The Token System – Chapter 1121
भवानी अपनी जगह से उठा। दो सिपाही तुरंत उसकी तरफ़ बढ़े, पर वो ख़ुद नहीं चला।
"जज साहब," भवानी ने कहा, "मैं वो काग़ज़ नहीं जलाऊँगा। मैं उसे आपके सामने होने दूँगा। पर मेरी एक बात सुन लीजिए — उस काग़ज़ में जो लिखा है, वो मेरे बाप का है। मेरे बाप का काग़ज़ मेरे हाथ में आते ही…"
"आपके हाथ में क्यों आएगा?" जज ने टोकन की तरह काटकर कहा। "वो काग़ज़ आपके बेटे के कमरे में है। आपके बेटे ने उसे छिपाया है।"
भवानी का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
अमर ने धीरे से कहा, "पापा, मैंने आपसे झूठ नहीं बोला। मैंने बस ये नहीं बताया कि वो काग़ज़ कहाँ है।"
जज ने कलम उठाई और काग़ज़ पर कुछ लिखा। फिर उन्होंने सिपाही की तरफ़ देखा।
"इंस्पेक्टर साहब, अभी, इसी वक़्त, दो सिपाही अमर सिंह के कमरे में जाएँगे। साथ में अदालत का नुमाइंदा होगा और मेरा मुंशी। उस खाँचे से टिन का डिब्बा निकाला जाएगा। हर चीज़ लिखी जाएगी, सील की जाएगी और सीधे इस अदालत में लाई जाएगी।"
"जज साहब," शुक्ला जी फिर खड़े हुए, "इसकी इजाज़त…"
"आपकी फ़ाइल में ये लिखा है कि मेरे पास कोई गवाह बाक़ी नहीं है," जज ने कहा। "अब है। बैठिए।"
शुक्ला जी बैठ गए। उन्होंने अपनी फ़ाइल बड़ी ज़ोर से बंद की — इतनी ज़ोर से कि पूरा हॉल हिल गया।
जज ने इंस्पेक्टर की तरफ़ देखा। "और एक बात। अगर इस दौरान भवानी सिंह ने किसी को छूने की कोशिश की, किसी को फ़ोन किया, किसी को इशारा किया — तो उसे तुरंत हिरासत में लिया जाएगा। मेरे हुक्म पर।"
सिपाही भवानी के पास पहुँचे। भवानी की मुठ्ठियाँ बंधी हुई थीं। उसने एक बार अमर की तरफ़ देखा — नाराज़गी से नहीं, किसी और चीज़ से। फिर उसने अपना सिर नीचे कर लिया।
अमर ने कुर्सी की बाहें पकड़ लीं।
"जज साहब," अमर ने कहा, "एक बात कहनी है।"
"कहिए।"
"उस डिब्बे में सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है। उसमें मेरी माँ की एक तस्वीर भी है। और एक चीज़ है जो मेरे पास रहनी चाहिए थी — पर मैं उसे पहचान नहीं पाया।"
जज ने सिपाही को रोका, जो जाने वाला था। "क्या चीज़?"
अमर ने धीरे से कहा, "पीतल की एक छोटी चीज़। मुझे नहीं पता वो क्या है। पर जब मैंने उसे छुआ था, तब वो ठंडी थी। और उस पर कोई निशान नहीं था।"
मेरे हाथ से टोकन फिसलने लगा। सुमन ने मेरी कलाई पकड़ ली। उसने मेरी आँखों में देखा और सिर्फ़ इतना कहा, "रुक।"
जज ने अमर की तरफ़ देखा। "वो चीज़ अब तुम्हारे कब्ज़े में है?"
"नहीं। मैंने उसे कभी नहीं खोला। जब पापा ने मुझे सब कुछ दिया था, तब मैं दस साल का था। मैं डर गया था। मैंने वो डिब्बा दीवार में रख दिया और दस साल तक उसी घर में रहा, उसी कमरे में सोया, पर उसे छुआ नहीं।"
"तो उस चीज़ के बारे में तुम्हें कुछ नहीं पता?"
"मुझे इतना पता है कि जिस दिन मैंने उसे छुआ था, उस रात पापा मुझे गोद में उठाकर लाए थे और कहा था — तू बड़ा होकर इसे देख लेना। जो इसे नहीं पहचानता, उसे हैसियत से पहचान लेनी चाहिए।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। सुमन ने बहुत धीरे से कहा, "ठंडा और बिना निशान। सपाट। भवानी के पास जो है, उसी जैसा।"
"पर ये उसका है," मैंने धीरे से कहा। "तो दो…" मैंने अपनी बात काट दी। यहाँ नहीं। इस हॉल में नहीं।
राजेंद्र मेरे पीछे खड़ा था। उसने मेरा कंधा छुआ। "मन्नू, तेरा चेहरा…"
"ठीक हूँ," मैंने कहा।
जज ने कलम नीचे रखी। "इंस्पेक्टर साहब, आप जानते हैं कि अमर सिंह का कमरा कहाँ है?"
"जी," इंस्पेक्टर ने कहा। "खेत्री के पुराने होम के दूसरे हिस्से में।"
"तो अभी जाइए। और इंस्पेक्टर साहब — रास्ते में कोई रोके तो हुक्म सुनाना — अदालत का आदेश है। तोड़ने की इजाज़त है।"
इंस्पेक्टर ने दो सिपाहियों को इशारा किया। तीनों हॉल से निकल गए। दरवाज़ा बंद हुआ और फिर खुला — सुमन की आवाज़ आई, "जज साहब, मेरी एक अर्ज़ है।"
"कहिए, डॉक्टर सुमन।"
सुमन खड़ी हुई। उसने अपने हाथ में एक मुड़ा काग़ज़ पकड़ा था, जो उसने अब तक जेब में रखा था।
"मैं पिछले तीन महीने से भवानी के नर्सिंग होम के काग़ज़ देख रही हूँ," उसने कहा। "और उनमें से हर काग़ज़ पर उल्टे कोना-चिह्न जैसा निशान है — जो आज अदालत में पेश किए काग़ज़ों पर भी है।"
"कौन सा निशान?"
सुमन ने काग़ज़ खोला और जज की मेज़ पर रख दिया। "ये नर्सिंग होम की मरीज़ों की सूची है। जिन तेरह मरीज़ों को भवानी साहब के होम में भेज दिया गया और जो वापस नहीं आए — उन सबके नाम के आगे ये निशान है। सिर्फ़ एक के आगे नहीं।"
जज ने झुककर देखा। "किसके आगे नहीं?"
"सुनीता देवी के आगे," सुमन ने कहा। "क्योंकि उसका नाम मेरे हाथ से काट दिया गया था। जब मैंने उसे बचाया, तब किसी ने मिटा दिया।"
भवानी की कुर्सी फिर सरकी। इस बार कोई सिपाही नहीं पहुँचा। भवानी ने ख़ुद अपना संतुलन सँभाला।
"ये निशान किसका है?" जज ने पूछा।
"यही मैं भी पूछना चाहती हूँ, जज साहब," सुमन ने कहा। "क्योंकि ये निशान मैंने और भी जगह देखा है। इसी अदालत में। आज। उस पीतल की छोटी चीज़ पर जो अमर सिंह ने बताई। उल्टा कोना-चिह्न। मेरे पास इसके एक टुकड़े के निशान वाला पीतल का कोना है।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। उसने कभी नहीं बताया था कि उसके पास वो टुकड़ा है।
जज ने कहा, "वो टुकड़ा आपके पास कहाँ से आया?"
"उस आदमी के कोट से गिरा था जिसने अस्पताल में मुझ पर हमला किया था," सुमन ने कहा। "वो भवानी साहब का आदमी था।"
जज ने एक लंबी साँस ली। फिर उन्होंने अपने मुंशी की तरफ़ देखा। "लिखिए — डॉक्टर सुमन की गवाही दर्ज की गई। पीतल का टुकड़ा अदालत के कब्ज़े में लिया जाएगा।"
सुमन ने अपनी जेब से टुकड़ा निकाला और मुंशी की तरफ़ बढ़ाया। वो छोटा था — एक सिक्के का आधा। मुंशी ने उसे रूमाल में लपेटकर सील किया।
मैंने भवानी की तरफ़ देखा। वो अपनी कुर्सी पर सीधा बैठा था, पर उसकी गर्दन की नसें तनी हुई थीं। उसने अपने वकील की तरफ़ देखा, फिर हाथ से इशारा किया — बस, बंद करो।
शुक्ला जी उठे। "जज साहब, मेरा मुवक्किल अपना बयान बदलना चाहता है।"
"अब?" जज ने कहा।
"अब," शुक्ला जी ने कहा। "वो सब कुछ कबूल करना चाहते हैं।"
हॉल में फुसफुसाहट फैल गई। मैंने रीना की तरफ़ देखा। वो माँ के पास बैठी थी और उसका हाथ पकड़े हुए थी।
भवानी उठा। इस बार वो धीरे से उठा। सिपाही उसके दोनों तरफ़ खड़े थे, पर उसने उन्हें छुआ नहीं।
"जज साहब," भवानी ने कहा, "मैंने बहुत कुछ कहा आज। कुछ सच, कुछ अधूरा सच। अब मैं पूरा सच कहूँगा — बिना वकील के।"
जज ने शुक्ला जी की तरफ़ देखा। "आप बैठिए। मुझे उनसे सीधा सुनना है।"
भवानी ने एक कदम आगे रखा। सिपाही पीछे हटे।
"मेरे बाप ने जो किया, वो मैंने किया नहीं," भवानी ने कहा। "पर मैंने उसे रोका भी नहीं। मैं डर गया था। जब वो मरा, तब मैं अपने कमरे में बैठकर दो दिन तक रोया — इस डर से कि अब जो मेरे नाम पर है, वो सब किसी दिन मेरे गले की रस्सी बनेगा।"
"तो उस डिब्बे में क्या है?" जज ने पूछा।
भवानी ने अमर की तरफ़ देखा। "मेरे बेटे ने सच कहा। उस डिब्बे में वो काग़ज़ हैं जो कम्मो मेरे बाप को देती थी। मेरे बाप उन्हें जलाते नहीं थे — छिपाते थे। क्योंकि उनसे डरते थे। उन काग़ज़ों पर मेरी माँ का नाम था।"
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