The Token System – Chapter 1053
“ये किसकी है?” मैंने पूछा।
सक्सेना ने पीछे मुड़कर देखा। “मुझे नहीं पता। पर लिखने वाला जानता है कि तुम आज ही कुआँ खोदने वाले हो।”
मैंने टोकन फिर जेब से निकाला। हथेली पर रखा। नई लकीर पर वो शब्द अभी भी वहीं थे — “गड्ढा। कुएँ।” पर इस बार उनके नीचे एक और लकीर उभर रही थी। बहुत धुँधली।
मैंने गाड़ी की खिड़की से बाहर देखा। हवेली की तरफ़ जाती सड़क पर उस सफ़ेद गाड़ी की लाल बत्तियाँ दूर जा रही थीं।
“बंसी।” मैंने कहा।
“क्या?”
“अगर सुबह तक हम अदालत नहीं पहुँचे, तो सक्सेना को ख़बर कर देना।”
सक्सेना ने पीछे से कहा, “ख़बर किसको करेगा? मैं तो साथ आ रही हूँ।”
मैंने बंसी की तरफ़ देखा। बंसी ने आईने में मेरी आँखें देखीं।
“फिर राजेंद्र को।” मैंने कहा।
गाड़ी ने मोड़ लिया और हवेली की पीछे वाली गली में घुस गई।
॥
गाड़ी हवेली की पीछे वाली गली में घुसी और बंसी ने ब्रेक मार दिए। आगे अदालत की मुहर लगी पुलिस की रस्सी बँधी थी, दो सिपाही लाठी लेकर खड़े थे।
सक्सेना ने पीछे से कहा, “रुको। सीधे कुआँ नहीं। पहले रिकॉर्ड कमरा।”
“अभी?” मैंने कहा।
“अभी।” सक्सेना ने बैग खोला। “भवानी ने आज जो काग़ज़ दिए, उनमें एक और काग़ज़ था जो मैंने तुम्हें नहीं दिखाया। उसका ज़िक्र अभी नहीं करूँगी। पहले तुम वो देख लो जो अदालत के रिकॉर्ड में आज दर्ज हुआ है।”
हम गाड़ी से उतरे। सिपाही ने रोका तो सक्सेना ने अपनी पहचान और जज का नाम लिया। सिपाही ने रस्सी उठाई।
अदालत का रिकॉर्ड कमरा पीछे की इमारत की पहली मंज़िल पर था। सीढ़ियाँ पत्थर की, घिसी हुई। ऊपर पहुँचते ही कमरे की बंद खिड़कियों से धूल की गंध आई। एक बूढ़ा क्लर्क लालटेन के नीचे बैठा रजिस्टर पर उँगली चला रहा था।
“सक्सेना जी?” क्लर्क उठ खड़ा हुआ। “इतनी रात?”
“आज भवानी सिंह के जमा किए काग़ज़ निकालो।” सक्सेना ने कहा। “सब।”
“कल सुबह…”
“अभी।” सक्सेना की आवाज़ ऐसी थी कि क्लर्क ने दोबारा नहीं पूछा।
क्लर्क ने तीन पुलिंदे मेज़ पर रखे। पहला पुलिंदा — ग्यारह परिवारों की ज़मीन का। दूसरा — तीन बहनों वाला बंडल। तीसरा — पतला, कम काग़ज़ों वाला।
सक्सेना ने तीसरा पुलिंदा खोला। उसमें चार काग़ज़ थे। तीन तो वही पुराने, और चौथा — एक तहसील की नकल, नीली मोहर लगी, तारीख़ दो दिन पुरानी।
“ये क्या है?” मैंने कहा।
सक्सेना ने काग़ज़ उठाया, लालटेन के नीचे लाया। “हवेली के नीचे की ज़मीन का नामांतरण।”
“किसके नाम?”
“हरि सिंह के नाम।” सक्सेना ने कहा। “दो दिन पहले तहसील में दर्ज हुआ। हस्ताक्षर भी हैं — तहसीलदार के, और नीचे गवाह की जगह… भवानी के हस्ताक्षर।”
मुझे लगा जैसे कमरे की हवा खींच ली गई हो। बंसी ने मेज़ पर हाथ टिका दिया।
“मतलब हरि सिंह ने जेल जाने से पहले ही सोच लिया था।” मैंने कहा।
“हाँ।” सक्सेना ने कहा। “वो जानता था कि उसका हाथ पकड़ा जाएगा। इसलिए उसने हवेली के नीचे की ज़मीन पहले ही अपने नाम करवा ली। ताकि जब हम कुआँ खोलने जाएँ, हम पर क़ब्ज़े का इल्ज़ाम लग जाए।”
“पर ये जाली है।” बंसी ने कहा।
“जाली है।” सक्सेना ने काग़ज़ पलटा। “तारीख़ दो दिन पुरानी, पर हवेली के बँटवारे के काग़ज़ की नकल जो इसके साथ लगी है, वो चालीस साल पुरानी है। इसका मतलब — उन्होंने पुराने काग़ज़ को निकालकर उसके आधार पर नया नामांतरण बनवाया।”
“इसको अदालत में ग़लत साबित करने में कितना वक़्त?” मैंने पूछा।
सक्सेना ने काग़ज़ नीचे रखा। “हफ़्ता। शायद दस दिन। नीलामी अगले हफ़्ते है।”
मैंने अपनी जेब से टोकन निकाला। इक्कीस लकीरें, नीचे के शब्द — “गड्ढा। कुएँ।” और उससे नीचे धुँधली लकीर। टोकन मेरी हथेली पर ठंडा था, जैसे कुछ देर के लिए वो चुप हो गया हो।
“तो हमें जल्दी करनी होगी।” मैंने कहा।
बंसी ने क्लर्क की तरफ़ देखा। “भाई साहब, उस ज़मीन का पुराना रिकॉर्ड भी होगा? जो इस नामांतरण के नीचे लगा है?”
