The Token System – Chapter 1101
"मन्नू," बंसी ने धीरे कहा। "ये तेरा तो नहीं।"
मैंने जेब में हाथ डाला। मेरा टोकन वहीं था, ठंडा, चुप। बंसी ने गेट की सलाखों के बीच से हाथ निकालकर वो टोकन उठाया और मेरी हथेली पर रख दिया।
और मेरी हथेली जल गई।
मैंने टोकन गिरा दिया। वो ज़मीन पर गिरा, हवा में दो बार पलटा और पत्थर पर ठोकर खाकर रुका। बंसी ने रुमाल निकालकर उसे उठाया।
"अरे, ये तो बिल्कुल… बिल्कुल वैसा ही है जैसा तेरा है," बंसी ने कहा, रुमाल में लपेटकर उसे घुमाते हुए। "पर गरम है।"
"नया टोकन जो पेटी में मिला था, वो ठंडा था," मैंने कहा। "ये कुछ और है।"
तभी आँगन की तरफ़ से जमुना की आवाज़ आई — तेज़, काँपती, जैसे किसी ने उसके पीछे से उसके कंधे पकड़ लिए हों।
"इसे मत छूना!"
हम दोनों पलटे। जमुना अपनी लाठी के सहारे सीढ़ियों से उतर रही थी, और उसका चेहरा ऐसा था जैसे उसने भूत देख लिया हो।
"फेंक दे इसे," उसने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि ये तीसरा टोकन नहीं है, मन्नू।" वो मेरे पास आई, रुमाल में लिपटे टोकन के ऊपर झुकी, और उसकी आँखें भर आईं। "ये मेरे बाप का टोकन है।"
बंसी ने टोकन वापस रुमाल में लपेट लिया। "जमुना देवी, आप ठीक से बोलिए। बाप का मतलब?"
"मेरे बाप का," जमुना ने कहा। "राघव का। हवेली के चौथे हिस्से का।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "ये टोकन उस रात खाते से अलग हो गया था जब मेरे बाप को मरा बताया गया था। इसे किसी ने बंद कर दिया, अलग कर दिया — जिससे कि हिसाब कभी पूरा न हो। जब तक ये वापस खाते में नहीं जाएगा, मन्नू…" वो रुकी, साँस ली। "हिसाब पूरा नहीं होगा।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। "आप कह रही हैं कि सुबह जो मैं अदालत में ले जाने वाला हूँ, वो अधूरा है?"
"सुबह जो तू ले जाने वाला है, वो सही है," जमुना ने कहा। "पर पूरा नहीं। जब तक ये —" उसने रुमाल की तरफ़ इशारा किया "— ये वापस नहीं जाता, कोई भी काग़ज़ पूरा नहीं होगा। भवानी का भी नहीं। और हमारा भी नहीं।"
मैंने अपनी जेब से अपना टोकन निकाला और रुमाल वाले टोकन के पास लाकर रखा। दोनों के बीच एक बालिश्त की दूरी थी।
और फिर मेरा टोकन गरम होने लगा।
पहले हल्का — जैसे सुबह की धूप में पड़ी धातु। फिर ज़्यादा। फिर इतना कि मेरी हथेली से धुआँ-सा उठने लगा।
"छोड़ दे!" सुमन चिल्लाई — वो कब आई, मुझे पता नहीं चला था।
मैंने टोकन गिरा दिया। वो पत्थरों पर दो बार उछला और दूर जाकर लुढ़क गया। मैंने अपनी हथेली देखी — लाल, पर जला नहीं। जैसे किसी ने सुई से छुआ हो।
"कभी नहीं हुआ ऐसा," सुमन ने कहा। उसने मेरा हाथ पकड़कर देखा। "पहले सिर्फ़ ठंडा होता था जब दूसरा पास आता। पर इतना गरम?"
"क्योंकि ये दोनों एक खाते के नहीं हैं," जमुना ने कहा। "ये अलग-अलग खातों के हैं, और अब जब एक खाते का हिसाब ख़त्म होने को है, तो ये एक-दूसरे को पुकार रहे हैं।"
"पुकार?" बंसी ने कहा। "टोकन पुकारते हैं?"
"हिसाब पुकारता है," जमुना ने कहा। "टोकन बस मुँह है।"
उसी वक़्त सुमन का फ़ोन बजा। उसने देखा और उठा लिया। "हाँ, रीना, बोल।"
हम सब चुप हो गए। सुमन का चेहरा सुनते-सुनते बदलता गया। कुछ देर बाद उसने फ़ोन रखा।
"पापा ने होश में आकर एक नाम बोला," उसने कहा। "बस एक नाम। जगदीश।"
मेरे पैर के नीचे से ज़मीन खिसक गई।
"जगदीश?" मैंने कहा। "वही जो अदालत में गवाह था?"
