The Token System – Chapter 1122
माँ ने अपना सिर उठाया। "कौशल्या?"
भवानी ने उसकी तरफ़ देखा। "नहीं। मेरी पहली माँ। बीरा देवी।"
अमर ने कुर्सी की बाहें छोड़ दीं। उसके हाथ गोद में गिर गए।
"बीरा देवी मेरी माँ थी," अमर ने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। "और वो डॉक्टर थी। और हवेली से इसलिए निकाली गई क्योंकि उसने हरि सिंह के ख़िलाफ़ बोला था।"
"हाँ," भवानी ने कहा। "और मैं तब चुप रहा। आज मैं चुप नहीं रहूँगा।"
जज ने अपनी घड़ी देखी। "काग़ज़ आते-आते वक़्त लगेगा। तब तक — भवानी सिंह, आप इस अदालत को बताइए कि उस डिब्बे में वो तीसरी चीज़ क्या है, जो अमर नहीं पहचान पाया?"
भवानी ने एक लंबी साँस ली। उसकी पहली साँस जो शांत लगी।
"वो एक टोकन है," भवानी ने कहा। "मेरे बाप का। और उसका दूसरा हिस्सा मेरी जेब में है।"
सिपाही ने भवानी की जेब टटोली। उसने एक छोटी पीतल की गोली निकाली — सपाट, बिना निशान, ठंडी। सिपाही ने उसे मुंशी को दिया। मुंशी ने उसे सील किया।
मैंने अपनी जेब में हाथ रखा। मेरा टोकन अब ठंडा हो गया था। बिलकुल ठंडा।
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से फुसफुसाई, "अब?"
"अब हमें इंतज़ार करना है," मैंने कहा। "उस काग़ज़ का।"
दरवाज़ा खुला। इंस्पेक्टर अंदर आया। उसके हाथ में टिन का डिब्बा था — छोटा, जंग लगा, ऊपर उल्टा कोना-चिह्न खुदा हुआ।
मैंने साँस रोक ली।
डिब्बा जज की मेज़ पर रखा गया। जज ने मुंशी को इशारा किया। मुंशी ने डिब्बा खोला।
पहले बाहर आई एक तस्वीर — पुरानी, स्याह-सफ़ेद। एक औरत, सिर पर दुपट्टा, आँखों में वही सपाट सा यक़ीन जो मैंने अमर की आँखों में देखा था।
"ये बीरा देवी हैं," अमर ने कहा। "ये मेरी माँ हैं।"
फिर मुंशी ने काग़ज़ निकाला। तीन पन्ने — पीले, मुड़े, पर साफ़। जज ने पहला पन्ना उठाया।
"ये लिखाई किसकी है?" जज ने पूछा।
सक्सेना आगे बढ़ी। उसने पन्ने को ध्यान से देखा। फिर उसने अपना चश्मा पहना। "ये… ये मेरी माँ की लिखाई नहीं है।"
"तो?"
"ये कम्मो देवी की लिखाई है," सक्सेना ने कहा। "मैंने आज सुबह उनकी पर्ची देखी थी। वो ऐसे ही 'क' लिखती हैं।"
कम्मो ने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था, पर वो मुस्कुराई।
"हाँ," कम्मो ने कहा। "वो मेरी लिखाई है। मैंने वो पन्ने इसलिए लिखे थे क्योंकि मुझे पता था कि हरि सिंह उन्हें जलाएगा। मैंने उनकी कॉपी बनाई और भवानी को दी।"
"भवानी को?" जज ने पूछा।
"उस रात," कम्मो ने कहा। "जब सब जल रहा था। मैंने भवानी को रोका और कहा — तेरा बाप सब जला रहा है। ये कॉपी ले और छिपा। तेरे पास ये इसलिए रहनी चाहिए क्योंकि एक दिन तुझे ही इन्हें अदालत में लाना पड़ेगा।"
भवानी ने कम्मो की तरफ़ देखा। उसकी आँखें चौड़ी थीं। "तुमने मुझे कभी नहीं बताया कि ये कॉपी है।"
"क्योंकि तू उस वक़्त दस साल का था," कम्मो ने कहा। "और मुझे डर था कि तू इसे फेंक देगा।"
जज ने दूसरा पन्ना उठाया। "और ये?"
कम्मो ने देखा। उसका चेहरा बदला। "ये… मैंने नहीं लिखा।"
"तो किसने लिखा?"
