The Token System – Chapter 1081
मैंने उसकी तरफ़ देखा। भवानी की आँखें लाल थीं।
“तूने बीस साल तक मेरे पापा को कैद रखा,” मैंने कहा। “और अब अमर के लिए इंसाफ़ माँग रहा है?”
“हाँ।” उसने बिना झिझक कहा। “क्योंकि वो मेरा बेटा है, और मैं उसके लिए कुछ कर सकता हूँ। तेरे पापा के लिए नहीं कर सका — तेरे बाप नहीं, मेरे बाप ने किया था।”
“मैं अमर को बचाऊँगा,” मैंने कहा। “पर झूठ से नहीं। जो सच है, वो अदालत में जाएगा। अगर अमर निर्दोष है, तो अदालत उसे बचाएगी।”
“अदालत मेरे नाम से उसे बचाएगी? भवानी का बेटा — हवेली के केस में?” वो हँसा, पर हँसी में कुछ नहीं था। “तू अभी छोटा है, मन्नू।”
“तो फिर डायरी जला दे,” मैंने कहा। “अगर तुझे लगता है कि यही रास्ता है।”
भवानी ठिठक गया।
“जला दे,” मैंने दोहराया। “क्योंकि मेरे पास इसकी कॉपी है। सुमन ने रात में ही इसके हर पन्ने की फोटो खींच ली थी। तेरी नक़ल अदालत तक नहीं पहुँचेगी, पर मेरी कॉपी पहुँचेगी।”
भवानी का चेहरा बदल गया। वो कुर्सी से उठा। खिड़की तक गया, पीठ करके खड़ा रहा। उसके कंधे ऊपर-नीचे हो रहे थे।
“तो तूने मुझे चकमा दिया,” उसने धीरे से कहा।
“नहीं। मैंने सिर्फ़ तेरे जाल को उल्टा कर दिया। तूने सोचा कि डायरी तेरे हाथ में है तो सब तेरे हाथ में है। ये तेरी सबसे बड़ी ग़लती थी — तूने हिसाब को काग़ज़ समझा। हिसाब काग़ज़ नहीं होता, भवानी। हिसाब याद होता है।”
भवानी मुड़ा। वो मेज़ तक आया, डायरी उठाई और मेरी तरफ़ फेंक दी। वो मेरी गोद में गिरी।
“ले जा,” उसने कहा। “पर कल अदालत में मेरा वकील तेरे हर काग़ज़ को झूठा साबित कर देगा। भवानी के होम का रजिस्टर? जला। शेखर बाबू की फाइल? चोरी की। तेरे पापा की चिट्ठी? मरे हुए आदमी की लिखाई — कौन मानेगा? और तेरे पास कोई गवाह नहीं बचेगा।” वो रुका। “जगदीश कल रात से गायब है। तुझे पता है न?”
मैं चुप रहा।
“मेरे पास कोई नहीं आया,” उसने कहा। “मैंने उसे नहीं उठाया। पर कोई और उठा ले गया — और जब तक वो नहीं मिलेगा, तेरा केस जगदीश के बयान पर टिका है।”
“मेरे पास बसंती है।”
“बसंती?” भवानी ने भौंहें चढ़ाईं। “वो तो मेरे होम में काम करती थी। उसका बयान तेरे हक़ में जाएगा?”
“वो कहेगी कि तूने बीरा देवी को मरवाया।”
भवानी हँसा। “कहेगी? या साबित करेगी?” वो अपनी कुर्सी पर बैठ गया। “मन्नू, मैं तुझे एक बात बताता हूँ जो मेरे बाप ने मुझे सिखाई थी — अदालत में सच नहीं जीतता। सच वो जीतता है जो सबसे पहले मुहर लगवा ले। तेरे पास सच है, पर मुहर मेरे पास है।”
“फिर तू इतना डरा हुआ क्यों बैठा है?”
भवानी ने मेरी तरफ़ देखा। कुछ देर तक देखता रहा। फिर उसने कुर्सी के हैंडल पर हाथ रखा और धीरे से कहा, “क्योंकि मेरी मुहर पर अब धूल जम गई है।”
वो उठा। वो दरवाज़े तक गया और उसे खोल दिया।
“अब जा।” उसने कहा। “कल अदालत में मिलेंगे। और हाँ —” उसने मेरी तरफ़ देखा, “तेरी माँ को बोल देना कि मैंने अपना वादा निभाया। डायरी उसके बेटे को लौटा दी। मैं उसका नाम नहीं खींचूँगा।”
“कौन सा नाम?”
पर भवानी ने जवाब नहीं दिया। वो अंधेरे में चला गया।
सीढ़ियों पर मैंने डायरी को अपनी जैकेट के अंदर रखा। बाहर आया तो बंसी दौड़ा आया।
“क्या हुआ?”
“डायरी मिल गई।” मैंने जैकेट पर हाथ रखा। “अब अदालत चलें। सुमन से मिलना है — रात में ही उसे कॉपी देनी है। और बसंती को सुरक्षित रखना है।”
“बंसी,” मैंने गाड़ी में बैठते हुए कहा, “भवानी ने आज पहली बार मुझे कुछ दिया है — बिना शर्त के।”
बंसी ने इंजन चालू किया।
“क्यों?”
