे टोकन में?"
मैं चुप रहा।
"तेरे टोकन से पूछ," रीना ने कहा। "मुझे लगता है, उसके पास जवाब है।"
रात दस बजे मैंने टोकन जेब से निकाला। "हिसाब बराबर" वाली पर्ची भी साथ थी। मैंने टोकन हाथ में पकड़ा।
न वो गरम हुआ, न ठंडा।
मैंने उसे कान के पास लिया।
कुछ नहीं।
मैंने फिर पकड़ा। "दादा का नाम कहाँ है?" मैंने पूछा। "सुखदेव।"
टोकन चुप रहा।
"तीनराम?"
टोकन चुप रहा।
"शेखर?"
"शेखर?"
टोकन पर पहली बार खरोंच जैसी आवाज़ आई। फिर मिट गई।
सुबह आठ बजे बंसी दुकान पर मिला। उसने मेरे हाथ में टोकन देखा और कुछ नहीं कहा।
"सुन," उसने कहा, "शेखर बाबू आज अस्पताल से अपनी मेज़ खाली कर रहे हैं। नई क्लर्क आ गई है।"
"नई क्लर्क?"
"हाँ, किसी की बेटी है। उन्होंने कहा — जाने से पहले तुझे कुछ देना है।"
मैं अस्पताल पहुँचा। गलियारे में मुझे सुमन मिली।
"नौकरी पक्की है," उसने कहा। "और सुन — शेखर बाबू के काग़ज़ों में एक और पुरानी रसीद मिली है। उस पर भी तेरे पापा का नाम है।"
"और क्या है उसमें?"
"वही।" उसने रसीद मेरी तरफ़ बढ़ाई। "देख ले।"
मैंने रसीद पलटी। ऊपर पापा का नाम — किशनचंद। नीचे रकम — तीन हज़ार। मुहर — अस्पताल की।
"ये वही कर्ज़ है," सुमन ने कहा। "जो तेरे पापा ने टोकन गिरवी रखकर चुकाया था। पर इसमें एक फ़र्क़ है।"
"क्या?"
"उलटी तरफ़ देख।"
मैंने रसीद पलटी। पीछे फीकी पेंसिल में लिखा था —
"यह कर्ज़ उस आदमी ने चुकाया जिसने टोकन छुपाया था, और उसका नाम है सुखदेव।"
मैं रसीद हाथ में लिए खड़ा रहा। सुमन ने मेरी मुट्ठी की तरफ़ देखा, जो सख़्त हो गई थी।
"मन्नू," उसने कहा, "ये काग़ज़ तेरे दादा का है। और तेरा टोकन तेरे पास है। अब बता — तेरा दादा तेरे टोकन में कहाँ है?"
मैंने टोकन जेब से निकाला। हाथ में पकड़ा।
इस बार टोकन अंदर से गरम हुआ। धीमा। जैसे किसी ने दूर से दीया जलाया हो।
"— तो?" सुमन ने पूछा।
"दादा का नाम," मैंने कहा, "मेरे टोकन के पीछे लिखा है।"
"पीछे?"
"हाँ।" मैंने टोकन उलटा किया और सुमन की तरफ़ बढ़ाया। "देख।"
टोकन के पीछे, उभरे हुए अक्षरों में, वो नाम आ गया था — "सुखदेव।"
सुमन ने देखा। "कब से?"
"अभी।" मैंने टोकन वापस जेब में रखा। "जब मैंने कहा — दादा का नाम मेरे टोकन के पीछे लिखा है।"
"तूने कहा, तो उभर आया?" उसने पूछा।
"नहीं।" मैंने टोकन जेब से फिर निकाला और उसके पीछे देखा। नाम अब भी वहीं था। "ये मेरे कहने से नहीं आया। ये तब आया जब मैंने रसीद पर दादा का नाम पढ़ा। टोकन को हिसाब दिखता है — काग़ज़ नहीं, हिसाब।"
सुमन एक पल चुप रही। फिर बोली — "तो अब क्या?"
"अब?" मैंने टोकन जेब में रखा। "अब मंडप। फिर तीसरा पत्थर — यादी।"
"यादी क्या है?"
"नहीं पता।" मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "पर इतना पता है — जो भी है, वो उसी हाथ में आएगा जिसने हिसाब बराबर किया है। और ये हाथ," मैंने हाथ उठाया, "अब ख़ाली नहीं है।"
सुमन हँसी। "तेरे हाथ में क्या है?"
"काग़ज़," मैंने कहा। "और कुछ नहीं।" मैंने मुड़कर देखा। "पर काग़ज़ भी कम नहीं होता।"
सुमन ने रसीद मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये तेरी है। रख ले।"
मैंने रसीद ली। मोड़कर जेब में रखी — उस जेब में जहाँ टोकन था। दोनों साथ।
"सुन," सुमन ने कहा, "कल अदालत में एक और चीज़ आएगी। तीनराम के कुएँ का रजिस्टर। मुझे लगता है — वो तेरे पास भी नहीं है, किसी और के पास है।"
"किसके पास?"
"शेखर बाबू ने कहा था — जिसने वो काग़ज़ भेजा, वो अदालत का आदमी नहीं था।"
मैंने अपनी जेब से वो हरी स्याही वाली पर्ची निकाली — "तीसरा पत्थर — यादी।"
"यादी," मैंने कहा। "क्या ये नाम है?"
सुमन ने पर्ची पर उँगली रखी। "नाम नहीं है," उसने कहा। "यादी का मतलब है — याद रखने वाला। जो चीज़ याद रखी जाए।" मैंने उसकी तरफ़ देखा।
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