The Token System – Chapter 1126
"क्योंकि," बंसी ने कहा, "मेरे लिए आज तक जो हिसाब चल रहा था, वो किसी और का था। अब अपना शुरू करूँगा। बस एक चाय, दो समोसे — और मेरा अपना हिसाब।"
मैं हँसा। और फिर मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और टोकन वहाँ नहीं था।
मेरा हाथ रुक गया। मैंने जेब टटोली, दूसरी, कमीज़ की नीचे वाली — कहीं नहीं।
"क्या हुआ?" बंसी ने पूछा।
"टोकन," मैंने कहा। "जेब में नहीं है।"
हम दोनों चुप हो गए। मैंने सीढ़ियों की तरफ़ देखा, नीचे के आँगन की तरफ़, फिर अपने कमरे की तरफ़। मुझे याद आया — आख़िरी बार मैंने उसे माँ के कमरे के पास, हाथ में लिया था।
मैं दौड़कर नीचे गया। माँ के कमरे का दरवाज़ा खुला था। माँ बैठी थी — और उसके सामने मेज़ पर, मेरे टोकन के पास, वो छोटा-सा उलटा पीतल का टुकड़ा रखा था, जो सुमन ने अदालत में दिया था।
दोनों एक-दूसरे के पास थे, और मेरे टोकन पर वो नई लकीर — अब पूरी उभर चुकी थी। और उसके नीचे एक शब्द — "दो"
मैं माँ के सामने बैठ गया।
"टोकन जेब से निकलकर यहाँ कैसे आया?" मैंने पूछा।
माँ ने अपनी तरफ़ देखा। "मैंने निकाला नहीं।"
"तो?"
माँ ने उस उलटे पीतल टुकड़े की तरफ़ देखा जो सुमन का था। "जब मैंने इसे टोकन के पास रखा, तो टोकन अपने आप उसकी तरफ़ खिसक गया। जैसे दो चीज़ें जो अलग रहकर अधूरी थीं — अब पास आकर पूरी हो गई हों।"
"इसका मतलब?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "मतलब — ये सिर्फ़ टोकन नहीं है, मन्नू। ये एक जोड़ी है। और जोड़ी अलग नहीं रह सकती।"
रात गहरी हो रही थी। बाहर कुत्ते भौंके। मैंने टोकन उठाया — वो गरम था, पर बहुत हल्का — जैसे कोई दूर से आवाज़ दे रहा हो।
उस पर लिखा था — "दो"।
कल सुबह दस बजे — अदालत। और अब टोकन के पास एक और सवाल।
॥
अदालत का पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था। बीस मिनट का ब्रेक ख़त्म हुआ, सिपाही ने दरवाज़ा खोला और जज साहब अंदर आए। कमरे में जितने लोग बैठे थे, सब एक साथ खड़े हो गए। मैंने भी घुटनों पर हाथ रखकर खुद को उठाया।
जज साहब बैठे। उन्होंने चश्मा पहना, सामने रखे काग़ज़ों को एक बार फिर से उलटा। फिर पानी का गिलास लिया, एक घूँट पिया, और बोले।
"मैंने सारे काग़ज़, सारी गवाहियाँ और सारे दस्तख़त देख लिए हैं। हवेली का जो हिसाब सौ साल से बंद था, वो आज खुल गया। अब सिर्फ़ फ़ैसला बाकी है।"
कमरे में कोई हिला नहीं। शुक्ला जी ने अपनी फ़ाइल पर हाथ रखा। भवानी सीधा बैठा था, आँखें ज़मीन पर। कम्मो ने अपनी लाठी दोनों हाथों से पकड़ी हुई थी।
जज साहब ने काग़ज़ उठाया।
"हवेली की ज़मीन के जो काग़ज़ उन्नीस सौ अट्ठहत्तर में बने थे, उनमें साफ़ लिखा है — हवेली तीन हिस्सों में बँटी थी। हरि सिंह, रामदीन मिस्त्री और सुखदेव माली। यह एक साबित हो चुका है।"
भवानी की तरफ़ कोई नहीं देख रहा था। मैं देख रहा था। वो एक बार भी ऊपर नहीं देखा।
"जहाँ तक सुखदेव के हिस्से का सवाल है," जज साहब ने आगे कहा, "वो काग़ज़ों से ग़ायब कर दिया गया था, पर उसका सबूत हमारे पास है — जंग लगी तिजोरी से निकली बही, सुखदेव की अपनी लिखाई, और पीतल की मुहर। इसलिए हवेली का जो हिस्सा सुखदेव का था, वो उसके वारिस का है — यानी मनोहर का।"
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसकी। माँ ने मेरा हाथ दबाया। बंसी ने पीछे से मेरी कमर पर हाथ रखा, जैसे कहे — गिरना मत।
"हवेली का दूसरा हिस्सा," जज साहब ने काग़ज़ पलटा, "जो बाद में हरि सिंह के नाम हो गया था, वो असल में कम्मो देवी का है। उसका काग़ज़ उसने आज ख़ुद अदालत में पेश किया है। इसलिए वो हिस्सा कम्मो देवी को लौटाया जाएगा।"
कम्मो ने आँखें बंद कर लीं। उसके बेटे रघु ने उसका कंधा पकड़ा।
