The Token System – Chapter 1130
"क्यों?"
"क्योंकि तेरे बाप ने कल जो किया, वो किसी के कहने से नहीं किया। उसने दीवार के सामने खड़े होकर अपना टोकन ख़ुद लौटाया। तू उसका बेटा है, तो कम से कम इतना तो कर — खड़ा रह।"
अमर ने चाय का कप रख दिया। "मन्नू, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"तूने मेरा नाम दीवार पर क्यों लिखा? मैं तो उस दिन तेरे साथ था भी नहीं।"
मैंने सोचा। सच में सोचा। "क्योंकि तेरे बाप ने कहा था — जो हिसाब चुकाएगा, वही नाम लिखेगा। और तूने उस दिन ख़ुद कहा था — मैं चुकाऊँगा। तेरे बाप ने टोकन लौटाया। पर हिसाब तूने चुकाया। मैंने सिर्फ़ कलम चलाई।"
अमर ने मेरी तरफ़ देखा। पहली बार उस दिन उसकी आँखों में कुछ ज़िंदा दिखा।
"तेरे बाप ने कल रात मेरे बारे में कुछ कहा था?" मैंने पूछा।
"कहा।" अमर उठा और बैग उठाया। "कहा — मन्नू के दादा ने मुझे एक बात सिखाई थी। आज मैं तुझे सिखा रहा हूँ। हिसाब वो नहीं जो किताब में लिखा है। हिसाब वो है जो तेरे बेटे की किताब में लिखा जाएगा।"
वो चलने लगा, फिर रुका। "मैं अदालत आऊँगा। नौ बजे।"
अदालत के बाहर भीड़ थी। कम्मो सामने की बेंच पर बैठी थी, और उसकी लाठी उसके घुटनों के बीच टिकी थी। जगदीश काग़ज़ों के बंडल से खेल रहा था जैसे ताश के पत्ते हों। बंसी ने मेरे आते ही कहा, "भवानी अंदर है। पहले से। दस मिनट से।"
"अकेला?"
"अकेला। बाहर उसका वकील भी नहीं। कह रहा है — मुझे वकील नहीं चाहिए। मैं ख़ुद बोलूँगा।"
अंदर जाने से पहले मैंने सुमन से कहा, "पर्ची संभालकर रखी है?"
"जेब में है," सुमन ने कहा। "पर मन्नू, वो पर्ची सिर्फ़ एक काग़ज़ है। अदालत उसे देखेगी, पढ़ेगी, और फिर बाक़ी सब सुनेगी। कल की बात याद रखना — भवानी ने ख़ुद कहा था, बाकी बातें अदालत तय करेगी।"
बंसी ने धीरे से कहा, "मुझे तो अब भी लग रहा है कि वो कुछ और बोलेगा। बूढ़ा है, पर चालाक भी है।"
"आज चालाकी नहीं चलेगी," मैंने कहा। "आज वो ख़ुद अपने बेटे के सामने खड़ा है। बाप अपने बेटे के सामने झूठ नहीं बोलता।"
अंदर पहुँचे तो भवानी अपनी कुर्सी पर सीधा बैठा था। उसने हमें देखा और हल्का-सा सिर हिलाया। इतना ही। न कोई मुस्कान, न कोई झुकाव।
अमर दरवाज़े पर आया तो सबकी नज़रें उस पर गईं। उसने भवानी की तरफ़ नहीं देखा। सीधा आकर मेरे पीछे बैठ गया।
अदालत शुरू हुई। जज ने काग़ज़ देखे और कहा, "भवानी सिंह, कल तुमने ख़ुद इक़बालिया दिया है। उसे दोहराओ।"
भवानी खड़ा हुआ। उसकी आवाज़ साफ़ थी, बिना काँपे। "जो टोकन मेरे पास इक्कीस साल था, वो मेरा नहीं था। वो इस हवेली का था, और हवेली उस आदमी की थी जिसने उसे सेठ गोवर्धनदास से ख़रीदा — सुखदेव। मेरे पास वो टोकन सिर्फ़ इसलिए रहा कि मैं उसे लौटाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। कल मैंने वो टोकन दीवार में लौटा दिया।"
जज ने पूछा, "अब हवेली पर तुम्हारा दावा क्या है?"
भवानी ने एक पल रुककर कहा, "कोई दावा नहीं। हवेली अमर सिंह की है। मेरा बेटा मेरे बाप के पाप का बोझ नहीं उठाएगा।"
हॉल में सन्नाटा। अमर ने अपना सिर उठाया। मैंने देखा, उसके हाथ कुर्सी की बाहें पकड़े हुए थे, और उनकी पकड़ ढीली पड़ गई थी।
जज ने कहा, "अमर सिंह, तुम्हारा बयान?"