क्लर्क झिझका। “वो रिकॉर्ड मुख्य तहसील में है। और वो…”
मैंने टोकन जेब में रखा। “रहने दो। पहले अदालत।”
रास्ते में सक्सेना ने कहा, “हरि सिंह को आज रात यहीं अदालत के हवाले कमरे में रखा है। सुबह उसे सुनवाई में लाएँगे। अगर तुम उससे मिलना चाहते हो, तो यही वक़्त है।”
“मैं मिलूँगा।” मैंने कहा।
अदालत के पिछले हिस्से में छोटा कमरा था, जिसके बाहर एक सिपाही कुर्सी पर बैठा था। सक्सेना ने कुछ कहा, सिपाही ने दरवाज़े की कुंडी खोली और अंदर झाँका।
“पंद्रह मिनट।” सिपाही ने कहा।
हरि सिंह ज़मीन पर चटाई पर बैठा था। साठ साल पहले का दुबला शरीर, सफ़ेद बाल बिखरे, आँखों पर पुराना चश्मा टेढ़ा पड़ा था। मैंने काग़ज़ उसके सामने फ़र्श पर रख दिया।
वो काग़ज़ देखता रहा। उसका चेहरा नहीं बदला।
“क्या बात है, मनोहर।” उसने कहा। “तूने रात में भी मेरे काग़ज़ देख लिए?”
“दो दिन पहले का नामांतरण।” मैंने कहा। “हवेली के नीचे की ज़मीन। तेरे नाम।”
हरि सिंह ने काग़ज़ उठाया, ऊपर उठाकर देखा, जैसे पहचान रहा हो। फिर उसने पहली बार मुझे सीधा देखा और हँसा। छोटी, रूखी हँसी।
“तू समझता है मैं जेल में बैठकर हार जाऊँगा?” उसने काग़ज़ झटके से मेरी तरफ़ सरका दिया। “मेरे पास दो दिन पहले का काग़ज़ है। तेरे पास सिर्फ़ पुरानी पर्चियाँ, फटे काग़ज़, सड़ी बहियाँ। अदालत में मेरा काग़ज़ ताज़ा है। तेरा — चालीस साल पुराना। ताज़ा पहले बोलता है।”
मैं चुप रहा। कुछ नहीं बोला। बस जेब से टोकन निकालकर उँगलियों में घुमाया और दोबारा जेब में रखा।
“हरि सिंह।” मैंने कहा। “तेरी तारीख़ दो दिन पुरानी है। पर मेरे पास तेरे बाप के हस्ताक्षर वाला काग़ज़ सौ साल पुराना है। और उस काग़ज़ पर तेरे बाप ने ख़ुद लिखा है कि हवेली की ज़मीन बेची नहीं जाएगी, न गिरवी रखी जाएगी।”
हरि सिंह का हाथ काग़ज़ पर रुक गया।
“मेरे बाप के हस्ताक्षर वाला?” उसकी आवाज़ बदल गई। वो काग़ज़ की तरफ़ झुका। “वो काग़ज़ तुझे किसने दिया?”
मैंने उसका चेहरा देखा। दो दिन में पहली बार उसकी आँखों में कुछ और था — हँसी नहीं, डर भी नहीं। कुछ ऐसा जो पकड़ में नहीं आ रहा था।
“ये जानने की ज़रूरत तुझे नहीं।” मैंने कहा। “पर सोच ले। अगर वो काग़ज़ अदालत में पेश हुआ, तो तेरा दो दिन पुराना नामांतरण काग़ज़ कहीं खड़ा नहीं रहेगा।”
हरि सिंह धीरे से पीछे झुका। उसने चश्मा ठीक किया। फिर एक लंबी साँस ली, जैसे कोई बूढ़ा आदमी सत्तर साल का बोझ उतार रहा हो।
“तू बदल गया है, मनोहर।” उसने कहा।
“नहीं बदला।” मैंने कहा। “बस अब बातें कम करता हूँ।”
“जो आदमी मुझे जेल में बैठकर भी हरा देगा, वो बातें नहीं करता।” हरि सिंह ने कहा। “वो सिर्फ़ काग़ज़ दिखाता है और चला जाता है।”
मैंने सिपाही की तरफ़ देखा। “पंद्रह मिनट पूरे?”
सिपाही ने सिर हिलाया।
हम बाहर निकले। रास्ते में सक्सेना ने कहा, “तुमने उसके बाप के हस्ताक्षर की बात कह दी। अभी वो काग़ज़ हमारे पास नहीं है।”
“पता है।” मैंने कहा। “पर अब वो उसे ढूँढेगा। और जो आदमी ढूँढता है, वो ग़लती करता है।”
बंसी ने कहा, “या फिर वो अपने आदमी को पहले भेज देगा।”
“तेरी बात सही है।” मैंने कहा। “इसलिए हम उससे पहले पहुँचेंगे।”
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