The Token System – Chapter 1127
दरवाज़े पर वो एक पल रुका। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। बस एक हाथ उठाकर दरवाज़े की चौखट पर रखा, और बाहर निकल गया।
बाहर आँगन में पत्रकार जमा थे। राजेंद्र ने हमें बगल के रास्ते से निकाला। "अभी नहीं," उसने कहा। "पहले काग़ज़ साइन हों, फिर मीडिया। बोलने से काग़ज़ नहीं बदलते।"
हम पिछले गेट से निकले। गली में सफ़ेद गाड़ी नहीं थी। सिर्फ़ एक ऑटो खड़ा था, जिसका चालक सो रहा था।
मैंने जेब से टोकन निकाला।
वो गरम था, पर जैसा पहले होता था — जलाने वाला नहीं। हथेली में रखकर मैंने उसे पलटा। उस पर लकीरें थीं — बीस पूरी, और उनके नीचे वो नई लकीर जो कल पूरी उभरी थी। और उसके नीचे शब्द।
पर आज शब्द बदल गया था।
अब वहाँ लिखा था — "हिसाब बराबर। एक काम बाकी।"
मैंने तीन बार पढ़ा। हिसाब बराबर। पर — एक काम बाकी।
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। वो मेरे कंधे के ऊपर से टोकन देख रही थी।
"क्या लिखा है?" उसने पूछा।
"हिसाब बराबर," मैंने कहा। "पर एक काम बाकी।"
सुमन कुछ पल चुप रही। फिर बोली, "हिसाब बराबर हो गया मतलब जो चुकाना था, चुक गया। पर एक काम बाकी है — मतलब कोई चीज़ अभी अधूरी है।"
"कौन सी?"
"शायद टोकन ख़ुद बताए।" उसने कहा।
मैंने टोकन कान के पास लाया। बहुत पहले, जब ये सब शुरू हुआ था, तो टोकन सिर्फ़ काम बताता था — कोई सलाह नहीं, कोई जवाब नहीं। पर आज उसने कुछ कहा।
आवाज़ धीमी थी, जैसे किसी बूढ़े का फुसफुसाना। मैंने सुना — "नाम वह, जिसने सबसे ज़्यादा झेला।"
मैंने टोकन नीचे किया। हाथ में उसे देखा। शब्द वही थे — "हिसाब बराबर। एक काम बाकी।" पर आवाज़ कान में बज रही थी।
"क्या कहा?" सुमन ने पूछा।
"नाम वह, जिसने सबसे ज़्यादा झेला," मैंने दोहराया।
सुमन ने अपना बैग कंधे पर ठीक किया। "तो सोच, किसने सबसे ज़्यादा झेला?"
मैंने आँखें बंद कीं। माँ — बीस साल चुप रही, बोलती तो हवेली छिन जाती। सुखिया — कुएँ में मरा, नाम काग़ज़ से मिटा दिया गया। कौशल्या — बीस साल हिसाब छिपाया, दो बच्चों को अकेले पाला। कम्मो — तीन बहनों में से आख़िरी, जिसने श्रीपत के कहे पर अपनी बहन को धक्का दिया और बीस साल पछताया। बंसी — जिसके पापा का हिसाब छीन लिया गया, जिसने बीस साल दुकान बंद रखी। शेखर बाबू — जिसने डर के मारे बीस साल भवानी के लिए काम किया। सुमन — जिसने अपने पापा का हिसाब बचाने के लिए अपना नाम तक नहीं छोड़ा।
सबने झेला।
पर एक नाम ऐसा था जो सबसे ऊपर आया।
"अमर," मैंने कहा।
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "हाँ।"
"अमर ने सबसे ज़्यादा झेला," मैंने कहा। "वो भवानी का बेटा था, पर भवानी ने उसे उसकी माँ से अलग कर दिया। वो चालीस साल का होकर भी अपने बाप से डरता रहा। उसने काग़ज़ जलाने से मना किया, पर कुछ नहीं कर पाया। वो उस कोठरी में छह महीने बंद रहा — भूखा, प्यासा, अंधेरे में। और जब सब कुछ खुला, तो वो व्हीलचेयर पर अदालत आया, अपने बाप के ख़िलाफ़ नहीं — अपने बाप की तरफ़ से बोलने।"
मैंने टोकन को उलटा। उस पर कोई चमक नहीं थी। बस पीतल, गरम और चुप।
"तो यही लिखना है," बंसी ने आगे आकर कहा। "हवेली की दीवार पर — पूरी लकीरों के नीचे।"
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। "दीवार पर?"
