The Token System – Chapter 1118
"किसकी है?" मैंने पूछा।
माँ ने कॉपी खोली। पहले पन्ने पर बच्चों की मोटी लिखाई थी — कुछ शब्द, कुछ लकीरें, कुछ चित्र।
"अमर की," माँ ने कहा।
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। "अमर? वो जो अदालत में कल भवानी के लिए गवाही देने आया था?"
"वही।" माँ ने कॉपी को गोद में कसा। "बीस साल पहले भवानी ने अपने बेटे को मेरे पास छोड़ा था — दो हफ़्ते के लिए कहकर। दो हफ़्ते दो महीने हो गए। दो महीने दस साल। और मैं उसे पालती रही।"
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि भवानी ने कहा था — अगर ये बच्चा मरे तो तेरा पूरा परिवार मरेगा।" माँ की आवाज़ सपाट थी। "तू तब छोटा था। तेरे पापा हवेली के काग़ज़ों में उलझे हुए थे। मैंने चुप रहना चुना।"
रीना ने मेरी कलाई पकड़ी। "भैया, ये अमर की कॉपी अभी क्यों मिली? बीस साल बाद?"
माँ ने आख़िरी पन्ना पलटा। उस पर अमर की लिखाई थी — अब बड़ी, थोड़ी साफ़, पर वही अक्षर।
"मैंने पापा को एक औरत के साथ बात करते देखा। वो औरत रो रही थी। पापा उसे कुछ दे रहे थे। जब मैं पास गया तो पापा ने मुझे गोद में उठा लिया और बोले — बेटा, ये हमारी पुरानी बात है, तू किसी को नहीं बताएगा।"
उसके नीचे एक और लाइन थी।
"मैंने किसी को नहीं बताया। आज तक।"
मैंने कॉपी माँ के हाथ से ली। पन्ने पलटे। बीच के पन्नों पर कुछ और भी था — बच्चों के चित्र, कुछ नाम, एक-दो तारीख़ें। एक जगह लिखा था — "मेरी माँ का नाम।" उसके आगे कोई नाम नहीं, सिर्फ़ खाली जगह।
"माँ," मैंने कहा। "ये कॉपी अदालत में जानी चाहिए।"
"नहीं।" माँ ने हाथ बढ़ाया। "ये कॉपी मेरे पास रहेगी।"
"माँ —"
"मन्नू।" माँ की आवाज़ में वो चीज़ थी जो बीस साल में कभी नहीं सुनी थी। "मैंने ये काग़ज़ बीस साल छिपाया। अब मैं इसे अदालत में ख़ुद ले जाऊँगी। तेरे हाथ से नहीं।"
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। "ठीक है। पर माँ — कल सुबह दस बजे फ़ैसला है। तुझे अदालत आना पड़ेगा।"
माँ ने कॉपी को अपनी साड़ी के पल्लू में लपेटा। "मैं आऊँगी। और ये कॉपी साथ लाऊँगी।"
मैं बाहर निकला। बंसी और सुमन मोड़ पर खड़े थे। बंसी ने मेरा चेहरा देखकर कुछ पूछा नहीं — सिर्फ़ चाय का एक और कुल्हड़ बढ़ाया।
"कल फ़ैसले से पहले," मैंने कहा, "एक औरत अदालत में आएगी। और वो औरत मेरी माँ है — पर उसका सामना किसी और से होगा।"
सुमन ने कुल्हड़ लिया। "किससे?"
"अमर से।"
रात भर मैंने सोचा — पर सोचने से कुछ नहीं बदला। सुबह छह बजे मैं उठा, मुँह धोया, और टोकन जेब में डाला। वो ठंडा था — बीस लकीरें, "अब चुकता" शब्द, और एक चुप्पी जो कल से पहले कुछ नहीं कहने वाली थी।
सात बजे मैं अदालत पहुँचा। बरामदा खाली था। राजेंद्र सीढ़ियों पर खड़ा था, हाथ में एक लिफ़ाफ़ा।
"सुबह पाँच बजे कोई दरवाज़े के नीचे से सरका गया," उसने कहा। "नाम नहीं है। बस एक लाइन।"
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक पीली पर्ची थी, बूढ़े हाथों की लिखाई में — "चौथी लकीर खींचने वाला आज ख़ुद आएगा। उसे रोकना मत।"
"ये लिखाई," राजेंद्र ने कहा, "मैंने कहीं देखी है।"
"कहाँ?"
"अदालत के उस कमरे में जहाँ काग़ज़ रखे हैं। बीस साल पुरानी फाइलों पर।"
आठ बजे बंसी आया। नौ बजे सुमन। साढ़े नौ बजे माँ आई — सफ़ेद साड़ी, हाथ में वो कॉपी, पल्लू में लिपटी हुई। रीना उसके साथ थी।
"जज साहब आ गए हैं," राजेंद्र ने कहा। "दस बजे सुनवाई शुरू होगी।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "मन्नू, मैं अंदर जा रही हूँ। तू बाहर रुक।"
"माँ —"
"मैंने कहा।" उसकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो बीस साल की चुप्पी से आई थी। "जब मेरी बारी आएगी, मैं ख़ुद बोलूँगी।"
माँ अंदर गई। रीना उसके पीछे। मैं बरामदे में रुक गया।
दस बजे अदालत का दरवाज़ा खुला। जज साहब ने काग़ज़ों की तरफ़ देखा।
"कल हमने कहा था कि चौथे गवाह का इंतज़ार रहेगा," जज ने कहा। "आज वो गवाह सामने आया है।"
मैंने आगे बढ़कर कॉपी जज की मेज़ पर रखी। "ये कॉपी अमर की है — भवानी के बेटे की। इसके आख़िरी पन्ने पर उसकी लिखाई है। इसने बीस साल पहले कुछ देखा था और किसी को नहीं बताया।"
जज ने कॉपी खोली। पन्ने पलटे। आख़िरी पन्ना पढ़ा।
"अमर," जज ने कहा। "ये शब्द तुम्हारे हैं?"
