The Token System – Chapter 1097
नीचे एक छोटा कमरा था — दीवारों पर बनी हुई तीन शेल्फें, एक पुरानी मेज़, और मेज़ पर एक लालटेन। लालटेन के सामने, कुर्सी पर, एक बूढ़ा आदमी बैठा था — सफ़ेद दाढ़ी, टोपी, हाथ में लाठी। उसके सामने ज़मीन पर एक लोहे का डिब्बा था और डिब्बे पर सीमेंट का एक थैला।
बूढ़े ने सिर उठाया। मुझे देखा। और मुस्कुराया।
"मन्नू," उसने कहा। "आ जा। मैं तेरा ही इंतज़ार कर रहा था।"
"तू कौन है?"
"मैं वो नहीं हूँ जिसे तू ढूँढ रहा है," उसने कहा। "मैं वो हूँ जो उसे बचाने आया है।"
उसने डिब्बे पर रखा सीमेंट का थैला उठाया और उसे एक तरफ़ रख दिया।
"देख," उसने कहा। "मैं इसे डाल सकता था। पर मैंने नहीं डाला। क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तू ख़ुद देखे कि इस डिब्बे में क्या है।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। सुमन ने काग़ज़ों का बंडल और कसकर दबाया।
"खोल," बूढ़े ने कहा। "मैं तुझे रोकता नहीं।"
मैं आगे बढ़ा। डिब्बे का ढक्कन उठाया।
अंदर काग़ज़ थे — पुराने, पीले, मुड़े हुए। और उनके ऊपर एक तस्वीर — वही तीन आदमी, पर इस बार चौथा भी था। चौथे का चेहरा जला हुआ था।
और तस्वीर के नीचे एक पर्ची थी, जिस पर लिखा था — "जो चौथे को पहचाने, वो हवेली का असली हिसाब रखेगा।"
बूढ़े ने कहा, "अब पूछ। तेरे पास सिर्फ़ एक सवाल का वक़्त है।"
나는 उसकी तरफ़ देखा। "चौथा कौन है?"
बूढ़े ने लाठी ज़मीन पर टिकाई और धीरे से बोला, "चौथा वो है जिसका नाम तूने अभी-अभी पढ़ा — कौशल्या।"
"माँ?"
"नहीं," बूढ़े ने कहा। "तेरी माँ नहीं। कौशल्या — तेरी माँ का नाम नहीं। तेरी माँ का नाम कौशल्या नहीं है। कौशल्या वो नाम है जो सत्तर साल पहले एक औरत ने ओढ़ा था और फिर उसे अपनी बेटी को दे दिया। और उस बेटी ने उसे अपनी बेटी को। तेरी माँ उस नाम की तीसरी औरत है। और असली कौशल्या — पहली कौशल्या — आज भी ज़िंदा है।"
मेरे हाथ से पर्ची गिर गई।
"तो फिर नींव का काग़ज़ किसका है?"
बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा। "तीसरे हिस्से का। और तीसरा हिस्सा उस औरत का है जो इस हवेली में सत्तर साल से रह रही है और जिसका नाम किसी काग़ज़ पर नहीं।"
"जमुना?"
"नहीं," बूढ़े ने कहा। "जमुना उसकी बहन है। तीसरा हिस्सा उस औरत का है जिसने आज रात तेरी माँ की शक्ल बनाई।"
मैं पत्थर की तरह खड़ा रह गया।
सुमन ने धीरे से कहा, "तो वो औरत — जो हमें अस्पताल में मिली — जो बोली कि वो सुखिया की बहन है —"
"वो तीसरी कौशल्या है," बूढ़े ने कहा। "और वो नहीं चाहती कि ये काग़ज़ बाहर आए। क्योंकि अगर ये बाहर आए, तो सबको पता चलेगा कि उसने सत्तर साल तक अपनी बहन का नाम ओढ़कर हवेली को भवानी के बाप के हाथ में बेचा था।"
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। सुमन की आँखों में पानी था।
"तो फिर तू कौन है?" मैंने बूढ़े से पूछा।
बूढ़े ने लाठी उठाई और उसकी नोक मेरी तरफ़ की।
"मैं वो हूँ," उसने कहा, "जिसे तेरे दादा ने इस काग़ज़ पर गवाह बनाया था। और जिसे तेरी माँ ने सत्तर साल तक इस हवेली में छिपाकर रखा।"
उसने लाठी की नोक से डिब्बे की तरफ़ इशारा किया। "अब दूसरा सवाल पूछ। पर जल्दी। क्योंकि भवानी का बाप ग्यारह बजे आएगा — और वो मुझे नहीं जानता। वो समझता है कि इस कमरे में सिर्फ़ वो आता है।"
मैंने सुमन का हाथ पकड़ा।
"एक सवाल," मैंने कहा। "अगर तू गवाह है, तो तेरे पास क्या है जो अदालत में चले?"
