The Token System – Chapter 1044
“हाँ।”
“बग़ल में?”
“हाँ।”
वो गाड़ी के दरवाज़े तक गया। खोला। मेरे लिए रुका। मैं बैठा। वो दूसरी तरफ़ से बैठा।
गाड़ी चली।
पहले कुछ देर चुप्पी रही। फिर भवानी ने कहा — “तेरा बाप — डॉक्टर के पास है?”
“हूँ।”
“अच्छा।”
फिर चुप।
“मैंने उसे मरने नहीं दिया।” भवानी ने अचानक कहा। आवाज़ में कुछ था जो पहले नहीं था — शायद सच।
“मैं जानता हूँ।” मैंने कहा। “तूने दवा भिजवाई।”
“हर महीने।”
“पर तूने उसे बाहर नहीं निकाला।”
वो चुप रहा।
“अगर तूने उसे बाहर निकाल दिया होता —” मैंने कहा, “तो आज तुझे ये सब नहीं झेलना पड़ता। कोई कोठरी नहीं। कोई अदालत नहीं। तेरा बेटा तेरे ख़िलाफ़ नहीं बोलता।”
भवानी ने खिड़की से बाहर देखा। “तू सोचता है — मैंने ऐसा सोचा नहीं?” उसने कहा। “मैंने हज़ार बार सोचा। और हर बार — हर बार मैं रुक गया। क्यों — पता है?”
“क्यों?”
“क्योंकि जो काग़ज़ मैंने उससे छीनकर बचाया था — वो मेरे पास था। और अगर वो बाहर आता, तो वो अदालत को बता देता कि वो काग़ज़ मेरे पास है।” उसने कहा। “मेरी हिफ़ाज़त मेरी क़ैद बन गई।”
गाड़ी उसके होम के गेट पर रुकी।
वो उतरा। मैं उतरा।
होम के पिछले दफ़्तार की तरफ़ चलते वक़्त वो कुछ नहीं बोला। मैं भी नहीं।
दरवाज़ा खोला। अंदर काग़ज़ों की गंध। एक कोने में लोहे की तिजोरी — जंग लगी, छोटी।
वो तिजोरी के पास गया। उसने अपनी जेब से चाबी निकाली — पुरानी, छोटी, पीतल की। घुमाई। तिजोरी खुली।
अंदर से उसने एक पीला लिफ़ाफ़ा निकाला। फिर दूसरा। फिर एक मोटी बही।
“ये ले।” उसने कहा। “सब। जो भी मेरे पास था।”
मैंने काग़ज़ लिए।
फिर दरवाज़े की तरफ़ मुड़ा।
“मनोहर।”
मैं रुका। मुड़ा।
भवानी की आँखों में वो पुराना गुरूर तो था, पर उसके पीछे कुछ और भी था — जो मैंने पहले कभी नहीं देखा।
“मैं —” उसने कहा। फिर रुक गया। फिर कहा — “कुछ नहीं।”
मैं चला गया।
बाहर आकर मैंने टोकन निकाला। इक्कीस लकीरें। काला किनारा — पूरा साफ़। कोई कालापन नहीं।
टोकन हल्का गरम था। फिर धीमा ठंडा हुआ।
मैंने बंसी को फ़ोन किया।
“पापा कैसे हैं?”
“होश में। सुमन कह रही है — ख़तरे से बाहर।” फिर बंसी ने कहा — “मन्नू — तेरी आवाज़ क्यों बदली है?”
“अच्छा है।” मैंने कहा। “अब अच्छा है।”
मैंने फ़ोन रखा। आसमान में सूरज ढल चुका था। होम के गेट पर मैं खड़ा था, हाथ में काग़ज़ों का बंडल।
पहली बार लगा — असली हिसाब अब शुरू हुआ है। और वो लंबा नहीं है। बस — साफ़ है।
॥
अफ़सर ने मोबाइल कान से लगाया और जज साहब से बात करने लगा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर मैं पास खड़ा था, सब सुन रहा था।
“सर, दरवाज़ा बाहर से बंद है, अंदर से कोई आवाज़ नहीं आ रही। सिर्फ़ एक औरत ने कहा है कि अंदर कोई बीमार पड़ा है।” उसने रुककर सुना। “जी। जी, समझ गया। डॉक्टर की मौजूदगी में? ठीक है, सर।”
उसने फ़ोन रखा और सक्सेना की तरफ़ देखा। “जज साहब का हुक्म है — अगर जान का ख़तरा है, तो दरवाज़ा खोला जा सकता है। पर डॉक्टर पहले अंदर जाएगी, और हर चीज़ की सीलिंग के साथ।”
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। वो पहले से अपनी बैग उठा रही थी।
“मैं तैयार हूँ।” उसने कहा। “स्ट्रेचर लाओ। दो वार्ड बॉय भी।”
दो आदमी स्ट्रेचर लेकर दौड़े। पीछे से एक वार्ड बॉय आया, हाथ में ऑक्सीजन का छोटा सिलेंडर।
“पत्थर मिलेगा?” बंसी ने पूछा।
“इसी आँगन में पड़े हैं।” राजेंद्र ने कहा और दो सिपाहियों को इशारा किया।
पत्थर आया। मोटा, भारी। दो आदमियों ने उठाया और दरवाज़े के ताले पर दे मारा। पहला वार — धातु की आवाज़, पर ताला टस से मस नहीं हुआ। दूसरा वार — कुछ चटका। तीसरा वार — ताला खुलकर नीचे गिरा, धूल उड़ी।
