The Token System – Chapter 1100
मेरा सिर ऊपर उठा।
"राजेंद्र," मैंने कहा। "क्या है ये?"
राजेंद्र ऊपर की तरफ़ भागा। हम सब उसके पीछे। मैंने पेटी अपनी छाती से लगाई, सुमन ने काग़ज़ अपनी जैकेट में रखे।
बावड़ी की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर आए। गली में शोर था। दो सिपाही गेट पर लाठी लिए खड़े थे, और उनके सामने — भवानी के तीन आदमी।
उनमें से एक — वो ही लाठी वाला, जो पहले था — आगे बढ़ा और गेट की सलाख पकड़कर झाँका।
"ठाकुर साहब का हुक्म है," उसने कहा। "नींव में से जो निकले, वो बाहर आए।"
"किसका हुक्म?" मैंने कहा, गेट के इस तरफ़ आते हुए। "हरि सिंह का? वो तो अब हिरासत में है।"
"ठाकुर साहब का," आदमी ने दोहराया।
"कौन से ठाकुर साहब?" मैंने पूछा। "भवानी सिंह तो आज सुबह ख़ुद अदालत में अपने बेटे के ख़िलाफ़ गवाही दे रहे थे। हरि सिंह हिरासत में हैं। और तीसरी कौशल्या अभी-अभी यहाँ से गई है। तो तेरा ठाकुर साहब कौन है?"
आदमी एक पल रुका। उसके चेहरे पर — अनिश्चय। एक आदमी जो ठीक से नहीं जानता कि किसका हुक्म मान रहा है।
"अरे भाई," बंसी ने कहा, गेट के पास आते हुए, फावड़ा कंधे पर। "जब ख़ुद को ही नहीं पता कि किसकी गुलामी कर रहा है, तो आराम से घर जा। चाय पी। सो जा। सुबह सब पता चल जाएगा।"
आदमी ने बंसी को देखा। उसके पीछे के दोनों आदमियों ने एक-दूसरे को देखा।
"आज रात कुछ नहीं होगा," बंसी ने कहा। "न तुम जीतोगे, न हम हारेंगे। क्योंकि जो लड़ाई सुबह अदालत में लड़ी जानी है, वो रात की गली में नहीं लड़ी जाती।"
वो तीनों कुछ पल खड़े रहे। फिर लाठी वाले ने सिर हिलाया। "सुबह," उसने कहा। "अदालत में।"
वो मुड़े और गाड़ी की तरफ़ चले। गाड़ी में बैठे। इंजन चला। गाड़ी गली की तरफ़ मुड़ी और अंधेरे में लुप्त हो गई।
मैंने साँस ली। पहली बार उस पूरी रात में, पूरी साँस।
राजेंद्र ने सिपाहियों को इशारा किया। "गेट पर रहो। सुबह तक। कोई नहीं आए।"
वो सलाम करके बाहर खड़े हो गए।
हम पाँच लोग हवेली के आँगन में बैठे — मैं, सुमन, बंसी, राजेंद्र और जमुना। जमीन पर। पेटी बीच में रखी थी। उसका ढक्कन खुला हुआ।
सुमन ने काग़ज़ों को एक-एक करके निकाला और आँगन के पत्थर पर रखा। पाँच पन्ने। सात पन्ने। दस। अंधेरे में देखना मुश्किल था पर जमुना एक लालटेन ले आई। उसने दीया जलाया।
लालटेन की रोशनी में काग़ज़ और भी पीले लग रहे थे।
मैंने एक पन्ना उठाया — दूसरा। तीसरा।
"रुक," सुमन ने कहा। "ये देख।"
उसने एक काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। छोटा, मुड़ा, जैप में मिला था। खोला तो अंदर लिखा था — दादा की लिखाई।
अगर मेरी कोई ख़बर न मिले, तो सब कुछ उसी के पास है जिसने मुझे बचाया। उसे पहचान नहीं, बस इतना जान — वो औरत नहीं।
"वो औरत नहीं?" बंसी ने कहा। "मतलब औरत नहीं? तो कौन?"
"औरत नहीं," जमुना ने धीरे कहा। "तीसरी कौशल्या औरत नहीं है।"
"तो कौन?"