अमर उठा। वो कुछ बोलने ही वाला था कि भवानी ने कहा, "एक बात पहले।" जज ने इजाज़त दी। भवानी मुड़ा और अपने बेटे की तरफ़ देखा।
"अमर," उसने कहा, "तेरे दादा ने मुझे एक बात कही थी जो मैंने नहीं मानी। मैं चाहता हूँ तू माने। हवेली तेरी है, पर हिसाब तेरा भी है। जिस दिन तू अपने बेटे को ये सब सच-सच बताएगा, उस दिन ये हवेली फिर से ज़िंदा होगी।"
अमर ने गला साफ़ किया। "जज साहब, मुझे हवेली नहीं चाहिए। मुझे ये चाहिए कि मेरे बाप अपने बाप के पाप से आज़ाद हों। वो आज ख़ुद यहाँ खड़े होकर आज़ाद हुए हैं। मेरा दावा इतना ही है।"
जज ने कलम उठाई और काग़ज़ पर कुछ लिखा।
बाहर आए तो धूप तेज़ थी। कम्मो ने अपनी लाठी ज़मीन पर टेक दी और कहा, "जगदीश, मुझे चाय चाहिए। असली वाली। आज मैं आधी रात तक जागूँगी।"
जगदीश हँसा। "कम्मो बाई, आज तो पूरा गाँव जागेगा।"
बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "सुन, अब तू क्या करेगा? हवेली की चाबी तेरे हाथ में है न?"
"चाबी मेरे हाथ में नहीं। मैं सिर्फ़ किराएदार हूँ। मालिक अमर है।"
"तो तू हवेली छोड़ देगा?"
"छोड़ेगा क्यों?" सुमन बीच में बोली। "हवेली ख़ाली है। कोई रहेगा तो ज़िंदा रहेगी। चाबी मन्नू के पास रहेगी, और हवेली का हिसाब — अमर के पास।"
शाम को जब मैं घर लौटा, बरामदे में बैठकर जूते उतार रहा था कि रीना आई। हाथ में टिफ़िन था। "तेरे लिए। खाना ठंडा हो गया था।"
"तू आई?"
"क्यों न आती? अख़बार में तेरा नाम था। माँ ने काटकर रख लिया है। बोली — देख, ये हमारा मन्नू है।"
मैं हँसा। "मैंने क्या किया? मैंने सिर्फ़ दीवार पर नाम लिखा था।"
"हाँ," रीना ने कहा, "और उस दीवार ने सब कुछ बदल दिया।"
वो जाने लगी, फिर रुकी। "एक बात कहूँ? अगली बार जब तू किसी हवेली की चाबी लेकर निकले, तो मुझे बता दे। अच्छे से बता दे।"
"डर गई थी?"
"नहीं। बस अकेली रह गई थी। अब जब गाँव में तेरी कहानी चले, तो मेरी भी कुछ जगह हो।"
मैंने टिफ़िन खोला। उसमें रोटी, सब्ज़ी और एक पर्ची थी — "जीत की बधाई। कल अस्पताल मत भूलना।"
रात को मैं बंसी के साथ हवेली की तरफ़ गया। दरवाज़े पर ताला लगा था, पर भीतर से एक हल्की रोशनी दिख रही थी। बंसी ने झाँका। "अंदर कोई है।"
हम अंदर गए। आँगन में मिट्टी का दीया जल रहा था। पास में एक काग़ज़ रखा था जिस पर लिखा था — "हवेली का पहला हिसाब। आज से।"
मैंने काग़ज़ उठाया। पीछे एक लाइन थी — "जो इसे पढ़ेगा, वो इसका हिस्सा है।"
बंसी ने कहा, "अमर आया था?"
"नहीं," मैंने कहा। "भवानी।"
"भवानी? अंदर आया? बिना चाबी के?"
"उस दीवार को छूने के लिए चाबी नहीं चाहिए," मैंने कहा। "वो गाँव की सबसे पुरानी दीवार है। वो सबकी है।"
उसी वक़्त पीछे से पैरों की आहट आई — धीमी, पर साफ़। दरवाज़े पर भवानी खड़ा था। उसके हाथ में अपना टोकन था।
गरम। चमकता हुआ। इक्कीस साल बाद भी वो जल रहा था।
॥
दरवाज़े पर भवानी खड़ा था। उसके हाथ में टोकन था, गरम, चमकता हुआ, और उसकी रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। मैंने बंसी को कोहनी मारी। बंसी ने भी देख लिया था। दीये की लौ हिल रही थी, और भवानी की परछाईं दीवार पर एक ऊँचे पेड़ जैसी लंबी हो रही थी।
"यह मेरा टोकन है," भवानी ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "इसे मेरे हाथ से मेरे बेटे ने चुराया था। आज सुबह मुझे वापस मिला।"
मैंने अपना हाथ जेब पर रखा — आदत से, जबकि जेब में अब कुछ नहीं था। "तो इसे उसी खाँचे में रख दो, जहाँ से आया था।"
भवानी हँसा। वैसी हँसी नहीं जो मैंने अदालत में सुनी थी। पतली, थकी हुई। "मैंने अपना हिसाब चुका दिया। अब यह टोकन मेरा नहीं रहा।" उसने हाथ आगे बढ़ाया। "यह तेरा है।"
मैंने नहीं लिया। "मुझे नहीं चाहिए।"
"तू नहीं चाहेगा तो यह दीवार वापस माँगेगी।"
बंसी ने धीरे से कहा, "मन्नू, ले ले। बात करने का वक़्त नहीं है।"
मैंने भवानी के हाथ से टोकन लिया। वो ठंडा था — बिलकुल ठंडा। जबकि अभी एक पल पहले रोशनी दे रहा था। मैंने उसे पलटा। पीछे कोई अंक नहीं था, कोई लकीर नहीं। सिर्फ़ चिकना पीतल, और उस पर एक फीका सा निशान जो मिट चुका था। भवानी ने अपनी जेब से एक और चीज़ निकाली — मेरा टोकन, जो दीवार के निचले खाँचे में रखा था। वो भी उसके हाथ में था।
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