The Token System – Chapter 1098
"कितनी दूर हैं?" मैंने पूछा।
"गेट के बाहर," जमुना ने कहा। "तीन गाड़ियाँ — दो सफ़ेद, एक काली। और वो औरत सामने खड़ी है, साड़ी का पल्लू सिर पर।"
सुमन ने मेरी कलाई पकड़ ली। "मन्नू, काग़ज़ मेरे पास हैं। अगर वो लोग हमें यहाँ घेर लें—"
"नहीं घेरेंगे," मैंने कहा। "क्योंकि वो अंदर आएँगे ही नहीं। वो बाहर रुकेंगे, रौब दिखाएँगे, और हमें डराकर काग़ज़ माँगेंगे। यही उनका तरीक़ा है — बीस साल से यही चल रहा है।"
"तो?"
"तो हम उनका तरीक़ा तोड़ेंगे।"
मैंने जेब से फ़ोन निकाला। सिग्नल एक डंडा। हवेली की दीवारें मोटी थीं। मैंने बंसी का नंबर मिलाया — बंद। राजेंद्र का — बंद।
"कहाँ हैं ये दोनों?" सुमन ने पूछा।
"बंसी तो घर के बाहर दो आदमियों से उलझा हुआ था," मैंने कहा। "और राजेंद्र गाड़ी लेने गया था।"
जमुना ने लाठी ज़मीन पर टेक दी। "मन्नू, एक बात सुन। वो औरत जो मेरी माँ की शक्ल बना रही है — वो अंदर आने की कोशिश करेगी। क्योंकि वो जानती है कि नींव का काग़ज़ कहाँ है। और वो ये भी जानती है कि मैं अकेली हूँ।"
"तो अब अकेली नहीं हो," मैंने कहा।
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। "तू काग़ज़ लेकर हवेली के पिछले दरवाज़े से निकल। बावड़ी वाली सीढ़ियों से नीचे जा — वहीं रुक, कड़ी के पीछे। जो भी हो, काग़ज़ किसी के हाथ मत लगने देना।"
"और तू?"
"मैं सामने जा रहा हूँ। उनसे बात करूँगा। और जब तक सक्सेना नहीं पहुँचती, उन्हें रोकूँगा।"
सुमन ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर सिर हिलाया और पीछे की तरफ़ चली गई। उसकी जैकेट का उभार अंधेरे में लुप्त हो गया।
जमुना ने मेरी तरफ़ मुड़कर कहा, "एक और बात। वो औरत — तीसरी कौशल्या — सत्तर साल पहले हवेली में आई थी, सोलह की उम्र में। उसने मेरी माँ का नाम अपने ऊपर ओढ़ लिया और फिर तीन पीढ़ियों तक यही नाटक चलता रहा। जो औरत आज रात आई है, वो उसी की बेटी है। या ख़ुद वही। कोई नहीं जानता कि उस चेहरे के पीछे कौन है।"
"आज पता चल जाएगा," मैंने कहा।
हवेली का गेट खुला था। जंग लगी सलाखों वाला लोहा, चौदह कीलें, बीच से टूटा हुआ। उसके बाहर गली में तीन गाड़ियाँ खड़ी थीं — दो सफ़ेद, एक काली। गाड़ियों के दरवाज़े खुले थे, इंजन बंद।
और उनके बीच, गली के ठीक बीचोंबीच, एक औरत खड़ी थी।
सफ़ेद साड़ी। सिर पर पल्लू। हाथ में — मैंने गौर से देखा — कुछ नहीं। दोनों हाथ सामने जुड़े हुए, जैसे कोई साध्वी खड़ी हो। पर उसके पीछे, चार आदमी थे। दो के हाथ खाली, एक के हाथ में लाठी, और एक के हाथ में — हथौड़ा।
मैं गेट के पास पहुँचा और सलाखों के पीछे खड़ा हो गया। बाहर नहीं निकला।
औरत ने पल्लू थोड़ा सरकाया। चेहरा सामने आया।
मेरी साँस रुक गई।
वो माँ जैसी दिखती थी। बिलकुल नहीं — जैसी? हाँ, जैसी। वही नाक, वही माथे की चौड़ाई, वही होंठों का झुकाव। पर आँखें अलग थीं। माँ की आँखों में थकान है, ये आँखों में कुछ और था। कोई भूख। सत्तर साल की भूख।
"मनोहर," उसने कहा। आवाज़ माँ जैसी थी। माँ जैसी ही — धीमी, भारी।
"माँ की आवाज़ बंद कर," मैंने कहा। "मेरे सामने कम से कम।"
वो हँसी। छोटी, सूखी हँसी।
"मैं तेरी माँ नहीं हूँ," उसने कहा। "और मैं ये नाटक भी नहीं कर रही। तेरी माँ जैसा दिखना मेरी ग़लती नहीं — हम एक ही खून के हैं। दूर के, पर एक ही।"
"तू कौन है?"
