The Token System – Chapter 1043
“जी?” उसने सिर उठाया।
मैंने सामने जाकर खड़ा होकर कहा, “सर — कोठरी में एक बंदी की जान का सवाल है। मेरे पापा उस कमरे में हैं। सात हज़ार दिन से। अदालत ने हुक्म दिया है कि चार बजे दरवाज़ा खुलेगा — पर मैं ये कहने आया हूँ कि आज ही, अभी, दरवाज़ा खुलवा दिया जाए।”
अफ़सर ने फ़ाइल बंद की। “कानून में जल्दबाज़ी नहीं चलती।”
“कानून में जान भी होती है, सर।” मैंने कहा। “मेरे पापा वहाँ साँस ले रहे हैं। उन्हें बाहर हवा चाहिए। डॉक्टर सुमन उनके पास हैं — वो कह रही हैं कि अगर और देर हुई, तो —”
मैं रुका।
“तो?”
“तो चार बजे जो दरवाज़ा खुलेगा, वो सिर्फ़ एक कमरा होगा।” मैंने कहा। “एक आदमी नहीं।”
अफ़सर ने सक्सेना की तरफ़ देखा। “वकील साहब — आपकी राय?”
सक्सेना ने काग़ज़ उठाया। “जज साहब का आदेश इसी दिन खोलने का है। मैं कहती हूँ — मोहर और गवाहियों की शर्त पूरी है। दरवाज़ा खुल सकता है। और अगर जान का ख़तरा है, तो कानून नहीं रोकता — कानून ही कहता है कि जान पहले।”
अफ़सर ने कुछ लिखा। फिर सिर उठाया। “ठीक है। मैं दो सिपाही और एक मजिस्ट्रेट के साथ अभी चलता हूँ। मोहर मेरे सामने टूटेगी।”
वो उठा।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। बंसी के चेहरे पर पसीना था। सरस्वती की आँखें भीगी थीं।
“जल्दी करो।” मैंने कहा।
हम बरामदे से निकले। भवानी अभी आँगन में खड़ा था — एक कोने में, सिपाही की नज़र में। मैं उसके पास से गुज़रा। रुका नहीं।
“मनोहर।” उसने कहा। मैंने पीछे देखा।
“मैं तेरे बेटे को बाहर नहीं करूँगा।” मैंने कहा। “लेकिन तेरे बेटे ने जो किया, वो सच बोलकर किया। इसमें तेरे लिए कोई जगह नहीं छोड़ी। तू अपने आप से लड़।”
फिर मैं चल दिया।
हवेली की वो भीतरी मोहर वाली कोठरी की तरफ़। जिसके दरवाज़े पर चार घंटे पहले पहुँचना था — अब पंद्रह मिनट में।
अफ़सर, सिपाही, सक्सेना, सुमन के बुलाया एक मजिस्ट्रेट — सब जुटे। साँकल पर अदालत की मोहर लगी थी। अफ़सर ने मोहर देखी, फिर जेब से चाबी निकाली। मोहर खुली। दरवाज़े का ताला बाहर से गिरा। अंदर से जवाब नहीं आया। अफ़सर ने तीन बार दस्तक दी। फिर दरवाज़ा खोला।
दीमक लगी लकड़ी की चरमराहट — धीमी, भारी।
अंदर अंधेरा था। सुमन पहले घुसी।
“रोशनी!” उसने कहा।
किसी ने टॉर्च दी। रोशनी पड़ी।
कमरे के कोने की चारपाई पर एक आदमी बैठा था। सफ़ेद कुर्ता उतरा हुआ, दाढ़ी बढ़ी हुई, आँखें अंधेरे से सिकुड़ी हुईं। उसके पास एक टीन का घड़ा रखा था और एक टूटी कुर्सी।
मैंने एक कदम बढ़ाया। दूसरा।
“पापा।”
वो मेरी तरफ़ देखने लगा। आँखें जैसे किसी पुरानी चीज़ को पहचान रही हों।
“मन्नू?” उसकी आवाज़ सूखी थी, फटी हुई।
“हाँ।”
वो उठा। घुटने काँपे। वो चारपाई की डंडी पकड़कर खड़ा हुआ।
“मैंने सोचा था —” उसने कहा। फिर आवाज़ भर आई। कुछ कहा नहीं।
सुमन उसके पास पहुँची। नाड़ी देखी, आँखें देखीं। “पानी लाओ।” उसने कहा। “और बाहर वाले कमरे में लिटाओ — यहाँ हवा नहीं।”
हमने उसे बाहर लाया। सिपाही ने कंधा दिया। बंसी ने पानी दिया। वो पीता रहा, और फिर काँपने लगा — पूरा शरीर।
“देखो —” वो बोला। “मेरा लिखा हुआ — उस दीवार के नीचे —”
“कौन सी दीवार?”
“जो मोहर के सामने है। उत्तर वाली। उसके नीचे रखा है मैंने। एक लाल कपड़े में।”
मैंने सुमन की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया।
“पापा — आराम करो।”
“ना।” उसने कहा। “पहले बताओ — वो काग़ज़ मिला? जो मैंने छिपाया था?”
मैंने जेब से डिब्बा निकाला। वो काग़ज़। “मिला।”
“तो अब सब पता है?”
