The Token System – Chapter 1119
अमर ने भवानी की तरफ़ देखा। भवानी ने आँखें नीची कर लीं।
"नहीं," अमर ने कहा। "मेरी माँ का नाम बीरा देवी था और मैं इस अदालत में ये कहने आया हूँ कि मेरे पापा ने उसे मरवाया या नहीं — ये मुझे नहीं पता। पर मैं ये जानता हूँ कि उसके हिसाब में माँ का नाम कहीं लिखा हुआ था जो मेरे पापा ने मिटा दिया।"
भवानी ने मुट्ठी खोल दी। "मैंने नाम नहीं मिटाया।"
"तो किसने मिटाया?" जज ने पूछा।
"हरि सिंह ने।" भवानी की आवाज़ पहली बार काँपी। "मेरे बाप ने। मैं सिर्फ़ चुप रहा।"
जज ने हथौड़ा उठाया। "ये सुनवाई अब टल नहीं सकती। फ़ैसला आज ही सुनाया जाएगा।"
बाहर बरामदे में मैंने माँ को देखा। माँ ड्योढ़ी पर खड़ी थी, कॉपी गोद में, आँखें सीधी।
सुमन ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "तेरी माँ ने आज वो किया जो अदालत नहीं कर पाती।"
"क्या?"
"उसने नाम नहीं मिटने दिया," सुमन ने कहा। "बीस साल बाद भी।"
मैंने जेब में टोकन निकाला। बीस लकीरें उभरी थीं — और उनके नीचे तहरतीसवीं लकीर की नोक जैसी एक हल्की लाइन उभर रही थी।
गरम नहीं। ठंडा नहीं। बस काँपता हुआ।
"कल तक नहीं रुक पाएगा," मैंने कहा।
"तो कब?"
"आज। जब फ़ैसला सुनाया जाएगा — तब।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने टोकन जेब में रखा। और अंदर गया।
जज साहब ने सबके चेहरे देखे। "अब कोई गवाह बाक़ी है? कोई दलील? कोई सवाल?"
भवानी खड़ा हुआ। उसने एक बार आँगन की तरफ़ देखा, फिर जज की तरफ़। "बस एक बात," उसने कहा। "मैंने चालीस साल से इस हवेली को सँभाला है। मुझे पता है ये फ़ैसला क्या होगा। पर मैं एक चीज़ और बताना चाहता हूँ।"
जज ने सिर हिलाया।
"उस औरत की बहन," भवानी ने गिरधारी देवी की तरफ़ इशारा किया, "जो आज यहाँ खड़ी है — वो मेरी बहन भी है।"
माँ ने कॉपी अपने सीने से लगा ली।
और मेरी जेब में टोकन ठंडा पड़ गया — जैसे उसने अपनी साँस रोक ली हो।
अदालत में सन्नाटा ऐसा छाया कि पंखे की चरचराहट भी साफ़ सुनाई दे रही थी।
"तुम्हारी बहन?" मैंने कहा। "भवानी, तुम्हारी कोई बहन नहीं थी। माँ कहती थीं कि तुम अकेले बेटे हो।"
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो ठंडक नहीं थी जो चालीस साल से थी। "मेरे बाप ने बीस साल पहले गिरधारी का नाम उस हवेली के काग़ज़ से काट दिया था। जो बेटी मर गई समझी जाती है, उसका नाम कौन याद रखता है?"
गिरधारी देवी ने लाठी टेकते हुए जज की मेज़ तक चलकर रखी। "ठाकुर हरि सिंह ने मुझे हवेली से निकाल दिया था। बीस साल पहले, उस रात। जिस रात मेरी बहन बीरा की नौकरी और उसका नाम, दोनों एक साथ मिटाए गए।"
जज ने काग़ज़ पर कुछ लिखा और सक्सेना की तरफ़ देखा। "तारीख़ जाँचिए।"
सक्सेना ने जली पर्ची को पास लाया और रोशनी में उठाया। "जज साहब, तारीख़ वही है। उसी रात की, जिस रात अमर को हवेली से भगाया गया था।"
सुमन ने मेरे कान के पास धीरे से कहा, "ये तो कहानी में नया पन्ना खुल गया।"
"चुप," मैंने कहा। "देखते हैं किसके हाथ में क्या है।"
भवानी ने कुर्सी पकड़ ली। "मैंने उसे निकाला नहीं था। हरि सिंह ने निकाला था। मैं तब बीस साल का था।"
"बीस साल का आदमी चुप रहता है," माँ ने ड्योढ़ी से आवाज़ दी, "और फिर चालीस साल बड़ा हो जाता है। चुप्पी बदलती नहीं। बस उम्र बढ़ती है।"
जज ने ड्योढ़ी की तरफ़ देखा। "आप अंदर चलकर आइए। गवाह के बरामदे से दलील नहीं बनती।"
माँ अंदर आई। कॉपी उसके हाथ में थी। कमरे की हर नज़र उस कॉपी पर टिकी।
जिरह शुरू हुई।
सक्सेना ने भवानी के सामने एक कुर्सी खींची और बैठ गया। "ठाकुर साहब, आप कहते हैं आपने काग़ज़ जलाए थे। जलाने का हुक्म किसने दिया?"