"तीसरा हिस्सा, जो रामदीन मिस्त्री का था — उसका कोई दावेदार आज अदालत में नहीं आया, इसलिए वो हिस्सा अदालत के कब्ज़े में रहेगा जब तक कोई सही दावा न करे।"
अमर ने व्हीलचेयर में हल्का सा सिर उठाया। पर कुछ नहीं बोला।
"अब," जज साहब ने आवाज़ थोड़ी ऊँची की, "भवानी सिंह — आपके नाम पर जो ज़मीनें हैं, उनमें से ज़्यादातर वो हैं जो आपके पिता श्रीपत सिंह ने धोखे, दबाव और झूठे काग़ज़ों से हड़पी थीं। इस अदालत को यह मानने में कोई झिझक नहीं है कि आपने उन काग़ज़ों को जानते हुए आगे बढ़ाया।"
भवानी का सिर थोड़ा और झुका।
"पर," जज साहब ने चश्मा उतारा, "इस अदालत ने यह भी देखा है कि आपने आज ख़ुद आकर सच बताया। आपने वो काग़ज़ नहीं छिपाए जो आपके ख़िलाफ़ जाते थे। आपने अपना हिसाब साफ़ करने की कोशिश की। इसीलिए आपको आज हिरासत में नहीं लिया जाएगा।"
शुक्ला जी ने राहत की साँस ली।
"लेकिन," जज साहब ने आवाज़ सख़्त की, "भवानी सिंह के ख़िलाफ़ धोखाधड़ी, जाली काग़ज़ और ज़मीन हड़पने का अलग केस चलेगा। उसकी सुनवाई अलग अदालत में होगी। और उस केस के लिए उन्हें हर सुनवाई पर हाज़िर होना होगा।"
भवानी ने पहली बार सिर उठाया। उसने कुछ कहना चाहा, पर फिर चुप हो गया। उसका वकील झुककर कुछ कहने लगा, पर भवानी ने हाथ से रोक दिया।
"अब," जज साहब ने काग़ज़ उठाया, "आपकी ग़ैरक़ानूनी ज़मीनें — जो ग्यारह परिवारों से छीनी गई थीं — उनका हिसाब सुमन जी की चिट्ठी और इस अदालत में पेश हुए काग़ज़ों से मिल गया है। वो सारी ज़मीनें उन ग्यारह परिवारों को लौटाई जाएँगी। तहसील को आदेश दिया जाता है कि वो तीन दिन के अंदर नामांतरण की कार्रवाई शुरू करे।"
वकीलों की बेंच पर कुछ फुसफुसाहट हुई। पीछे किसी औरत ने रोना शुरू किया — एक बूढ़ी औरत, जो दो बच्चों के साथ बैठी थी। उसने अपना दुपट्टा मुँह पर रख लिया।
"और भवानी सिंह के नर्सिंग होम का जो काग़ज़ कम्मो देवी ने पेश किया है," जज साहब ने आगे कहा, "उसके मुताबिक़ वो नर्सिंग होम कम्मो देवी के नाम किया जाएगा। होम पर जो कर्ज़ है, उसकी जाँच होगी, और अगर कर्ज़ साबित नहीं हुआ तो वो रद्द होगा।"
शुक्ला जी खड़े हुए। "माय लॉर्ड, होम पर आठ लाख का कर्ज़ —"
"इस अदालत ने आपका कर्ज़ का काग़ज़ देखा है," जज साहब ने कहा। "उस पर कोई बैंक की मुहर नहीं, कोई गवाह नहीं। इसलिए जाँच होगी। कोई और बात?"
शुक्ला जी बैठ गए।
मेरी जेब में टोकन था — माँ के कमरे से उठाकर मैंने सुबह जेब में रख लिया था। अब वो धीरे से गरम हो रहा था। मैंने जेब पर हाथ रखा।
जज साहब ने फ़ाइल बंद की।
"यह अदालत हवेली के आधे हिस्से का मालिक मनोहर उर्फ़ मन्नू को और आधे का कम्मो देवी को मानती है। दोनों के काग़ज़ तीन दिन में तहसील में दर्ज कराए जाएँगे। भवानी सिंह, आप कल सुबह नौ बजे कम्मो देवी के साथ लिखित शर्तें इस अदालत में जमा करेंगे। सुनवाई अब ख़त्म होती है।"
हथौड़ी की आवाज़ हुई।
कमरा एक साथ बोला। माँ ने मुझे गले लगा लिया। बंसी मेरी पीठ ठोक रहा था, इतनी ज़ोर से कि मेरी साँस अटक गई। रीना रो रही थी, पर हँस भी रही थी।
"देखा," माँ ने मेरे कान में कहा, "मैंने कहा था ना — काग़ज़ का हिसाब ज़िंदगी से बड़ा नहीं होता।"
मैंने माँ को देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर चेहरे पर घबराहट नहीं थी। बीस साल का एक बोझ, जो उसने सिर पर उठा रखा था, वो आज उतर गया था।
भवानी अपनी कुर्सी से उठा। उसने सीधा मेरी तरफ़ देखा। मुझे लगा कि वो कुछ कहेगा, कोई धमकी, कोई शिकायत। पर उसने सिर्फ़ सिर हिलाया — हल्का सा, जैसे कोई बूढ़ा पहलवान अपनी हार मान लेता है — और वकील के पीछे-पीछे चला गया।
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