The Token System – Chapter 1054
“कहाँ?”
“वहीं जहाँ हरि सिंह का बाप ज़िंदा था।” मैंने कहा। “बसवा। उसकी हवेली के पीछे जो कुआँ है, वहाँ।”
सक्सेना ने घड़ी देखी। “रात के ग्यारह बज रहे हैं।”
“तो क्या?” मैंने कहा। “बंसी, गाड़ी निकाल। रास्ते में तुम बताओ, उस तहसील की नकल के नीचे जो पुराना हस्ताक्षर वाला काग़ज़ है, वो क्या हो सकता है?”
सक्सेना गाड़ी में बैठीं और बैग से एक तह मोटा काग़ज़ निकाला। उसने कहा, “जब हमने हवेली की दीवार खोली थी, तो उसमें से चार टुकड़ों वाला टोकन और बहुत कुछ निकला था। उनमें एक पतला पीला काग़ज़ भी था, जिसे हमने तब ठीक से नहीं पढ़ा। आज रात भवानी ने उसकी नकल जमा की। असली वाला काग़ज़…”
“किसके पास है?”
सक्सेना ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। “मेरे पास। और अब तुम्हारे पास।”
मैंने पढ़ा। ऊपर मोटे हाथ की लिखाई थी, जो किसी बुज़ुर्ग की थी, नीचे एक बड़े हस्ताक्षर — हरि सिंह के बाप के — और उसके नीचे तीन लाइनें: “हवेली के नीचे की ज़मीन, कुआँ और नींव — कभी बेची, गिरवी या नामांतरित न होंगी। जो ऐसा करेगा, उसका हिसाब ख़ुद हवेली लेगी।”
“तो ये असली काग़ज़ है।” मैंने कहा।
“असली।” सक्सेना ने कहा। “पर इसे अदालत में पेश करने के लिए उसकी उम्र साबित करनी होगी। चार गवाह चाहिए — हरि सिंह का बाप, मन्नू का दादा, रामदीन मिस्त्री और रशीद उमराव। सब मरे हुए हैं।”
“मरे हुए” मैंने टोकन जेब में हाथ डालकर कहा। “पर उनकी लिखाई ज़िंदा है।”
बंसी ने गाड़ी तेज़ की। “बसवा दो घंटे का रास्ता है।”
“कुआँ तक पहुँचने का रास्ता?”
“अगर वही है जो जमुना कह रही थी।” बंसी ने कहा। “तो सुबह से पहले कुछ नहीं होगा।”
मैंने पीछे मुड़कर सक्सेना से कहा, “भवानी ने आज बयान में कहा कि उसे अमर से मिलने दो। क्यों?”
सक्सेना ने सोचा। “पता नहीं। पर ये पहली बार है कि उसने किसी चीज़ के लिए हाथ फैलाया। और भवानी जब हाथ फैलाता है, तो उसके पीछे पूरा सौदा होता है।”
गाड़ी बसवा की सड़क पर मुड़ी। सड़क कच्ची थी, दोनों तरफ़ झाड़ियाँ। आगे दूर, हवेली की एक खिड़की में रोशनी दिख रही थी — पीली, कमज़ोर।
“वहाँ कोई है।” बंसी ने कहा।
“रुक।” मैंने कहा।
गाड़ी सड़क किनारे कुछ दूर रोकी। हम उतरे। रात की ठंडी हवा में सूखी घास की गंध थी।
“सक्सेना जी, आप गाड़ी में रहिए।” मैंने कहा।
“नहीं।” सक्सेना ने कहा। “अगर तुम हवेली के अंदर जा रहे हो, तो मैं गवाह रहूँगी।”
“अगर कुछ हो गया तो?”
“तो जो गवाह नहीं रहा, उसकी गवाही कौन सुनेगा?” सक्सेना ने कहा। “मैं साथ चलूँगी।”
हम चल पड़े। बाड़ से लगकर, झाड़ियों के पीछे। हवेली की पिछली दीवार आई। दीवार की एक जगह ताज़ा ईंटें अलग रंग की थीं — जैसे अभी चुनी गई हों।
बंसी ने धीरे से कहा, “मन्नू। उस कोने में रोशनी।”
कोने में एक लालटेन रखी थी, जलती हुई। उसके पास कोई नहीं था। सिर्फ़ ज़मीन पर गीली मिट्टी का ढेर।
“ये तो कोई खोद रहा था।” बंसी ने कहा।
“और अभी गया है।” मैंने कहा।
हम दीवार के पास पहुँचे। गीली मिट्टी के ढेर के पास एक दरारनुमा गड्ढा था। मैंने झुककर देखा — अंदर कुछ नहीं, बस मिट्टी।
“कुछ नहीं मिला।” मैंने कहा।
“या फिर उन्होंने पहले से निकाल लिया।” सक्सेना ने कहा।
मैंने ढेर में हाथ डाला। मिट्टी के नीचे कुछ ठंडा — छोटा, चौकोर। मैंने निकाला। एक पुरानी पीतल की तश्तरी। बर्तन जैसी छोटी, जिसके किनारे पर कोना-चिह्न बना था। मैंने उसे जेब में रखा और बंसी की तरफ़ देखा।
बंसी ने इशारा किया — पीछे, रस्सी के पास। मैंने मुड़कर देखा। एक सिपाही हाथ में डंडा लिए खड़ा था।
“वहाँ से हटो।” उसने कहा। “ये जगह सील है।”
सक्सेना आगे आईं। “मैं अदालत की तरफ़ से आई हूँ। सक्सेना।”
सिपाही ने उन्हें देखा। “सक्सेना जी… पर आदेश है, कोई अंदर नहीं।”
“किसका आदेश?”
