The Token System – Chapter 1071
“अब?” लक्ष्मी ने पूछा।
“अब तुम हमारे साथ चलो।” मैंने कहा। “शांति से मिलना है। और अदालत में सबसे पहले तुम्हारी गवाही दर्ज होगी।”
हम गाड़ी की तरफ़ बढ़े। रास्ते में मैंने बंसी से कहा, “कम्मो का पता लगाना होगा। वो अकेली गवाह है जो भवानी की माँ के हिस्से को साबित कर सकती है।”
“और भवानी चाहता है कि वो मिले ही न।” बंसी ने कहा।
“पर उसने पता बताने की बात कही।” मैंने कहा। “इसका मतलब — वो कम्मो से डरता है। या कम्मो के ज़रिए किसी और से।”
“तो उल्टा सोच।” बंसी ने कहा। “अगर भवानी चाहता कि कम्मो न मिले, तो वो हमें उसका पता क्यों बताता? वो तो हमें अंधेरे में भटकाना चाहेगा। इसका मतलब — भवानी जानता है कि कम्मो हमें कहीं और ले जाएगी, जहाँ भवानी का सबसे बड़ा काग़ज़ छिपा है।”
“या फिर वो हमें सीधा उस जाल में ले जाएगा जहाँ वो चाहता है।” मैंने कहा।
“दोनों एक ही रास्ता हैं।” बंसी ने कहा। “फ़र्क़ सिर्फ़ इतना — हमें पता है कि जाल है।”
मैंने टोकन जेब से निकाला। वो हल्का गरम था। एक नई लकीर आई थी, और उसके नीचे दो शब्द।
“क्या लिखा?” लक्ष्मी ने पूछा।
“‘कम्मो। दीवार।’” मैंने पढ़ा।
बंसी ने गाड़ी स्टार्ट की। सड़क सूनी थी। दूर से अदालत की घड़ी की आवाज़ आई। सुबह के सात बजे। अभी तीन घंटे बाकी थे।
“दीवार कौन सी?” लक्ष्मी ने पूछा।
“पता लगाएँगे।” मैंने कहा। “आज दीवार बोलेंगी।”
गाड़ी आगे बढ़ी। पीछे भवानी का होम छोटा होता जा रहा था, और सामने अदालत की गली लंबी होती जा रही थी।
गाड़ी शहर की तरफ़ भाग रही थी। लक्ष्मी पीछे बैठी थी, सफ़ेद साड़ी में, और बार-बार बाहर झाँक रही थी, जैसे बीस साल बाद पहली बार शहर देख रही हो।
“एक बात पूछूँ?” उसने कहा। “तुम्हारे बाप को कम्मो से क्या लेना था?”
“यही तो पता नहीं।” मैंने कहा।
“मैंने एक बार सुना था।” लक्ष्मी ने धीरे से कहा। “रात को, जब भवानी किसी से फ़ोन पर बात करता था। उसने कहा था — ‘वो काग़ज़ भवानी के बाप के पास से गया था, कम्मो के हाथ लगा, और अब उसके बेटे को भी पता नहीं कि उसके बाप ने क्या किया था।’”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। उसने गाड़ी धीमी की।
“कम्मो के हाथ लगा मतलब?” बंसी ने पूछा।
“मतलब — काग़ज़ कम्मो के पास है।” लक्ष्मी ने कहा। “या था। भवानी उसे तब से ढूँढ रहा है।”
“और मेरे बाप?” मैंने कहा। “वो कम्मो तक कैसे पहुँचे?”
“ये तो वही बता सकती है जो उस वक़्त वहाँ थी।” लक्ष्मी ने कहा।
मैंने टोकन फिर निकाला। लकीरें बढ़ रही थीं, पर नई लाइन नहीं आई। सिर्फ़ दो शब्द — कम्मो। दीवार।
“दीवार कौन सी हो सकती है?” बंसी ने पूछा।
“भवानी के होम की दीवार?” मैंने कहा।
“नहीं।” लक्ष्मी ने कहा। “वो दीवार तो हम देख आए। टोकन उस जगह का नाम लेता है जहाँ कुछ छिपा है। भवानी के होम में कुछ छिपा होता तो वो हमें वहाँ जाने ही न देता।”
मुझे कुछ याद आया। “बसंती दीदी, तुमने कहा था कि कम्मो शेखर के केबिन में सफ़ेद साड़ी में काग़ज़ ले जाती दिखी थी। उस काग़ज़ में क्या था — देखा था तुमने?”
“नाम देखा था।” उसने कहा। “ऊपर लिखा था — ‘धरोहर’। और नीचे तारीख़। मैंने तारीख़ नहीं पढ़ी, पर शेखर के हाथ से काग़ज़ छीनकर कम्मो ने कहा था — ‘भवानी को बोल देना, अब ये तुम्हारे पास नहीं रहेगा। ये पुराने बंगले की दीवार में जाएगा।’”
“पुराना बंगला।” मैंने कहा। “कौन सा बंगला?”