"वही," सुमन ने कहा। "जिसके घर पर कल रात से ताला लगा मिला था।"
मेरे दिमाग़ में आवाज़ गूँजी। हवेली की उत्तर वाली दीवार। नींव का कमरा। नीचे अँधेरे में किसी ने उँगली से लिखा था — और मैंने उसे पढ़ा था, पर उस वक़्त इतनी जल्दी में था कि उसका मतलब नहीं समझा।
"दीवार पर लिखा था," मैंने धीरे कहा। "'जगदीश ज़िंदा है।' मैंने उसे पढ़ा था और सोचा कि कोई बच्चा शरारत कर गया होगा।"
"बच्चा नहीं," किसी ने पीछे से कहा।
हम पलटे। शेखर बाबू थे — घुटने मोड़कर चलते हुए, हाथ में अपना बैग, जैसे रात भर सोए ही नहीं। उनके चश्मे का एक काँच बदला हुआ था, और चेहरे पर वो थकान थी जो सिर्फ़ सच बोलने वाले के चेहरे पर आती है।
"शेखर बाबू?" मैंने कहा। "आप यहाँ?"
"गेट पर राजेंद्र ने रोका," शेखर बाबू ने कहा। "पर मैंने कहा कि अगर मुझे सुबह अदालत में जाना है, तो पहले मुझे कुछ बताना है।" वो रुके, अपना बैग सीढ़ी पर रखा। "जगदीश मेरा पुराना साथी था। रिकॉर्ड कमरे का चौकीदार। बीस साल पहले, बिल्कुल उसी हफ़्ते जब किशनचंद गायब हुए थे, जगदीश भी ग़ायब हो गया।"
"पुलिस में रिपोर्ट?" राजेंद्र ने गेट से ही पूछा।
"रिपोर्ट लिखी गई," शेखर बाबू ने कहा। "पर सिर्फ़ एक पन्ने पर। और उस पन्ने पर ये लिखा था कि वो अपने गाँव गया है। जबकि उसका कोई गाँव नहीं था।"
"आपने उस वक़्त क्यों नहीं बताया?" सुमन ने पूछा।
शेखर बाबू ने अपना बैग उठाया, खोला, और उसमें से एक मोटा भूरा लिफ़ाफ़ा निकाला। "क्योंकि उसी हफ़्ते मेरी बेटी के स्कूल की फ़ीस भवानी के दफ़्तार से भर गई थी," उन्होंने बिना नज़र मिलाए कहा। "और मेरी चुप्पी की क़ीमत हर महीने मेरी मेज़ पर लिफ़ाफ़े में आती रही। बीस साल। मैंने गिना है — दो सौ चालीस महीने।"
कोई कुछ नहीं बोला। चाय के खोखे पर एक पतीले की ढक्कन गिरी, और बंसी ने चुपचाप उसे उठाया।
"अब ये रखिए," शेखर बाबू ने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "इसमें वो पुरानी रिपोर्ट की कॉपी है। पर उससे ज़्यादा ज़रूरी — एक चिट्ठी है जो जगदीश ने मुझे देने से पहले लिखी थी। उसने कहा था — 'अगर मैं लौटूँ, तो ये तुझे वापस।'" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "वो नहीं लौटा। पर लगता है वो अभी भी… कहीं है।"
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर पहले एक पुरानी पीली रसीद थी — हल्की स्याही, मुड़े कोने। और उसके नीचे चार लाइनों वाली एक चिट्ठी।
"पढ़िए," जमुना ने कहा।
मैंने पढ़ा — "मैंने कुछ देखा है जो मुझे नहीं देखना चाहिए था। किशनचंद को गाड़ी में बैठाया गया। उसके पीछे दो और बैठे थे। एक ने उसका मुँह दबाया। गाड़ी हवेली की तरफ़ गई। मैं उनके पीछे-पीछे साइकिल से गया। हवेली के पिछवाड़े में मैंने गाड़ी खड़ी देखी। मैं दीवार से चिपककर सुनता रहा। अंदर से किशनचंद की आवाज़ आई — 'मैं अब भी किशन हूँ। तुम मेरा नाम नहीं छीन सकते।' फिर गिरने की आवाज़ आई। मैं भागकर आया। अगर ये चिट्ठी तुम पढ़ रहे हो, तो मतलब मैं वापस नहीं आया।"
चिट्ठी के नीचे सिर्फ़ एक नाम था — जगदीश, और उसके नीचे तीन शब्द — "हवेली। नीचे।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। "ये… ये चिट्ठी बीस साल पुरानी है।"
"हाँ," शेखर बाबू ने कहा। "और ये आज भी उतनी ही सच है जितनी उस दिन थी।"
"वो कहाँ है?" मैंने पूछा। "अगर ज़िंदा है, तो कहाँ?"
शेखर बाबू ने मेरी तरफ़ देखा — एक लंबी, भारी नज़र से। "मन्नू, मैंने बीस साल में इस सवाल का जवाब ढूँढने की कोशिश की। हर बार जवाब एक ही जगह जाकर रुका। अगर जगदीश ज़िंदा है, तो सिर्फ़ एक जगह हो सकता है — हवेली के तहखाने में। उसी जगह जहाँ कम्मो मिली थी। उसी जगह जहाँ से अभी कुछ निकला है।"
"पर वो तहखाना तो…" मैंने कहा, और फिर रुक गया।
"हाँ," शेखर बाबू ने कहा। "वही। जहाँ से हमने कम्मो को निकाला था, वो ऊपर वाला हिस्सा था। नीचे वाला हिस्सा कोई नहीं खोल पाया। बीस साल से।"
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