“ऊपर से।” सिपाही का चेहरा असहज था।
“ऊपर से क्या मतलब?” मैंने कहा।
सिपाही ने जवाब नहीं दिया। पीछे से एक और आवाज़ आई — भारी, धीमी।
“सिपाही ठीक कह रहा है।”
हम सब मुड़े। काली गाड़ी से एक आदमी उतरा — लंबा, काला कुर्ता, सफ़ेद बाल बिखरे। उसने अपना हाथ उठाया। उसकी उँगली में एक चमकती पीली अँगूठी थी।
“कौन हो?” बंसी ने कहा।
“मैं वो हूँ जिसने तहसील में ये नामांतरण दर्ज करवाया।” उसने कहा। “और वो जिसने हरि सिंह को नहीं बचाया, पर उसका बकाया बचा लिया।”
“हरि सिंह के आदमी?” सक्सेना ने पूछा।
“हरि सिंह के बाप के।” उसने कहा। “मैं तीस साल से उस काग़ज़ का इंतज़ार कर रहा हूँ जो तुम्हारे हाथ में है। उसे मुझे दे दो।”
मैंने पीछे झुककर टोकन जेब में दबाया। “क्यों?”
“क्योंकि उसी काग़ज़ पर लिखा शर्त अब पूरी होने वाली है।” आदमी ने कहा। “और जो शर्त पूरी करेगा, वही हवेली का आख़िरी हक़दार होगा।”
सक्सेना ने काग़ज़ बैग में रखा। “हम इसे किसी को नहीं देंगे।”
“अच्छा?” आदमी मुस्कुराया। वो धीरे से पास आया। बंसी ने बीच में खड़े होकर मेरी तरफ़ बढ़ने से रोका। आदमी की पीली अँगूठी लालटेन की रोशनी में चमकी।
“तुम्हें पता है, अगर हवेली का काग़ज़ तुम्हारे पास है, तो एक बात साबित करनी पड़ेगी।” आदमी ने कहा। “कि वो काग़ज़ हरि सिंह के बाप ने ख़ुद लिखा था, किसी और ने नहीं।”
“हम साबित करेंगे।” सक्सेना ने कहा।
“कैसे?” आदमी ने पूछा। “गवाह सब मरे हुए हैं।”
“काग़ज़ की लिखाई उस ज़माने की तहसील की बही से मिलानी होगी, जो अब भी बसवा के रिकॉर्ड में है।” सक्सेना ने कहा।
“वो बही कल सुबह से पहले कहीं और होगी।” आदमी ने कहा। उसने मुड़कर सिपाही को देखा, फिर हमें। “सोच लो। एक रात में कुछ नहीं रह जाता। काग़ज़ तुम्हारे पास रहे, तो भी सुबह अदालत में कोई नहीं बचेगा।”
“धमकी?” मैंने कहा।
“सलाह।” आदमी ने कहा। वो पलटा और गाड़ी की तरफ़ बढ़ा।
“एक बात।” मैंने कहा।
वो रुका।
“जब तक कुआँ नहीं खुला, तब तक कोई कुछ नहीं कर सकता।” मैंने कहा। “और कुआँ खोदने का हक़ सिर्फ़ उसी को है, जिसके पास असली काग़ज़ है।”
आदमी हँसा। “तो कुएँ के पास मिलते हैं। सुबह से पहले।”
गाड़ी का दरवाज़ा खुला और बंद हुआ। गाड़ी पीछे हटकर अंधेरे में ग़ायब हो गई। सिपाही भी चला गया — जैसे वो कभी था ही नहीं। बंसी ने सक्सेना की तरफ़ देखा।
“अब?” बंसी ने कहा।
“अब हम कुआँ खोदेंगे,” मैंने कहा।
“पर वो भी वहीं आएगा।”
“हाँ।” मैंने कहा। “और वहीं वो अपनी ग़लती करेगा।”
सक्सेना ने गाड़ी से एक चादर निकाली। हमने उसे मिट्टी के ढेर पर बिछा दिया। बंसी ने फावड़ा निकाला — गाड़ी के डिक्की में हमेशा रहता था।
“मन्नू।” सक्सेना ने कहा। “अगर वो सच में बही बदलवा देगा, तो…”
“तो हमारे पास टोकन है।” मैंने कहा। “और टोकन झूठ नहीं बोलता।”
मैंने टोकन निकाला। इक्कीस लकीरें, उसके नीचे धुँधली नई लकीर, और उसके नीचे एक शब्द जो अभी पूरा नहीं बना था — सिर्फ़ दो अक्षर, “बा…”
“क्या लिखा है?” बंसी ने पूछा।
“अभी पूरा नहीं हुआ।” मैंने कहा। “बा… कुछ।”
मैंने टोकन जेब में रखा और फावड़ा उठाया। “चल, खोद।”
बंसी ने मिट्टी हटानी शुरू की। सक्सेना लालटेन पकड़कर खड़ी रही। रात ठंडी थी, पर मेरे हाथ से पसीना आ रहा था। और मुझे लगा जैसे हवेली की दीवार के पीछे कोई छुपकर हमें देख रहा हो — पर मैंने पलटकर नहीं देखा।
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