कम्मो ने काँपते हाथ से पन्ना लिया। "ये मेरी बहन का हाथ है।" उसने अपनी आवाज़ धीमी की। "कौशल्या।"
माँ ने अपना हाथ मेज़ पर रखा। उसकी उँगलियाँ सफ़ेद थीं।
जज ने काग़ज़ पढ़ा। "मैं कौशल्या, श्रीपत सिंह को अपनी आँखों से जानती हूँ। उसने मेरी बहन बीरा को हवेली से निकलवाया। उसने मेरे पति को मरवाया। अब मैं अपने हाथ से एक काग़ज़ लिख रही हूँ — जिस दिन मेरी बात सुनी जाए, उस दिन ये काग़ज़ मेरी तरफ़ से बोलेगा।"
जज ने पढ़ना रोका। उन्होंने माँ की तरफ़ देखा।
माँ ने धीरे से कहा, "जज साहब, मैंने वो काग़ज़ लिखा था। पर मैंने उसे कभी किसी को नहीं दिया। मैंने उसे अपने सीने से लगाकर रखा।"
"तो ये काग़ज़ उस डिब्बे में कैसे आया?" जज ने पूछा।
कोई नहीं बोला।
फिर अमर ने कहा, "जिस दिन पापा ने मुझे डिब्बा दिया था, उस दिन उनके हाथ में एक और लिफ़ाफ़ा था। उन्होंने उसे डिब्बे में डाला और कहा — ये तेरी माँ की नहीं है, ये तेरे किसी अपने की है। जो इसे पढ़े, वो समझ जाएगा।"
जज ने आख़िरी पन्ना उठाया। उन्होंने उसे पढ़ा और उनका हाथ रुक गया।
"ये पन्ना बहुत छोटा है," जज ने कहा। "इस पर सिर्फ़ एक लाइन है — 'मैं जानता हूँ मेरे बेटे को क्या हुआ था। मुझे माफ़ कर दो। कन्हैया।'"
मैंने पलक नहीं झपकी।
कन्हैया। दादा का नाम।
माँ ने अपना सिर उठाया और उसका चेहरा पहली बार टूटा। "वो… वो ख़ुद…"
"हाँ," जज ने कहा। "ये लिखाई उस आदमी की है जिसका नाम काग़ज़ों से मिटाया गया था — कन्हैया। और ये काग़ज़ उसने अपने बेटे को दिया था। पर वो बेटा इस डिब्बे तक नहीं पहुँचा।"
अमर ने अपना हाथ उठाया। "जज साहब, मैं वो बेटा नहीं हूँ।"
"तो कौन है?"
अमर ने पीछे देखा — भवानी की तरफ़ नहीं, बल्कि अदालत के दरवाज़े की तरफ़। "वो जिसने मुझे ये डिब्बा छिपाने को कहा था।"
जज ने सिपाही को इशारा किया। "दरवाज़ा खोलो।"
दरवाज़ा खुला। बाहर की रोशनी अंदर आई। और उस रोशनी में एक आदमी खड़ा था — सत्तर के आसपास, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में लाठी, कलाई पर जला निशान, और चेहरे पर दाढ़ी जो किसी ने बहुत दिनों से नहीं काटी थी।
वो अंदर आया। सिपाही उसके साथ थे — पर वो ख़ुद चल रहा था, किसी के पकड़े हुए नहीं।
उसने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और जज की तरफ़ देखा।
"मैं कन्हैया हूँ," उसने कहा। "या जो बचा है उसका।"
मैंने उसे देखा। उसकी आँखें मेरी आँखों से मिलीं। और मुझे लगा जैसे मैंने उसे कहीं देखा है — बंसी की दुकान पर, या उस रात गली के मोड़ पर, जब कोई पीली पर्ची गिरा गया था।
माँ ने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने उसे पकड़ लिया।
जज ने अपना हथौड़ा उठाया और एक बार ज़ोर से मारा।
"अदालत," जज ने कहा, "आज दो गवाह और सुनने को मिलेंगे। कन्हैया — आप बैठिए। और आप, भवानी सिंह — आप इस आदमी को पहचानते हैं?"
भवानी ने कन्हैया की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया, पर वो खड़ा रहा।
"ये मेरे बाप की गाड़ी चलाता था," भवानी ने कहा। "पर मैंने इसे दस साल से नहीं देखा।"
कन्हैया ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और धीरे से कहा, "दस साल से ज़्यादा हो गए, भवानी। बीस से ज़्यादा। तुम्हारे बाप ने मुझे मरवाया था। पर मैं मरा नहीं।"
भवानी ने साँस ली। "तो तुमने ये सब…"
"मैंने कुछ नहीं किया," कन्हैया ने कहा। "मैंने सिर्फ़ अपना हिसाब बचाया। और मैंने तुम्हारे बेटे को अपने बेटे की तरह रखा — क्योंकि उसका चेहरा बीरा जैसा था।"
अमर ने कुर्सी में अपना हाथ पकड़ा।
जज ने मुंशी की तरफ़ देखा। "लिखिए — कन्हैया की गवाही दर्ज होगी। और भवानी सिंह — आपके बयान अब भी दर्ज हैं। अदालत कल सुबह दस बजे अपना फ़ैसला सुनाएगी।"
जज ने हथौड़ा फिर उठाया। "आज की सुनवाई बंद।"
हॉल ख़ाली होने लगा। लोग उठने लगे। मैं खड़ा रहा। टोकन जेब में चुप था — न ठंडा, न गरम। बस चुप।
कन्हैया ने मेरी तरफ़ देखा। और जब वो बाहर जाने लगा, तो रुककर मेरे पास आया।
"तेरा दादा मेरा मालिक था," उसने कहा। "उसने मुझे तेरे नाम की चीज़ दी थी। पर मैं उसे अदालत में नहीं लाया — क्योंकि मैं डरता था।"
"अब क्यों लाए?" मैंने पूछा।
कन्हैया ने अपनी लाठी की तरफ़ देखा। "क्योंकि आज कोई था जो मेरे बगैर आगे बढ़ रहा था।"
वो चला गया। मैं वहीं खड़ा रहा।
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