बूढ़े ने लाठी उठाई और उसका हैंडल घुमाया। हैंडल खुला और उसमें से एक छोटी पीली पर्ची निकली — बहुत पुरानी, मुड़ी हुई, जिस पर तीन शब्द थे।
"ये," उसने कहा। "ये पर्ची तेरे दादा ने उस रात लिखी थी जब उन्हें मारा गया था। और इसमें लिखा है कि हवेली का तीसरा हिस्सा किसका है।"
मैंने पर्ची ली। पढ़ा।
और मेरे हाथ काँपने लगे।
पर्ची पर लिखा था — "तीसरा हिस्सा तीसरी कौशल्या का नहीं। तीसरा हिस्सा उस औरत का है जिसने मुझे बचाया — और वो औरत आज भी इस हवेली में, इसी कमरे के ऊपर, तेरी माँ की शक्ल में रहती है। जिस दिन ये पर्ची बाहर आए, उस दिन उसका असली चेहरा सबको दिखेगा।"
बूढ़े ने लाठी नीचे रखी।
"अब तू जान गया," उसने कहा। "अब तेरे पास सिर्फ़ एक चीज़ है — वक़्त। और वो वक़्त ग्यारह बजे ख़त्म हो जाएगा।"
वो उठा। उसने डिब्बे से काग़ज़ निकाले और सुमन की तरफ़ बढ़ा दिए।
"ये ले। ये वो काग़ज़ हैं जो भवानी का बाप जलाने आया है। इन्हें लेकर अदालत जा। और हाँ —"
वो मेरी तरफ़ मुड़ा। "तेरी माँ से कहना कि वो जो चूड़ी पहनती है, वो असली कौशल्या की है। और असली कौशल्या आज भी ज़िंदा है। तेरी माँ को नहीं पता कि वो कौन है। उसे बताना।"
वो सीढ़ी की तरफ़ बढ़ा।
"तू कहाँ जा रहा है?" मैंने पूछा।
"मैं वहीं जा रहा हूँ जहाँ से आया था," उसने कहा। "तेरे दादा के पास। लेकिन तेरे लिए एक बात छोड़ रहा हूँ — इस कमरे की दीवार पर, पीछे की तरफ़, एक नाम लिखा है। वो नाम इस काग़ज़ की चाबी है। जब अदालत में सब कुछ ख़त्म हो जाए, तब उसे पढ़ना।"
वो सीढ़ी चढ़ने लगा। फिर रुका और बिना मुड़े बोला, "और मन्नू — भवानी का बाप अकेला नहीं आएगा। उसके साथ वो आएगा जिसे तू जानता है।"
"कौन?"
"वो जिसने आज रात माँ की शक्ल बनाई," बूढ़े ने कहा। "वो ख़ुद आएगी। क्योंकि वो जानती है कि अगर ये काग़ज़ बाहर आए, तो उसका सत्तर साल का नकाब उतर जाएगा।"
और वो सीढ़ी पर ऊपर की तरफ़ चला गया — धीरे, लाठी की खट-खट के साथ।
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। सुमन के हाथ में काग़ज़ों का बंडल था और उसकी आँखों में आँसू।
"मन्नू," उसने धीरे कहा। "अगर तीसरी कौशल्या आज रात आएगी, तो उसके साथ शायद वो हथौड़ा भी होगा जो भवानी का बाप लाएगा।"
"हाँ," मैंने कहा।
"तो हमें अभी चाहिए — पुलिस।"
"नहीं," मैंने कहा। "हमें अभी चाहिए — अदालत। और एक ऐसा आदमी जो सुबह होश में हो।"
मैंने फ़ोन निकाला और सक्सेना का नंबर मिलाया।
"सक्सेना जी," मैंने कहा। "अभी सुनिए। हवेली की नींव में जो काग़ज़ हैं, वो मेरे हाथ में हैं। और वो काग़ज़ भवानी का नहीं, भवानी के बाप का भी नहीं — उनका है जिन्हें सत्तर साल से सब भूले हुए हैं। आप जज साहब को फ़ोन कीजिए। कहिए कि सुनवाई आज रात हो। अभी। क्योंकि सुबह तक शायद काग़ज़ भी न बचें और गवाह भी नहीं।"
सक्सेना ने कुछ पूछा।
"हाँ," मैंने कहा। "मैं जानता हूँ कि जज रात में नहीं सुनते। पर आप कहिए कि मामला जान का है। और ये कहिए कि अगर वो न आए, तो सुबह उन्हें अख़बार में पढ़ना पड़ेगा कि हवेली की नींव में तीसरी कौशल्या की हड्डियाँ मिली हैं।"
फ़ोन रखा।
सुमन ने काग़ज़ों का बंडल मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये कहाँ रखें?"
"तेरे पास।" मैंने कहा। "तू डॉक्टर है। कोई तुझ पर शक नहीं करेगा।"
सुमन ने काग़ज़ अपनी जैकेट में रखे।
और उसी वक़्त ऊपर से जमुना की आवाज़ आई — तेज़, काँपती हुई।
"मन्नू! वो आ गए! तीन गाड़ियाँ!"
मैंने सुमन का हाथ पकड़ा।
"सीढ़ियाँ," मैंने कहा। "अभी।"
हम सीढ़ी चढ़ने लगे। ऊपर जमुना खड़ी थी, लाठी हाथ में, और उसकी आँखें हवेली के गेट की तरफ़ थीं।
"कितने?" मैंने पूछा।
"तीन गाड़ियाँ," जमुना ने कहा। "और एक औरत — सफ़ेद साड़ी में। जो तेरी माँ जैसी दिखती है।"
॥
मैं सीढ़ी की आख़िरी पौड़ी पर पैर रखते-रखते रुक गया। ऊपर आसमान खुला था, हवेली की छत पर चाँद की रोशनी पड़ी थी और जमुना के हाथ में लाठी काँप रही थी।
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