“जो भवानी के ख़ानदान का पुराना घर है।” लक्ष्मी ने कहा। “शहर से बाहर, नदी के किनारे। मैंने बीस साल उस बंगले का नाम सिर्फ़ फुसफुसाते सुना है। भवानी वहाँ कभी नहीं गया। न जाने क्यों।”
“क्योंकि वहाँ कुछ है।” बंसी ने कहा।
“या वहाँ कुछ है जो वो खो चुका है।” मैंने कहा।
बंसी ने गाड़ी रोक दी।
“अदालत दस बजे है।” उसने कहा। “बंगला शहर से बाहर है — जाने में एक घंटा, आने में एक। हम समय पर नहीं लौट पाएँगे।”
“अगर हम कम्मो को नहीं लाए,” मैंने कहा, “अदालत में सिर्फ़ हमारी बात होगी। भवानी के पास वकील हैं, काग़ज़ हैं। हम कमज़ोर हैं।”
“और अगर हम अदालत नहीं पहुँचे,” बंसी ने कहा, “तो भवानी यही कहेगा कि हम फ़रार हो गए।”
लक्ष्मी ने बीच में कहा, “तुम दोनों जाओ। मुझे अदालत छोड़ दो।”
“अकेली?” मैंने कहा।
“मैं बीस साल तक अकेली रही हूँ, बेटा।” उसने कहा। “मुझे सिर्फ़ एक धक्का चाहिए था। तुमने दे दिया। अब मैं गवाही दे सकती हूँ।”
“पर तुम गवाही में क्या कहोगी?” बंसी ने कहा। “कम्मो का नाम? भवानी के काग़ज़ों की बात?”
“सब कहूँगी।” लक्ष्मी ने कहा। “जो देखा, जो सुना, जो सहा।”
बंसी और मैंने एक दूसरे को देखा।
“ठीक है।” मैंने कहा। “लेकिन अदालत में शांति से पहले मिलना है।”
हमने लक्ष्मी को मशहूर वकील शांति के दफ़्तर की सीढ़ियों तक छोड़ा। शांति सुबह दफ़्तर आ ही रही थी। जब उसने लक्ष्मी को देखा, वो रुक गई।
“ये वही महिला है?” उसने मुझसे पूछा।
“हाँ।” मैंने कहा। “इसकी गवाही सबसे पहले दर्ज करवाओ।”
शांति ने लक्ष्मी की सफ़ेद साड़ी देखी, फिर टोकन की तरफ़ देखा जो मेरी जेब से झाँक रहा था।
“और?” उसने कहा।
“बंगले जा रहे हैं।” मैंने कहा।
“बंगले?” शांति ने सिकोड़ी। “कहाँ?”
“नदी किनारे। पुराना।”
“भवानी का पुराना बंगला?” शांति का चेहरा बदल गया। “वहाँ क्यों?”
“कम्मो।” मैंने कहा।
शांति ने एक लंबी साँस ली। “एक बात सुन। मैंने उस बंगले का नाम किसी अदालती फ़ाइल में नहीं देखा। पर मेरे दादाजी बताते थे — उस बंगले में एक कमरा है, जिसकी चाबी सिर्फ़ भवानी के ख़ानदान की औरतों के पास होती थी। भवानी की माँ कौशल्या के पास थी।”
“और कम्मो?” मैंने पूछा।
“कौशल्या की बहन।” शांति ने कहा। “शायद उसके पास भी हो।”
बंसी ने मेरी तरफ़ देखा। “अब समझा — टोकन क्यों ‘दीवार’ लिख रहा है।”
“क्यों?” मैंने कहा।
“क्योंकि कमरा ज़मीन के नीचे है।” बंसी ने कहा। “और बंगले में गुप्त कमरे की दीवार ही सबसे बड़ी गवाह है।”
हम निकले। सड़क खाली थी, और सूरज आसमान पर आधा चढ़ चुका था। रास्ते में मैंने पूछा, “बंसी, तेरे बाप के बारे में कभी सोचा है?”
“कभी-कभी।” बंसी ने कहा, आँखें सड़क पर।
“क्या सोचता है?”
“सोचता हूँ — वो भी किसी के बाप थे। किसी के लिए पूरा दुनिया रोशनी थे। पर मेरे लिए सिर्फ़ एक नाम हैं।” उसने गाड़ी मोड़ी। “तेरा बाप कैसा था?”
“कानून का पक्का।” मैंने कहा। “घर में भी। एक बार मैंने स्कूल से झूठ बोला, तो उसने मुझे पूरी रात बैठाकर कहानी सुनाई — झूठ बोलने वालों की।”
“और अब?”
“अब टोकन है।” मैंने कहा। “वो बोलता है, बाप नहीं।”
“टोकन तेरे बाप का ही है।” बंसी ने कहा।
वो सीधी बात थी। मैं कुछ नहीं बोला।
बंगला नदी के किनारे था। चारों तरफ़ ऊँची घास, टूटी दीवार, सामने बड़ा सा फाटक। फाटक पर ताला नहीं था, बस ज़ंग लगी थी। हमने ज़ोर से धक्का दिया। फाटक खुला, चरमराता हुआ।
अंदर का आँगन सूना था। ज़मीन पर पुराने पत्थर, एक तरफ़ सूखा कुआँ। बीच में कोई नहीं।
“कमरा कहाँ होगा?” बंसी ने पूछा।
“दीवार ढूँढ।” मैंने कहा।
हम कमरों में गए। सारे खाली थे, बस एक कमरे में पुरानी मेज़ रखी थी, जिस पर धूल मोटी थी। मैंने टोकन निकाला। वो गरम हो रहा था, धीरे-धीरे।
“यहाँ।” मैंने कहा।
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