अमर व्हीलचेयर में था, नर्स के साथ। उसने कॉपी देखी और उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
"ये मेरी कॉपी है," उसने कहा। "मैं इसे कहाँ भूला था…"
"ये मेरे पास थी," माँ ने कहा। "बीस साल। तूने मुझे छोड़ते वक़्त मेरे हाथ में दी थी — याद है?"
अमर ने माँ की तरफ़ देखा। "तुम माँ कौशल्या हो?"
"मैं वो औरत हूँ जिसने तुझे दो हफ़्ते के लिए आया बेटा समझकर पाला।" माँ की आवाज़ नहीं काँपी। "और मैंने तेरे पापा से कभी नहीं कहा कि तू मेरे पास है।"
अमर ने आँखें बंद कीं। "मुझे याद है। रात को तुम मेरे सिर पर हाथ रखती थी और कहती थी — सो जा, बेटा।"
अदालत में सन्नाटा था — पर वो डर वाला सन्नाटा नहीं था।
जज ने कॉपी के आख़िरी पन्ने की तरफ़ उँगली रखी। "अमर, तुमने ये लिखा — 'मैंने पापा को एक औरत के साथ बात करते देखा।' कौन थी वो औरत?"
अमर ने आँखें खोलीं। उसने भवानी की तरफ़ देखा — जो कोने में, निगरानी में बैठा था। भवानी ने नज़र नहीं मिलाई।
"वो औरत रो रही थी," अमर ने कहा। "पापा उसे कुछ काग़ज़ दे रहे थे। मैंने पूछा तो पापा बोले — ये हमारी पुरानी बात है।"
"उस औरत का नाम तुम्हें पता है?"
अमर ने सिर हिलाया। "नहीं। पर उसके हाथ में पीली चूड़ी थी। और पापा उसे 'बहन' कह रहे थे।"
माँ आगे आई। "झूठ।" उसने कॉपी की तरफ़ इशारा किया। "इस कॉपी में एक पन्ना है जिस पर सिर्फ़ 'मेरी माँ का नाम' लिखा है और आगे खाली है। बीस साल से खाली। अमर, तूने वो नाम क्यों नहीं लिखा?"
अमर ने कोई जवाब नहीं दिया।
"क्योंकि तू जानता था," माँ ने कहा, "कि तेरी माँ का नाम लिखते ही तेरे पापा के सारे काग़ज़ ख़त्म हो जाते।"
भवानी खड़ा हुआ। "ये सब मेरे ख़िलाफ़ साज़िश है —"
"बैठिए, ठाकुर साहब," जज ने कहा। "आपकी बारी आएगी।"
अमर ने धीरे से कहा, "मेरी माँ का नाम बीरा देवी था। वो अस्पताल में डॉक्टर थी। पापा ने उसे छोड़ दिया जब मैं छोटा था। वो मर गई — या मार दी गई। मुझे नहीं पता।"
वो औरत जो अदालत में कल से कोने में बैठी थी — सफ़ेद साड़ी, काले बाल, लाठी — उठी। "मैं बीरा देवी नहीं हूँ," उसने कहा। "मैं उसकी बहन हूँ। और मैं बीस साल से यही इंतज़ार कर रही थी कि कोई ये नाम ले।"
जज ने उसकी तरफ़ देखा। "आप कौन हैं?"
"गिरधारी देवी। बीरा की बहन। और उस काग़ज़ की गवाह जिसे भवानी ने जलाया था।"
भवानी ने मुट्ठी भींची। "ये औरत पागल है —"
"ठाकुर साहब," जज ने कहा, "आपको चेताया जा रहा है।"
गिरधारी देवी ने अपने थैले से एक जली-कटी पर्ची निकाली। "जब भवानी ने होम की पहली मंज़िल पर काग़ज़ जलाए थे, मैं वहीं थी। मैंने एक कोना बचा लिया था — जिस पर बीस साल पुरानी तारीख़ और अमर की माँ का नाम था।"
रीना ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी तरफ़ देखा।
जज ने पर्ची ली। सक्सेना ने पास आकर देखा। "ये लिखाई…"
"भवानी सिंह की लिखाई है," सक्सेना ने कहा। "मैं इस लिखाई को अदालत में तीस बार देख चुका हूँ।"
जज ने पर्ची मेज़ पर रखी। "अमर, तुम्हारी माँ का नाम अब अदालत के सामने है। तुम्हें इस पर कोई आपत्ति है?"
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