मैंने खिड़की से बाहर देखा। भवानी के होम की पिछली खिड़की में रोशनी अब बुझ गई थी।
“क्योंकि उसने देख लिया है,” मैंने कहा, “कि उसका अपना हिसाब भी अब उसके हाथ में नहीं रहा।”
गाड़ी गली की तरफ़ मुड़ी। रास्ते में एक भी आदमी नहीं था। पर जब हम मोड़ पर पहुँचे, तो सामने की दीवार पर, चूने से, ताज़ा लिखा था:
‘जगदीश ज़िंदा है। पर वो बोलेगा वही जो मैं कहूँगा। और मैं कहूँगा — सच।’
बंसी ने गाड़ी रोक दी।
“ये ग़लत लग रहा है,” उसने कहा। “सच कहने की धमकी?”
मैंने टोकन जेब से निकाला। वो ठंडा था — पूरी तरह। और उसकी सोलहवीं लकीर के नीचे कोई शब्द नहीं था। बस ख़ालीपन — जैसे टोकन भी अब इंतज़ार में है।
“बंसी,” मैंने कहा। “कल अदालत में जब डायरी पढ़ी जाएगी — मैं वहाँ खड़ा रहूँगा। और जो भी हो, मैं झुकूँगा नहीं।”
बंसी ने गाड़ी आगे बढ़ाई।
“मुझे पता है,” उसने कहा। “इसीलिए तो मैं तेरे साथ हूँ।”
सुबह होने में अभी पाँच घंटे थे। और उन पाँच घंटों में सब कुछ बदलने वाला था।
॥
सुबह साढ़े नौ बजे अदालत का बरामदा दो हिस्सों में बँटा था। एक तरफ़ भवानी के आदमी, दूसरी तरफ़ हम लोग — मैं, बंसी, राजेंद्र, और सुमन जो सीधे अपनी ड्यूटी की साड़ी में आई थी, हाथ में फाइल दबाए। माँ घर पर रीना के साथ थी। मैंने कहा था — आज तू स्कूल मत जा। छोटू दरवाज़े पर बैठा था, जैसे पहरा दे रहा हो।
दस बजे जज साहब आए और उन्होंने काग़ज़ पर नज़र डालते हुए कहा, “पिछली सुनवाई में जो काग़ज़ पेश हुए थे, उनकी जाँच आज होगी। सक्सेना जी, आप शुरू करें।”
सक्सेना खड़ी हुईं। उन्होंने डायरी उठाई और कहा, “जज साहब, यह डायरी भवानी सिंह के पिता की लिखी हुई है, इसमें हवेली के बँटवारे का पूरा हिसाब है, और इसमें साफ़ लिखा है कि चौथा हिस्सा किशनचंद यानी मनोहर के पापा का है।”
तभी अदालत का दरवाज़ा खुला। जो आदमी अंदर आया, उसे देखकर मेरा हाथ ठंडा हो गया।
सफ़ेद शेरवानी, चमकती घड़ी, चाँदी के बाल — शहर का सबसे महँगा वकील। शुक्ला जी। मैंने उसका नाम अख़बार में पढ़ा था — उसने दो साल पहले भवानी के ख़िलाफ़ एक केस लड़ा था और जीता था। और अब वो भवानी के बगल में खड़ा था।
“माफ़ी चाहता हूँ, माई लॉर्ड,” उसने कहा, बिना जल्दबाज़ी के। “मैं इस केस में पक्षकार हूँ। और मैं यह कहने आया हूँ कि जो काग़ज़ यहाँ पेश हुए हैं, वो सब ज़बरदस्ती के हैं।”
“ज़बरदस्ती?” जज ने चश्मा नीचे किया।
“मनोहर नाम का यह आदमी —” उसने मेरी तरफ़ उँगली उठाई — “पिछले कुछ हफ़्तों में भवानी सिंह के घर, उनके दफ़्तार, उनके नर्सिंग होम में घुसता रहा है, रात में। यह काग़ज़ उसने चुराए हैं। इस डायरी पर किसी का हस्ताक्षर नहीं, कोई मुहर नहीं। काग़ज़ का टुकड़ा अदालत में कुछ साबित नहीं करता।”
मेरे गले में कुछ अटक गया। मैंने सुमन की तरफ़ देखा। उसने मेरी कलाई दबाई।
“जज साहब,” सक्सेना ने कहा, “इस डायरी के पन्नों पर स्याही की उम्र अदालत की जाँच से साबित हो चुकी है। यह बीस साल पुरानी है।”
“उम्र साबित हो सकती है, साहिबा,” शुक्ला ने कहा, “यह तो कोई भी लिख सकता है। सवाल यह है — इसे अदालत में किसने लाया, और किस हक़ से?”
भवानी अपनी कुर्सी पर बैठा था। उसके चेहरे पर कुछ नहीं था। न जीत, न डर। बस वो अपने वकील की तरफ़ देख भी नहीं रहा था — जैसे जानता हो कि यह सब पहले से तय था।
शुक्ला ने अपनी फाइल खोली। “माई लॉर्ड, मैं यह भी बताना चाहूँगा कि इस केस का मुख्य गवाह जगदीश कल रात से लापता है। ऐसे केस में जहाँ गवाह डरकर भाग रहे हों, काग़ज़ों की कोई कीमत नहीं।”
“मेरे पास गवाह हैं,” मैं बोल पड़ा। मेरी आवाज़ फटी हुई निकली। “बसंती है, वो बीस साल भवानी के होम में काम करती थी। कम्मो है। शांति है।”
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