दरवाज़ा ज़रा सा खुला, पर अंदर से कुछ चीज़ रोक रही थी। राजेंद्र ने कंधा लगाकर धक्का दिया। दरवाज़ा कराहकर खुला।
अंदर अंधेरा था। ऐसा अंधेरा जो आँखों को चुभे। और बदबू — बंद कमरे की, सीलन की, दवा की, पसीने की। मेरा पेट मुड़ा।
“टॉर्च।” सुमन ने कहा।
किसी ने टॉर्च जलाई। रोशनी कमरे में फैली। छोटा कमरा था — बस दस कदम चौड़ा, बारह लंबा। दीवारें नम थीं, ऊपर कोई पंखा नहीं। बाईं तरफ़ की दीवार में एक छोटी खिड़की थी, जिसकी सलाखों से हल्की रोशनी छनकर आ रही थी — शायद किसी बरामदे की बत्ती।
और कोने में, एक टूटी चारपाई पर, चादर ओढ़ा हुआ एक शरीर पड़ा था।
सुमन सबसे आगे बढ़ी। मैं उसके पीछे। मेरे पीछे बंसी, फिर राजेंद्र।
सुमन ने घुटने टेके। उसने चादर के किनारे को छुआ, फिर मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया। उसने चादर धीरे से हटाई।
पहले दाढ़ी दिखी — सफ़ेद, बढ़ी हुई, बुरी तरह उलझी। फिर चेहरा — पीला, हड्डियाँ उभरी हुई, आँखें धँसी हुईं, होंठ सूखे और फटे। गाल पर पुराने ज़ख़्म का निशान। ये वही थे। किशनचंद। मेरे पापा।
मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने चारपाई का किनारा पकड़ा।
सुमन ने उनकी कलाई पकड़ी, उँगलियाँ नाड़ी पर रखीं। फिर गर्दन पर हाथ रखा, फिर छाती पर कान। उसका चेहरा कड़ा था।
“नाड़ी कमज़ोर है, पर जान बची है।” उसने कहा। कोई जश्न नहीं, कोई मुस्कान नहीं। सिर्फ़ हुक्म। “तुरंत अस्पताल। ऑक्सीजन लगाओ। स्ट्रेचर पास लाओ।”
वार्ड बॉय आगे आया। ऑक्सीजन का मास्क चेहरे पर लगा। सुमन ने बाँह में सुई लगाई — ग्लूकोज़ की।
“धीरे।” वो बोली जब दो आदमियों ने पापा को उठाया। “कमर सीधी रखो। हड्डियाँ कमज़ोर हैं।”
जब उन्हें स्ट्रेचर पर लिटाया जा रहा था, पापा की आँखें खुलीं। आधी खुलीं, फिर पूरी। वो मेरी तरफ़ देखने लगे। देखते रहे।
फिर उनके होंठ हिले। आवाज़ नहीं निकली। सिर्फ़ हवा। फिर धीरे से, बहुत धीरे से, जैसे बरसों की चुप्पी तोड़ रहे हों —
“तू… बड़ा हो गया।”
मेरा गला बंद हो गया। मैं कुछ नहीं बोल पाया। मैंने बस उनका हाथ पकड़ लिया। हड्डी जैसा हाथ। ठंडा। कमज़ोर।
उन्होंने मेरी उँगलियाँ ज़ोर से पकड़नी चाहीं, पर ज़ोर नहीं आया। फिर आँखें फिर बंद हो गईं।
सुमन ने ग्लूकोज़ की बोतल ऊँची की और राजेंद्र से कहा, “रास्ता साफ़ करो। सीधे इमरजेंसी। पहले से फ़ोन कर रही हूँ।”
राजेंद्र ने फ़ोन निकाला।
तभी सुमन रुकी। उसकी नज़र पापा की कलाई पर पड़ी। उसने हाथ उठाया, टॉर्च की रोशनी में कलाई के अंदर की तरफ़ देखा।
“इसकी कलाई पर यह क्या?”
मैं पास गया। कलाई पर एक पुराना निशान था — रस्सी का, गहरा, जैसे कई साल तक बँधा रहा हो। और उस निशान के ऊपर, किसी तेज़ चीज़ से खुरचकर, दो अंक बनाए गए थे।
सुमन ने करीब ले जाकर देखा।
“तीन सौ।” उसने कहा। “तीन सौ का आंकड़ा। और नीचे… कुछ और भी है। जैसे कोई तारीख़।”
बंसी आगे आया। “हर महीने?”
मैंने सुमन की तरफ़ देखा।
तभी पापा ने फिर आँखें खोलीं। इस बार ज़्यादा देर तक। उन्होंने सुमन को देखा, फिर मुझे। और फिर वो बोले — धीरे, टूटी आवाज़ में, हर शब्द जैसे किसी गहरे कुएँ से निकल रहा हो —
“हरि सिंह… हर महीने मुझसे एक हस्ताक्षर लेता था।”
कमरे में सन्नाटा। सिर्फ़ ऑक्सीजन के बुलबुलों की आवाज़।
“अठारह साल से।” पापा ने कहा। “मेरे तीन सौ से ज़्यादा हस्ताक्षर उसके पास हैं।”
मेरे हाथ से टॉर्च फिसल गई। बंसी ने झटकर पकड़ा।
“तीन सौ हस्ताक्षर?” राजेंद्र ने कहा। “किस चीज़ के?”
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