"मेरा नाम काग़ज़ों में कौशल्या है," उसने कहा। "और उससे पहले मेरी माँ का नाम कौशल्या था। और उससे पहले उसकी। तीन पीढ़ियाँ — एक नाम। क्योंकि नाम नहीं, हिस्सा ज़रूरी था।"
उसने एक कदम आगे बढ़ा। पीछे के चार आदमी भी आगे बढ़े।
"तेरे हाथ में जो काग़ज़ हैं," उसने कहा, "वो मेरे हैं। मेरी माँ के थे। उसकी माँ के थे। तेरे दादा ने उन्हें चुराया था, और तेरे बाप ने उन्हें दीवार में छिपाया। अब लौटा दे।"
"तेरे?" मैंने कहा। "जिस काग़ज़ पर तेरा नाम तक नहीं, वो तेरा?"
"मेरा नाम है," उसने कहा। "काग़ज़ पर नहीं है, पर खून में है।"
"खून में नाम होते हैं?" मैंने पूछा। "मुझे तो लगता था खून में सिर्फ़ लाल रंग होता है।"
उसके चेहरे पर कुछ बदला। बहुत थोड़ा। जैसे किसी पुराने ज़ख़्म पर उँगली फेर दी गई हो।
"तू अपने बाप जैसा बोलता है," उसने कहा।
"तेरी नज़र में ये तारीफ़ है या गाली?"
"दोनों," उसने कहा। "तेरा बाप भी ऐसे ही मुँह लगा था। और वो अब तक अस्पताल में है।"
मेरी मुट्ठी भिंच गई। पर मैंने आवाज़ नहीं बदली।
"तेरे हरि सिंह ने उसे बीस साल दीवार में रखा," मैंने कहा। "और तू उसी के साथ खड़ी है?"
"मैं हरि सिंह के साथ नहीं हूँ," उसने कहा। "हरि सिंह मेरे साथ है। फ़र्क़ समझता है?"
"नहीं।"
"समझ जाएगा," उसने कहा। "जब तेरे पास कुछ नहीं बचेगा।"
पीछे से एक आवाज़ आई — गाड़ी की आवाज़। सबने सिर घुमाया।
गली के मोड़ से एक पुरानी नीली जीप आ रही थी, और उसके बोनट पर बैठा था — बंसी।
गाड़ी रुकी। बंसी उतरा। उसके हाथ में फावड़ा था।
"अरे भाई," बंसी ने कहा, गली में आते हुए। "इतनी रात को इतनी भीड़? मोहल्ले में पता चल गया तो कल चाय की दुकान पर पूछताछ हो जाएगी।"
"बंसी, पीछे रह," मैंने कहा।
"पीछे?" बंसी ने कहा। "मैं तो आगे आया हूँ।" वो मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया, फावड़ा दोनों हाथों से पकड़े हुए। "और सुन, ये बुढ़िया जो तेरी माँ जैसी दिखती है — इसने सुबह मेरी दुकान के शटर के नीचे एक लिफ़ाफ़ा डाला था। उसमें लिखा था — 'दुकान बंद कर दे, तेरे बच्चे नहीं हैं तो क्या, दुकान तो है।'"
उसने औरत की तरफ़ देखा। "मेरी दुकान से बढ़कर कुछ नहीं है मेरे पास। और वो भी तूने छूने की कोशिश की।"
औरत ने बंसी को देखा, फिर मुझे। "तूने अपने लोग जमा कर लिए?"
"मेरे लोग ख़ुद जमा होते हैं," मैंने कहा। "मुझे बुलाना नहीं पड़ता।"
तभी पीछे से एक और आवाज़ आई — सीटी की। तेज़, दो बार।
गली के मोड़ पर दो सिपाही खड़े थे। एक के हाथ में लाठी, दूसरे के हाथ में टॉर्च। और उनके पीछे — राजेंद्र, जो अपनी कमर से रिवॉल्वर निकाल रहा था।
"ठाकुर साहब के आदमी," राजेंद्र ने कहा, आते हुए। "गली में इस वक़्त, हथौड़ा लेकर। मुझे लगता है ये अभी यहाँ से चले जाएँगे।"
औरत ने राजेंद्र को देखा। उसकी आँखों में पहली बार कुछ बदला — हड़बड़ी नहीं, गिनती।
"चार आदमी," उसने कहा। "और तुम दो। हम तीन गाड़ियों में हैं।"
"और मैं एक फ़ोन में हूँ," राजेंद्र ने कहा। "थाने में। तीसरा फ़ोन — कलेक्टर के दफ़्तार में। पाँच मिनट पहले कर दिया। तो अब तू गिनती कर — कितने मिनट में पहुँचेंगे।"
औरत ने एक पल सोचा। फिर उसने पल्लू ठीक किया और मुड़कर गाड़ी की तरफ़ बढ़ी।
"मनोहर," उसने बिना मुड़े कहा। "आज रात तो तेरी है। पर काग़ज़ जो तूने उठाए हैं — वो सुबह अदालत तक नहीं पहुँचेंगे। ये मेरा वादा है।"
"तेरे वादे बीस साल पुराने हैं," मैंने कहा। "आज के लिए नया कोई है?"
वो रुकी। मुड़ी। और उसके चेहरे पर वो हँसी आई फिर से।
"नया वादा नहीं," उसने कहा। "नया हिसाब है। और वो सुबह खुलेगा।"
वो गाड़ी में बैठी। दरवाज़ा बंद हुआ। तीनों गाड़ियाँ एक साथ चलीं — धीरे, बिना हड़बड़ी के। जैसे जानती हों कि जाने की जगह वापस आना है।
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