"यही तो," जमुना ने कहा। "जो आज रात सामने आया।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। सुमन ने मेरी तरफ़ देखा।
"मन्नू," सुमन ने कहा। "नाम है काग़ज़ पर। दादा ने लिख दिया है — पर उसने नाम नहीं लिखा। उसने सिर्फ़ इतना लिखा — 'वो औरत नहीं'।"
"मतलब वो जानता था," मैंने कहा। "वो जानता था कि कौन है। और उसने नाम नहीं लिखा क्योंकि—"
"क्योंकि उसे डर था," जमुना ने कहा। "कि काग़ज़ पढ़ने वाले को भी वही होगा जो उसे हुआ।"
हवा चल रही थी। लालटेन की लौ काँप रही थी। पाँचों चेहरों पर छाया और रोशनी साथ-साथ नाच रही थी।
"तो अब?" बंसी ने कहा।
"सुबह," मैंने कहा। "सुबह हम अदालत में सब कुछ देंगे। असली काग़ज़। असली पेटी। असली फ़ाइल। और ये—"
मैंने टोकन उठाया।
उलटा कोना-चिह्न वाला टोकन। ठंडा। मेरे टोकन के पास आते ही कितना अजीब है — एक ठंडा है, एक गरम। जैसे एक आम का बीज मिट्टी में हो और दूसरा हवा में।
"ये सुबह जज के हाथ में," मैंने कहा।
रात ग्यारह बजे। मैं हवेली के आँगन में लेटा था, आँखें खुली थीं। पेटी मेरे बगल में थी, फ़ाइल सुमन के सीने से लगी थी, और राजेंद्र गेट पर था।
चारों तरफ़ सन्नाटा।
मेरे जेब में टोकन गरम नहीं था। ठंडा भी नहीं था। बस वैसा ही था, जैसा पहले था। जैसे रात की थकान उसे भी आ गई हो।
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। वो बंद आँखों से लेटी थी, पर साँस से लग रहा था कि सोई नहीं।
"मन्नू," उसने धीरे कहा, आँखें बंद रखे हुए। "जो दादा ने लिखा — 'वो औरत नहीं' — तुझे क्या लगता है?"
"मुझे लगता है वो कोई आदमी है।"
"आदमी?"
"हाँ। जिसने सत्तर साल से औरत का नाटक किया। बस इसलिए कि कोई उसे ढूँढ न सके।"
सुमन ने आँखें खोलीं। "पर उसकी आवाज़ औरत जैसी थी।"
"भवानी के पिता की आवाज़ आदमी जैसी है," मैंने कहा। "और उसने भी चालीस साल तक ख़ुद को भवानी बनाकर रखा। यहाँ सब कुछ वैसा ही है जैसा दिखता है — बस उलटा।"
सुमन कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "कल किससे डरना है?"
"किसी से नहीं।"
"झूठ।"
"हाँ," मैंने कहा। "सच ये है — मुझे डर है कि सुबह सब ठीक हो जाएगा, और फिर भी कुछ छूटा रह जाएगा। जैसे पापा का वो असली काग़ज़, जो अभी तक नहीं मिला।"
सुमन ने मेरी तरफ़ देखा। "तेरे पास वो टुकड़ा है जो दादा ने भवानी के बाप को दिया था। वो टोकन का आधा हिस्सा है। अगर सुबह हम उसे और इस नए टोकन के साथ मिलाकर दिखाएँ—"
"तो?"
"तो जज को दिखेगा कि सब काग़ज़ कहीं और से नहीं, एक ही जगह से आ रहे हैं।"
मैंने सिर हिलाया। "कल सुबह।"
"कल सुबह," सुमन ने कहा।
उसने आँखें बंद कीं।
सुबह चार बजे बंसी ने मुझे जगाया। उसकी आँखों में वो चमक थी जो बस उसके पास ही होती है — चाय के बाद की चमक।
"मन्नू," उसने कहा। "उठ। बाहर कोई है।"
मैं उठा। गेट के पास गया। सलाखों के बाहर — एक साइकिल खड़ी थी। उस पर एक लिफ़ाफ़ा बँधा था।
किसी की परछाईं नहीं थी। सिर्फ़ साइकिल। और लिफ़ाफ़ा।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक पीली पर्ची थी। पर ये कोई धमकी नहीं थी। कोई बुलावा नहीं था।
इस पर सिर्फ़ इतना लिखा था —
"आज सुबह तेरे पास जो भी है, वो काफ़ी है। ज़्यादा की मत सोचना। — सुखदेव का पहरा।"
मैंने वो पर्ची बंसी को दी। बंसी ने पढ़ी और एक लंबी साँस ली।
"अच्छा है," उसने कहा। "किसी ने तो सुबह से पहले हमारे बारे में सोचा।"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। पूरब में हल्की लालिमा घुल रही थी। पक्षी चहचहाने लगे थे। और हवेली की दीवारों पर, पुरानी ईंटों पर, सुबह की पहली किरण पड़ने लगी थी।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
दो टोकन थे। एक — मेरा, जो अब गर्म नहीं था। और एक — जो अभी भी ठंडा था। दोनों अलग। दोनों चुप।
और उस वक़्त, उस चुप्पी में, मैंने पहली बार महसूस किया — ये टोकन मेरे नहीं हैं। ये कभी किसी के नहीं थे। ये सिर्फ़ हिसाब के मोहर थे। और आज सुबह, आख़िरकार, वो मोहर अपनी जगह पर वापस जाने वाली थी।
मैंने पेटी की तरफ़ देखा।
"उठो," मैंने कहा, आँगन की तरफ़ मुड़कर। "अदालत का वक़्त आ गया।"
॥
अदालत का वक़्त आ गया — मैंने कहा था, पर मुझे नहीं पता था कि वक़्त ख़ुद मेरे पास आकर खड़ा हो जाएगा।
आँगन के बाहर सड़क से एक आवाज़ आई। साइकिल की घंटी नहीं। किसी के भागने की आवाज़। बंसी दौड़कर गेट तक गया, और मैं उसके पीछे। सलाखों के बाहर सड़क पर एक लिफ़ाफ़ा पड़ा था, और उस लिफ़ाफ़े के ऊपर — एक पीतल का टोकन।
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