"मेरे बाप ने।"
"आपने मना क्यों नहीं किया?"
भवानी ने जवाब देने से पहले माँ की तरफ़ देखा। "मैंने मना किया था। मेरे बाप ने कहा — अगर काग़ज़ जलाना तुम्हें मंज़ूर नहीं, तो हवेली का दरवाज़ा तुम्हारे लिए भी है।"
"और आप काग़ज़ जलाते वक़्त वहाँ मौजूद थे?"
"था।"
"और उसी वक़्त गिरधारी देवी भी वहाँ थीं?"
भवानी ने एक पल रुककर कहा, "हाँ।"
गिरधारी देवी ने अपना थैला फिर खोला। इस बार उसमें से कुछ और निकला — एक छोटी सी मिट्टी की गुड़िया, जिसका एक हाथ टूटा हुआ था।
"ये हमारी माँ ने बनाई थी," गिरधारी ने कहा। "दो गुड़िया थीं — एक बीरा के लिए, एक मेरे लिए। भवानी, अगर तू मेरा भाई है, तो ये गुड़िया तेरी हवेली के मंदिर के नीचे क्यों गाड़ी हुई मिली?"
भवानी की उँगलियाँ कुर्सी के हत्थे पर सफ़ेद पड़ गईं। "मैंने कुछ नहीं गाड़ा।"
"फिर वो कहाँ से आई?" सक्सेना ने पूछा।
"मेरे बाप ने गाड़ी होगी।" भवानी की आवाज़ पहली बार तेज़ हुई। "मैं हर चीज़ का जवाब क्यों दूँ? मैंने काग़ज़ जलाने में हाथ बँटाया, हाँ। पर मैं मेरा बाप नहीं हूँ।"
"नहीं," माँ ने कहा। "तुम मेरे शौहर हो। और मैं तुम्हारे बीस साल चुप रही।"
"तुम चुप नहीं रही," भवानी ने मेरी तरफ़ इशारा करते हुए कहा। "तुमने इस लड़के को पाला। तुमने उसे वो सब दिया जो मैंने नहीं दिया।"
"इस लड़के ने मुझे दिया," माँ ने कहा। "तुमने बस हवेली दी थी। और हवेली में रहने वाले को घर कहते हैं, ऐसा मैंने इसी लड़के से सीखा।"
एक औरत सभागार के पीछे से उठी। बुज़ुर्ग, सिर पर सफ़ेद ओढ़नी। "जज साहब, मैं उस रात की चौकीदारिन हूँ। मैंने रसोई की खिड़की से सब देखा था।"
जज ने उसकी तरफ़ देखा। "आपका नाम?"
"बसंती। मैं सोलह साल से हवेली में काम कर रही हूँ।"
भवानी ने उसकी तरफ़ देखकर कहा, "बसंती, तू भी?"
"ठाकुर साहब," बसंती ने कहा, "मैं आपके यहाँ की नमक खाती हूँ। पर उस रात मैंने देखा था — आप ख़ुद ही काग़ज़ लेकर भट्टी तक गए थे। आपके बाप तो उस रात बाहर किसी काम से गए थे।"
अदालत में हलचल मच गई। भवानी की आँखें बड़ी हो गईं।
"बसंती," वह बोला, "तू झूठ बोल रही है।"
"मैं झूठ नहीं बोल रही," बसंती ने कहा, और उसकी आवाज़ में कंपकंपी नहीं थी। "मैं बीस साल इसी रात को भूलने की कोशिश कर रही थी। पर जिस दिन आपने मेरे बेटे का टिकट कटा कर उसे हवेली से निकाल दिया, उस दिन मैंने तय कर लिया था कि जब मौक़ा मिलेगा, मैं सच बोलूँगी।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सा चमक था। "अब समझा?" उसने धीरे से कहा। "सच कभी अकेला नहीं आता। वो एक-एक करके दरवाज़े खटखटाता है।"
जज ने हथौड़ा उठाया और एक बार बजाया। "शांति। भवानी सिंह, अब आपके पास कुछ कहना है?"
भवानी ने अपना सिर उठाया। उसने माँ की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। और फिर कुछ ऐसा कहा जो मैंने कभी नहीं सोचा था।
"मैंने उस रात काग़ज़ जलाए," वह बोला, "क्योंकि मेरे बाप ने मुझसे कहा था — अगर तू नहीं जलाएगा, तो मैं तेरी माँ को जला दूँगा। और मेरी माँ उस वक़्त बीमार थी। मैं डर गया था।"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में नाराज़गी नहीं थी। कुछ और था।
"तुमने मुझे बीस साल ये क्यों नहीं बताया?" माँ ने पूछा।
"क्योंकि मैं तुम्हारी नज़रों में छोटा नहीं होना चाहता था," भवानी ने कहा। "पर मैं हो गया। बीस साल पहले ही हो गया था।"
गिरधारी देवी उठकर खड़ी हुई। "तो आज तुम अपने बाप के ख़िलाफ़ गवाही दोगे?"
भवानी ने उसकी तरफ़ देखा। "मेरे बाप इस दुनिया में नहीं हैं। वो दो साल पहले मर गए। और उनकी मौत के साथ सारे काग़ज़ भी मिट गए।"
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