"सुना नहीं?" बंसी ने कहा। "कम्मो बोली थी — जो हिसाब बराबर करे, उसका नाम दीवार पर लिखा जाए। मैंने सोचा, ये सबसे ऊपर रहेगा। पर अगर टोकन कह रहा है, तो जो सबसे ज़्यादा झेला, उसका नाम जाएगा।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो गली के मोड़ पर खड़ी थी, दुपट्टा ठीक कर रही थी। उसने मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया।
"ठीक कह रहा है बंसी," माँ ने कहा। "हिसाब सिर्फ़ पैसे का नहीं होता। हिसाब दर्द का भी होता है। और दर्द का हिसाब उसी के नाम लिखा जाता है, जिसने सबसे ज़्यादा सहा हो।"
मैंने टोकन जेब में रखा।
"तो चलो," मैंने कहा। "हवेली चलते हैं।"
हम पैदल चले। गली से बाहर, सड़क पर, फिर उस मोड़ से जहाँ से हवेली की छत दिखती थी। दोपहर की धूप थी, और हवेली की पीली दीवारें सफ़ेद सी लग रही थीं।
राजेंद्र गेट पर खड़ा था। सिपाही हट चुके थे। सिर्फ़ एक बोर्ड लगा था — "अदालत के आदेश तक प्रवेश वर्जित।"
"पर तुम्हारे लिए नहीं," राजेंद्र ने कहा, और बोर्ड हटा दिया। "अदालत ने साफ़ कहा — जो हिसाब बराबर करेगा, वो दीवार पर नाम लिखेगा। और तुमने कर दिया।"
मैं अंदर गया। आँगन में वही तीन दीये रखे थे, जो कम्मो ने कल जलाए थे। अब बुझे पड़े थे। दीवार पर वो जगह खाली थी, जहाँ कम्मो ने कहा था — नाम लिखा जाएगा।
मैंने टोकन जेब से निकाला। वो गरम था, पर हल्का।
"कैसे लिखें?" बंसी ने पूछा।
"टोकन से," मैंने कहा। "जैसे पहले सब कुछ लिखा जाता था।"
मैंने टोकन दीवार से लगाया। कोई चमक नहीं, कोई आवाज़ नहीं। पीतल का ठंडा हिस्सा दीवार से छू गया और उसके नीचे एक लकीर उभरी — एक नाम।
"अ — म — र"
तीन अक्षर, धीरे-धीरे, जैसे कोई बूढ़ा हाथ लिख रहा हो।
मैंने टोकन हटाया। दीवार पर नाम लिखा था। छोटा, पर साफ़।
बंसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "अब?"
"अब," मैंने कहा, "एक काम बाकी है — पर वो काम टोकन का नहीं, मेरा है।"
सुमन ने पूछा, "क्या?"
मैंने दीवार से हाथ हटाया। "अमर को हवेली में लाना है। उसका नाम दीवार पर है — तो हवेली में उसका हक़ भी होना चाहिए। कल अदालत में यही कहूँगा।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — गर्व नहीं, बस शांति।
"तो कल और एक सुनवाई," उसने कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "पर आज — आज हम सब घर चलें। रीना ने चाय बनाई है।"
बंसी हँसा। "चाय?"
"हाँ," मैंने कहा। "बीस साल की चाय।"
हम हवेली से बाहर निकले। दरवाज़े पर राजेंद्र खड़ा था। उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया।
"मनोहर," उसने कहा, "एक बात कहूँ?"
"कहो।"
"भवानी ने अदालत में जो किया — ख़ुद आकर सच बताया — वो पहले कभी नहीं किया। वो हार गया, पर उसने हार मानी। ऐसा आदमी आसानी से नहीं हारता। कल सुनवाई में उसके वकील कुछ और लाएँगे। तैयार रहना।"
मैंने सिर हिलाया। "तैयार हूँ।"
राजेंद्र ने मेरा कंधा थपथपाया और अपनी गाड़ी की तरफ़ चला गया।
हम घर की तरफ़ चले। रास्ते में बंसी ने कहा, "एक बात बताऊँ?"
"बता।"
"मैंने सोचा था, जब ये सब ख़त्म होगा, तो मैं अपनी दुकान खोलूँगा। पर अब लगता है — पहले एक और काम है।"
"क्या?"
"अमर को हवेली में लाना," बंसी ने कहा। "वो भी मेरा हिसाब है।"
मैं हँसा। "तो चल, कल दोनों मिलकर जाते हैं।"
घर पहुँचकर मैंने जेब से टोकन निकाला। वो ठंडा हो गया था, जैसे अपना काम कर चुका हो। पर उस पर शब्द वही थे — "हिसाब बराबर। एक काम बाकी।"
माँ ने चाय दी। रीना ने बिस्किट का डिब्बा खोला। हम चारों बैठे — माँ, रीना, बंसी और मैं।
"कल के बाद," रीना ने कहा, "जब सब ख़त्म हो जाए — तब मैं तुमसे कुछ पूछूँगी।"
"क्या?"
"अभी नहीं," उसने कहा। "पहले तुम्हारा हिसाब पूरा हो।"
मैंने चाय का कप उठाया। बाहर धूप ढल रही थी। हवेली का नाम मेरे नाम पर होने वाला था, पर अभी भी मेरे पास वही घिसी शर्ट थी, वही जेब, और वही टोकन — जो अब ठंडा था।
शाम को मैं छत पर गया। बंसी वहाँ था। हम दोनों चुपचाप बैठे रहे।
"बंसी," मैंने कहा, "कल अदालत में मैं अमर के हक़ की बात करूँगा। पर एक डर है।"
"क्या डर?"
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