“लगभग।”
“अच्छा।” उसने कहा। उसकी आँखें बंद हो गईं। “फिर मुझे सुलाओ।”
हम उसे बाहर लाए। सुमन ने कहा — “अस्पताल ले चलो। अभी।”
बंसी दौड़कर बाहर गया। राजेंद्र ने एक सिपाही भेजा। पंद्रह मिनट में एक एम्बुलेंस आँगन में आकर रुकी।
पापा को स्ट्रेचर पर लिटाया गया। मैंने उसका हाथ पकड़ा।
“मन्नू।” उसने कहा। “एक बात।”
“हाँ।”
“वो औरत — सरस्वती — वो मेरी माँ है।” उसकी आवाज़ काँपी। “माँ — समझे? मेरी असली माँ। कौशल्या की बहन। वो ज़िंदा थी, और मैं जानता था। मुझे बताया गया था कि मर गई। पर वो हवेली में ही थी।”
मैंने सरस्वती की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े पर खड़ी थी। आँखों में आँसू, होंठ काँपते।
“माँ।” मैंने कहा।
वो सिर्फ़ सिर हिलाया।
स्ट्रेचर बाहर निकला। भवानी आँगन के कोने से देख रहा था। पापा ने उसे देखा नहीं।
फिर स्ट्रेचर गाड़ी में गया। दरवाज़ा बंद हुआ। एम्बुलेंस चली गई।
मैं आँगन में खड़ा रह गया।
बंसी ने कंधे पर हाथ रखा। “ठीक है?”
“पता नहीं।” मैंने कहा। “अब क्या? बाप बाहर आ गया। काग़ज़ मिल गया। पर —”
“पर?”
“पर हिसाब बराबर नहीं हुआ।”
मैंने जेब से टोकन निकाला। इक्कीस लकीरें। नीचे “पाँच” शब्द। काला किनारा — अब आधा ही काला। फिर भी काला।
टोकन को हथेली में रखा तो हल्की गरमाहट आई। फिर एक शब्द उभरा — एक ही, छोटा।
“चल।”
मैंने चारों तरफ़ देखा। “कौन चलेगा?” मैंने धीमे से पूछा, ख़ुद से ज़्यादा टोकन से।
जवाब में —— शब्द नहीं आया। टोकन ठंडा हो गया।
बंसी ने मेरी मुट्ठी की तरफ़ देखा। “क्या लिखा?”
“कुछ नहीं।” मैंने कहा। “बस — चल।”
मैं आँगन के बीच आकर खड़ा हो गया।
“सरस्वती — तुम रुको। जमुना — तुम भी।” मैंने कहा। “अफ़सर साहब — जो काग़ज़ दीवार में मिले, उन्हें सील करके अदालत भेज दीजिए। मेरे पास जो डिब्बा और काग़ज़ हैं — वो भी।”
“और तुम?” सक्सेना ने पूछा।
“मैं —” मैंने टोकन देखा।
फिर मैंने सक्सेना की तरफ़ सीधा देखा।
“मैं भवानी के साथ चलना हूँ।”
बंसी एक कदम आगे आया। “क्या?”
“उसके होम के दफ़्तार में जो काग़ज़ हैं — वो मेरे पास नहीं। वो उसके पास हैं। उसकी तिजोरी में।” मैंने कहा। “अगर वो खुद देने को तैयार है, तो मुझे जाना होगा। एक बार। सिर्फ़ काग़ज़ लेने।”
“ये जाल हो सकता है।” राजेंद्र ने कहा।
“हो सकता है।” मैंने कहा। “पर इस वक़्त भवानी के पास कुछ नहीं बचा। उसका बेटा गवाही दे चुका। उसका सौतेला भाई हिरासत में। उसकी ज़मीन अदालत के कब्ज़े में। उसके पास सिर्फ़ एक चीज़ बची है — जो उसने बीस साल रखी है। और वो एक चीज़ तभी देगा जब वो ख़ुद पहुँचाएगा।”
“तो मैं भी चलूँगा।” बंसी ने कहा।
“नहीं।” मैंने कहा। “वो अकेले बुलाएगा। मुझे अकेले जाना होगा।”
“मन्नू —”
“बंसी।” मैंने उसका कंधा पकड़ा। “तू सुमन के साथ जा। पापा को देख। और माँ को — माँ को अभी नहीं बताना। पहले डॉक्टर से पूछ।”
बंसी ने सिर हिलाया। उसकी आँखें डबडबाई थीं, पर उसने एक शब्द और नहीं कहा।
मैं भवानी की तरफ़ गया।
वो उसी कोने में खड़ा था। उसने मेरे कदम सुने। मुड़ा।
“काग़ज़ लेने आएगा?” उसने पूछा। फिर भी नज़रें ऊपर।
“हाँ।” मैंने कहा। “अभी। तेरे साथ।”
वो एक पल मुझे देखता रहा। फिर अपने आप आगे बढ़ा — बिना किसी तेज़ी के, बिना किसी गुरूर के। पहली बार मुझे लगा कि वो मुझसे डर रहा है। नहीं — शायद नहीं डर। शायद उसे मुझसे कोई उम्मीद नहीं थी।
हम दोनों हवेली के गेट से बाहर निकले।
सड़क पर उसकी सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी। वो गाड़ी की तरफ़ बढ़ा। फिर रुका। पीछे मुड़ा।
“तू मेरे साथ गाड़ी में बैठेगा?”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno